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यहां जानिए! दलितों व पिछड़ों को इस बजट में क्या मिला?

Afroz Alam Sahil, BeyondHeadlines 

देश की तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया बता रही है कि दलित और आदिवासियों के लिए इस मोदी सरकार ने बड़ा दिल दिखाया है. एससी-एसटी वर्ग के लिए बजट में न सिर्फ़ पर्याप्त धनराशि की व्यवस्था की, बल्कि पिछले साल के मुक़ाबले इनमें 35 फ़ीसद तक की बढ़ोत्तरी भी की है. जो कि अब तक इस वर्ग के विकास के लिए मिलने वाली राशि में सबसे बड़ी बढ़ोत्तरी है.

लेकिन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय का प्रस्तावित बजट बताता है कि मीडिया में कही जाने वाली ये तमाम बातें पूरी तरह से झूठ हैं. इस बार के अंतरिम बजट में इस सबसे अहम मंत्रालय का बजट पिछले साल के मुक़ाबले कम कर दिया गया है.  

साल 2018-19 में इसका प्रस्तावित बजट 9963.25 करोड़ था, लेकिन इस वित्तीय साल में इस मंत्रालय का कुल प्रस्तावित बजट 7800 करोड़ रखा गया है.

जब हम इस अंतरिम बजट का आंकलन करते हैं, तो पता चलता है कि इस बार केन्द्र सरकार ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के ज़रिए चलने वाली कई महत्वपूर्ण स्कीमों के बजट को पहले के मुक़ाबले कम कर दिया है.

हाथ से मैला ढोने वालों (manual scavengers) के पुनर्वास के लिए स्वरोजगार योजना का प्रस्तावित बजट पिछले वित्तीय साल यानी 2018-19 में 70 करोड़ रखा गया था. लेकिन इस साल इसके लिए प्रस्तावित बजट को घटाकर 30 करोड़ कर दिया गया है.

नशीली दवाओं के दुरुपयोग और मादक द्रव्यों का सेवन का पैटर्न और रुझान जानने हेतु राष्ट्रीय सर्वेक्षण का आंकलन करने के लिए शुरू की गई स्कीम में भी मौजूदा सरकार की कोई दिलचस्पी नहीं है. पिछले वित्तीय साल 2018-19 में इसके लिए 11 करोड़ का बजट था. लेकिन इस बार के बजट में इसे घटाकर सिर्फ़ 99 लाख रूपये कर दिया गया है.

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम (एनएसएफडीसी) का प्रस्तावित बजट पिछले वित्तीय साल 2018-19 में 137.39 करोड़ था. लेकिन इस बार के बजट में इसे घटाकर 100 करोड़ कर दिया गया है. इसी तरह एनबीसीएफडीसी के बजट में भी कटौती की गई है. साल 2018-19 में इसका प्रस्तावित बजट 100 करोड़ था, लेकिन इस वित्तीय साल में इसके लिए सिर्फ़ 80 करोड़ रूपये रखा गया है.

मौजूदा बजट में अनुसूचित जाति के छात्रों को मिलने वाले पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप के बजट में भारी कटौती की गई है. साल 2018-19 में इसके लिए 6000 करोड़ का बजट प्रस्तावित था. लेकिन इस बार के बजट में इसे घटाकर आधे से भी कम यानी 2926.82 करोड़ कर दिया गया है.

इस प्रकार हम देखते हैं कि अनुसूचित जाति के एजुकेशनल डेवलपमेंट का बजट जो कि साल 2018-19 में 6145.46 करोड़ था, उसे घटाकर इस बार के बजट में 3394.59 करोड़ कर दिया गया है. 

यही कहानी अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों को मिलने वाले पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप के साथ भी दोहराई गई है. साल 2018-19 के 983.25 करोड़ को घटाकर इस बार 909.10 करोड़ कर दिया गया है. प्री मैट्रिक स्कॉलरशिप का बजट भी 132 करोड़ की राशि से घटाकर वर्तमाम वित्तीय वर्ष में 120 करोड़ रूपये कर दिया गया है.   

यानी सरकार नहीं चाहती है कि अनुसूचित जाति या अन्य पिछड़ा वर्ग का किसी भी तरह का एजुकेशनल डेवलपमेंट हो, क्योंकि ये जब पढ़-लिख लेंगे तो फिर इन्हें वोट कौन करेगा और दंगों में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ लड़ेगा कौन?

बता दें कि पिछली बार भी सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के प्रस्तावित बजट में बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर से जुड़े संस्थाओं के बजट में भारी कटौती की गई थी.

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