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फ़िलिस्तीनी महिलाओं पर ज़ुल्म: इज़रायल की एक सिस्टमेटिक और प्री-प्लांड पॉलिसी

By Dr Mohammad Makram Balawi

16 दिसम्बर 2018 को जेरुसलेम के क़ब्ज़े वाले शहर में एक इज़रायली अदालत ने 20 साल के फ़िलिस्तीनी शहीद मोहम्मद अबू घननाम की मां सुजान अबू घननाम को एक फेसबुक पोस्ट में ‘भड़काने’ के आरोप में 11 महीने जेल की सज़ा सुनाई. 

23 जुलाई 2017 को जेरुसलेम में इस्लाम के तीसरे सबसे पवित्र स्थल, अल-अक़्सा मस्जिद में प्रवेश करने के दौरान मोहम्मद अबू घननाम की हत्या कर दी गई. वो इज़रायली क़ब्ज़े के अधिकारियों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का विरोध कर रहे थे. महीनों बाद उनकी मां को उनके घर से गिरफ़्तार कर लिया गया और इस दिसम्बर उन पर चार्ज भी लगाया गया.

उसी दिन इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बेटे याइर नेतन्याहू ने दावा किया कि फेसबुक ने उन्हें 24 घंटे के लिए पोस्ट करने पर प्रतिबंध लगा दिया था.

अपनी गतिविधियों को फेसबुक के ज़रिए प्रतिबंधित करने को “थॉट पुलिसिंग” का लेबल देने से पहले ट्वीट की एक श्रृंखला में याइर ने फ़िलिस्तीनियों और मुसलमानों को इस क्षेत्र से निष्कासित करने का आह्वान किया था. 

उन्होंने दावा किया कि उनका निलंबन इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने अपने एक पोस्ट को हटाने के लिए फेसबुक की आलोचना की थी, जबकि सोशल मीडिया के एक्सपर्ट्स का कहना है कि उन्होंने फेसबुक समुदाय के नियमों के उल्लंघन में हेट स्पीच को रि-पोस्ट किया था. 

मां सुजान अबू घननाम के विपरीत, याइर नेतन्याहू को ना अदालत में बुलाया गया और ना ही 11 महीने की जेल की सज़ा सुनाई गई. बल्कि याइर अपने इस काम के  लिए खुद को हीरो मानता है. यहां बता दें कि ये अकेली ऐसी घटना है, जिसमें फेसबुक ने एक ग़ैर-फ़िलिस्तीनी अकाउंट के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का फ़ैसला किया. हालांकि सिर्फ़ 24 घंटे का प्रतिबंध इज़रायलियों को पर्याप्त सज़ा लग रहा था.

यही नहीं, इज़रायली सेना ने जेरुसलेम के पड़ोस के इलाक़े वाडी अल-जोज़ से फ़िलिस्तीनी रामी फ़खोरी को उनके 23 दोस्तों के साथ गिरफ्तार किया. रामी फ़खोरी की उस वक़्त शादी हो रही थी. उनके सारे दोस्त उनकी शादी में शामिल होने आए थे. गिरफ़्तारी के बाद इन्हें एक इज़रायली अदालत में ले जाया गया. इन पर आरोप लगाया कि ये हमास का झंडा लहराते हुए “आतंकवादियों का महिमामंडन” करने वाले फ़िलीस्तीनी देशभक्ति वाले गीत गा रहे थे.  

क्या ये महज़ एक संयोग है कि दुल्हन के स्वर्गीय पिता मिस्बाह अबू सबीह एक फ़िलिस्तीनी नायक थे, जिन्होंने इज़रायली सैनिकों पर घातक हमला किया था. और 2016 में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी? ऐसे में क्या ये माना जाए कि ये उनकी बेटी के ख़िलाफ़ बदले की कार्रवाई थी?

मिस्बाह का शव अभी भी उनके परिवार को दफ़नाने के लिए नहीं लौटाया गया है.  बता दें कि अपनी मृत्यु से पहले मिस्बाह एक फेसबुक पोस्ट की वजह से इज़रायली  क़ब्ज़े वाले सैनिकों के द्वारा एक साल के लिए जेल में डाले गए थे.

प्रतिशोध के एक और मामले में, 20 दिसंबर को इज़रायली सैनिकों ने जेरूसलम के उत्तर स्थित हिज़्मा गांव पर हमला किया और फ़िलिस्तीनी क़ैदी मुहम्मद सलाहुद्दीन की मां को गिरफ्तार कर लिया.

इसी तरह के एक और मामले में एक इज़रायली सैन्य अदालत ने फ़िलिस्तीनी शहीद अशरफ़ नलवा की मां को रिहा करने से इनकार कर दिया था, जो अपनी बेटी के साथ लगभग दो महीने पहले तुलकर्म के नज़दीक श्वेइके से गिरफ्तार हुई थीं. यहां तक कि इज़रायली सेना ने उनके घर को ध्वस्त कर दिया और उनके बेटे की गोली मारकर हत्या कर दी.

फ़िलिस्तीनी महिलाओं पर ये ज़ुल्म यूं ही नहीं है, ये एक सिस्टमेटिक और प्री-प्लांड पॉलिसी है, जो फ़िलिस्तीनी महिलाओं के लिए इज़रायल की घृणा को दर्शाता है. इज़राइल इन महिलाओं को संभावित आतंकवादियों को जन्म देने वाली रगों से ज़्यादा कुछ नहीं देखता है. कम से कम याइर नेतान्याहू के अनुसार तो हर फ़लिस्तीनी एक संभावित आतंकवादी है. अगर ये महिलाएं शहीद या क़ैदियों की पत्नियों की मां भी नहीं हैं, फिर भी फ़िलिस्तीनियों के रूप में भी वे अपनी ज़मीन पर रहने की हक़दार नहीं समझी जा रही हैं.

ये पॉलिसी कोई नई नहीं है. 13 अक्टूबर को नब्लस के साउथ-वेस्ट में बिद्दया में 47 साल की आयशा अल-रबी को अवैध इज़रायली क़ब्ज़ाधारियों ने मार डाला.

विडंबना ये है कि इज़रायली न्यूज़ पोर्टल Ynet ने इस घटना के लिए सिर्फ़ चार लाइनें समर्पित कीं, जबकि बाक़ी रिपोर्ट ने फ़िलिस्तीनीयों के ज़रिए “यहूदियों को छुरा घोंपने के प्रयासों” पर चर्चा की.

हालांकि इज़रायली पुलिस ने इस घटना की जांच शुरू कर दी है, लेकिन आतंकवाद के अधिनियम के तहत मौक़े पर किसी भी इज़रायली क़ब्जेधारियों को गोली नहीं मारी गई और न ही उसके घर को ध्वस्त किया गया. 

दिलचस्प तो ये है कि इज़रायल महिलाओं और बच्चों के लिए रहने की स्थिति को बेहतर बनाने के बारे में बात करता है, लेकिन बावजूद इसके फेसबुक पोस्टों या पूरी तरह से संरक्षित इज़रायली सैनिकों पर पत्थर फेंकने के आरोपों में सैकड़ों महिलाओं और बच्चों को महीनों बल्कि सालों-साल जेलों में अपनी ज़िन्दगी काटनी पड़ती है. 

सच तो ये है कि इज़रायल की मातृत्व और बचपन की परिभाषाएं एक निश्चित जातीयता और धर्म तक सीमित हैं. फ़िलिस्तीनी निश्चित रूप से इस परिभाषा में फिट नहीं बैठते हैं. 

हालांकि Knesset इस स्थिति को बदलने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है. इस साल के शुरू में अपने “नेशन स्टेट लॉ” के मद्देनज़र फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ पूर्ण रूप से भेदभावपूर्ण क़ानूनों को पारित करने के साथ खुद को बदल रहा है. हम उम्मीद करते हैं कि इस नए साल में ‘न्याय’ अधिक होगा.

(ये लेखक के अपने नीजि विचार हैं.)

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