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जब नंगे महात्मा और साधु पर कोई बहस नहीं तो फिर बुर्क़ा और हिजाब पर क्यों?

पहनावे के आधार पर किसी को शोषित या शोषक कहना कहीं से भी न्याय सांगत नहीं है. यह बात बुर्क़ा, हिजाब से लेकर साड़ी-पेटीकोट तथा अन्य सभी पहनावे पर लागू होती है. पहनावे के आधार पर किसी भी तरह का जजमेंट देना तथाकथित आधुनिकता की सार्वभौमिक संस्कृति को थोपना है…

पहनावे के आधार पर किसी को शोषित या शोषक कहना कहीं से भी न्याय सांगत नहीं है. यह बात बुर्क़ा, हिजाब से लेकर साड़ी-पेटीकोट तथा अन्य सभी पहनावे पर लागू होती है. पहनावे के आधार पर किसी भी तरह का जजमेंट देना तथाकथित आधुनिकता की सार्वभौमिक संस्कृति को थोपना है…

By Dr. Mukhtyar Singh

एक विवाद जो अक्सर चलता रहता है, हिजाब, नक़ाब या बुर्क़ा का. यह एक ऐसा विवाद है जिसके पक्ष एवं विपक्ष -दोनों में लाखों–करोड़ों लोग खड़े रहते हैं. यह विवाद सिर्फ़ भारत में ही नहीं, अपितु पूरी दुनिया में है. यह विवाद जब जब उठता है, बहुत सारे दृष्टिकोण लिए रहता है, मसलन —इस्लाम, धर्म, संस्कृति, महिला अधिकार, पितृसत्ता, मानव अधिकार आदि… 

आए दिन ऐसा होता रहता है जब कोई महिला बुर्क़ा पहन कर आ जाती है, तो कुछ लोग उसकी तारीफ़ करते हैं कि यह संस्कारी आचरणवाली भली महिला है, दूसरी तरफ़ ऐसे लोगों की लाइन लग जाती है, जो इसे पितृसत्ता का प्रतीक और महिला गुलामी की निशानी मानते हैं. और दोनों प्रकार के विचारको में तुरंत एक वैचारिक जंग शुरू हो जाती है. 

अभी हाल में एक फोटो में गीतकार-संगीतकार ए. आर. रहमान की एक बेटी खतीजा रहमान बुर्के़ में खड़ी हैं और दो बिना बुर्के़ में. इसको लेकर तुरंत एक विवाद शुरू हो गया.

कुछ लोगों का मानना है कि जो महिला बुर्क़ा या नक़ाब पहनती हैं, वह अपनी मर्ज़ी से नहीं पहनती हैं. यह तर्क कुछ सीमा तक सही लगता है. जब ऐसे लोग यह तर्क देते हैं तब उन्होंने अपने दिमाग़ में यह बात बिठाई होती है कि यह कपड़ा महिलाएं खुद नहीं पहनी है, बल्कि उनको पहनाया गया है.  लेकिन यहां मेरे सामने कई प्रश्न है कि यह बात बार-बार बुर्क़ा पर ही क्यों आकर रुक जाती है. 

कोई भी कपड़ा बचपन में इंसान खुद तय नहीं करता (न लड़का और न लड़की) बल्कि उनके माता–पिता तय करते हैं, और माता–पिता जिस कपड़े को पहना देते हैं, उसी का हमें अभ्यास पड़ जाता है. यह बात हर कपड़े के साथ है. 

हिन्दू परिवार में कोई महिला जन्म से साड़ी-पेटीकोट नहीं पहनती है. बड़े होकर पहनती है. लेकिन यह तर्क कोई भी साड़ी–पेटीकोट पर लागू नहीं करता. कोई भी विचारक–महिला या पुरुष – यह कहते नहीं देखा कि साड़ी–पेटीकोट असहज पहनावा है, यह उन्होंने खुद नहीं चुना बल्कि  उनको पहनाया गया है.

एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो किसी बुर्क़े पहनी महिला को देखते हैं, तो मान लेते हैं कि यह महिला परिवार में दबी हुई है, शोषित है. यह एक प्रकार कई स्वनिर्मित पूर्वधारणा (self created imposition) है, जो उन्होंने अपने मन में बना लिया है. जब उन्होंने यह धारणा मन में बना ली है, फिर वे इसके पक्ष में कुछ तर्क ढूढंते हैं. लेकिन वे एक बार भी बुर्के़ पहनी  महिला से नहीं पूछते कि उसका क्या नज़रिया है बुर्क़े पर. वे ऐसा करने की ज़रूरत भी महसूस नहीं करते. 

बुर्क़े या हिजाब में ज़्यादातर बहस करने वाले पुरुष होते है, समर्थन करने वाले भी और विरोध करने वाले भी, जिन्होंने कभी बुर्क़ा नहीं पहना. इस विवाद में महिलाएं कम ही होती है. 

बुर्क़े या हिजाब को देखकर ही कहना यह महिला शोषित है. यह तर्क अपने में खोखला है, जैसे —ए. आर. रहमान की तीन बेटियों में से एक बेटी बुर्के़ में है, और दो बिना बुर्के के. तो क्या यह कहा जा सकता है कि उसकी एक बेटी शोषित है, और दो स्वतंत्र जीवन जी रही हैं?  

कोई भी व्यक्ति ड्रेस के आधार पर शोषित या शोषक कहना बहुत ही जल्दबाज़ी है. इंदिरा गांधी साड़ी पहनती थीं, यह पहनावा/ड्रेस पुरुषों से अलग है, लेकिन वह भारत की सबसे ताक़तवर प्रधानमंत्री थीं. 

भारतीय हिन्दू ग्रामीण समाज में जो महिला शादीशुदा है, यदि वह सलवार–कुर्ता पहनती है, इसे अच्छा नहीं माना जाता. यह माना जाता है कि यह ‘चली हुई’ औरत है. यह बात मैं उत्तर प्रदेश की कर रहा हूं. जबकि पंजाब में सभी शादीशुदा औरतें सलवार–कुर्ता पहनती हैं. वहां ऐसी कोई धारणा नहीं है. एक ही देश में एक ड्रेस को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में महिला के आचरण तय कर दिए जाते हैं.

अलग-अलग ड्रेस में भी लोग पूरे मानव अधिकारों के साथ रह सकते हैं. और एक ही ड्रेस में लोगो की सोच भिन्न–भिन्न हो सकती है. आप लोगों ने अक्सर एक फोटो देखा होगा जिसमें डॉ. अम्बेडकर, राजेंद्र प्रसाद और जवाहरलाल नेहरू को संविधान भेंट कर रहे हैं, और तीनों शेरवानी में हैं, जबकि तीनों की विचारधाराओं में बहुत भिन्नता थीं. 

बुर्क़े का विरोध करने वाले अक्सर यही तर्क देते हैं की बुर्क़ा महिलाएं अपनी इच्छा से नहीं पहनती बल्कि परिवार द्वारा उन पर थोपा जाता है. इस तर्क के साथ कुछ प्रगतिशील हिन्दू पुरुष भी साथ खड़े  होते हैं. प्रगतिशील मुस्लिम यदा कदा शामिल होते हैं. रूढ़िवादी मुस्लिम को तो दूर से भगा दिया जाता है. फिर हिन्दू पुरुष आपस में बैठकर फ़ैसला कर लेते है कि बुर्क़ा कैसे ग़लत है?

जो हिन्दू समाज के पुरुष यह तर्क देते हैं कि महिला अपनी इच्छा से बुर्क़ा नहीं पहनती, बल्कि उन पर थोपा जाता है. वे अपने ही समाज में इस तर्क को लागू नहीं करते. हिन्दू समाज में कोई लड़की अपना पति खुद नहीं चुनती, लड़की के माँ–बाप उसके लिए पति चुनते हैं. लड़की विवाह से पहले उस पर हामी भरती है. वह उसका जीवन भर पति रहता है. क्या यह कहा जाएगा कि कोई लड़की पति खुद नहीं चुनती बल्कि पति उस पर थोप दिया गया है. क्या ऐसे पुरुष जो बुर्क़े को थोपा हुआ मानते हैं, क्या वे अपने ऊपर लागू करेंगे कि वे शादी के बाद किसी महिला पर थोप दिए गए हैं. जबकि शादी तो जीवन का बहुत बड़ा मुद्दा है, बुर्क़े की बजाए. बुर्क़ा तो सुबह पहनो, शाम को उतार दो जबकि पति तो जीवन भर रहता है.

विवाद का निदान इसी से होगा कि महिला से पूछा जाए कि बुर्क़ा उसने अपनी इच्छा से पहना है या नहीं. यदि वह हां कहती है, तो दूसरे को ज़्यादा पचड़े में पड़ने की ज़रूरत नहीं है. यह भी हो सकता है और इस बात से मैं इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि कुछ महिलाएं परिवार  के दबाव में बुर्का पहने भी हो, लेकिन कुछ उदहारण से यह नियम सभी पर लागू नहीं हो सकता. दबाव में बुर्क़ा पहनाना ग़लत है, तो यह कहना है जो महिला बुर्क़ा पहनी है, वह शोषित ही होगी, उतना ही ग़लत है. 

ईरान, अरब जैसे देशों में बुर्का बाध्यकारी है, जिसका समर्थन हरगिज़ नहीं किया जा सकता. किन्तु इसके साथ ही जिन देशो में बुर्क़े पर प्रतिबन्ध लगाया गया है, उसका भी समर्थन नहीं किया जा सकता. जिन देशो में बुर्क़े पर प्रतिबन्ध लगाया गया है, वहां महिलाएं बुर्क़ा पहले से ज़्यादा पहनने लगी हैं, क्योकि उन्हें लगता है कि यह उनकी संस्कृति पर हमला है. फ्रांस, बेल्जियम इसके उदाहरण हैं.

एक तर्क यह भी आता है कि जो पुरुष बुर्क़े का समर्थन करते हैं, वे खुद बुर्क़ा क्यों नहीं पहनते? वे लोग अपने पसंद के अनुसार कपड़े पहनने की आज़ादी (Right to wear the dress) को बुर्क़े का समर्थन समझ लेते हैं. Right to wear the dress अलग बात है और बुर्क़े का समर्थन अलग बात है. 

और कोई इस बात की समीक्षा करे, जो बुर्के़ का समर्थन करते हैं, वे खुद बुर्क़ा क्यों नहीं पहनते. हिन्दू समाज में भी पुरुष–महिला की अलग अलग ड्रेस है, दुनिया में कोई ऐसा समाज नहीं है, जहां पुरुष और महिला की ड्रेस समान हो. यह केवल मुस्लिम संस्कृति के साथ ही नहीं है. 

ज़्यादातर लोग जो बुर्क़े का विरोध करते है, वे अन्य सभी पहनावे/ड्रेस पर चुप रहते हैं. हिन्दू महिला साड़ी पहनती है. किसी समस्या में फंसने पर वह इस ड्रेस में तेज़ नहीं भाग सकती. भारत में हर किसी के अपने पहनावे हैं, कुछ मान्यताएं हैं. सिख पगड़ी पहनते हैं, तमिलनाडु के लोग पजामा की जगह चादर/धोती लपेटते हैं. हिन्दू और जैन धर्म में कुछ मान्यताएं बहुत अजीब हैं. जैन धर्म के महात्मा नंगे रहते हैं, कुम्भ मेला के साधु नंगे रहते हैं. मैंने इन पर किसी को बहस करते नहीं देखा. बहस होगी केवल बुर्क़ा पर. 

बुर्क़े के अलावा भी समाज में महिलाओं से संबंधित बहुत समस्याएं हैं, लेकिन उन पर कोई बात नहीं करता. बार में डांस करने वाली लड़कियों की क्या हालत होती है. उनकी सामाजिक आर्थिक हालत पर चर्चा बिलकुल नहीं होती. 

इस भाजपा सरकार में क़ानूनी और सामाजिक दोनों रूप से मुस्लिम निशाने पर हैं. कभी तीन तलाक़, आतंकवाद आदि से लेकर इतिहास की विकृत व्याख्या द्वारा उनको आतंकित करने का प्रयास किया जाता है. अभी मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार ने गाय हत्या के लिए तीन मुस्लिम युवकों पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (रासुका) लगाया है. 

इस वर्तमान दौर में मुस्लिम समाज भयभीत हैं, उपेक्षित हैं. वहीं कुछ रूढ़िवादी से लेकर प्रगतिशील लोग बुर्क़े और हिजाब को लेकर नए-नए विवाद उतपन्न करते रहते हैं. इस पूरे दृश्य में मुस्लिम इस बात के लिए बाध्य हैं कि वे अपनी संस्कृति की रक्षा करें क्योंकि सामाजिक और क़ानूनी दोनों तरीक़े से उनकी संस्कृति और धर्म पर हमला किया जा रहा है. 

(लेखक जेएनयू से पढ़े हैं. इन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे हैं. धार्मिक व राजनीतिक मामलों पर लगातार लिखते रहते हैं. इनसे singh.mukhtyar2009@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.)

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