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यहां जानिए! अल्पसंख्यकों ख़ास तौर पर मुसलमानों को इस बजट में क्या मिला है?

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published February 1, 2019 32 Views
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6 Min Read
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Afroz Alam Sahil, BeyondHeadlines

मोदी सरकार ने कभी बड़े ज़ोर-शोर से ‘सबका साथ –सबका विकास’ के नारे को प्रचारित किया था. सरकार का यह दावा था कि बजट के ज़रिए अल्पसंख्यक तबक़े की तमाम ज़रूरतों को वो न सिर्फ़ पूरा करेगी, बल्कि अल्पसंख्यकों का उत्थान कर उन्हें भी ‘मेनस्ट्रीम’ के साथ लाकर खड़ा कर देगी. मगर इस बार का ‘चुनावी बजट’ भी अल्पसंख्यकों, ख़ास तौर पर मुसलमानों के उम्मीद पर खड़ा उतरता दिखाई नहीं देता है. 

स्पष्ट रहे कि इस बार के बजट में मोदी सरकार ने अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय का कुल बजट 4700 करोड़ प्रस्तावित किया गया है. पिछले वित्तीय वर्ष में भी इस मंत्रालय का बजट 4700 करोड़ ही था. 

यानी इस बार के बजट अल्पसंख्यकों के लिए इस बजट में कुछ भी नया नहीं है. बल्कि जब हम इस बजट का आंकलन करते हैं, तो पता चलता है कि इस बार केन्द्र सरकार ने अल्पसंख्यकों के कई महत्वपूर्ण स्कीमों के बजट को ख़त्म या फिर पहले से कम भी कर दिया गया है. 

प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप का प्रस्तावित बजट इस बार कम होता नज़र आ रहा है. पिछले वित्तीय साल यानी 2018-19 में इस स्कीम के लिए 1269 करोड़ का बजट रखा गया था. लेकिन इस साल इसके लिए प्रस्तावित बजट को घटाकर 1100 करोड़ कर दिया गया है.

बताते चलें कि ये स्कॉलरशिप अल्पसंख्यक कल्याण के ख़ातिर सबसे महत्वपूर्ण योजना है, ताकि ग़रीब अल्पसंख्यक अपने बच्चों को स्कूल भेज सकें.

नेशनल माइनॉरिटी डेवलपमेंट एंड फाइनेंस कारपोरेशन का बजट भी इस वित्तीय साल में कम कर दिया गया है. पिछले वित्तीय साल यानी 2018-19 में इसके लिए 165 करोड़ का बजट था. लेकिन इस साल इसके लिए प्रस्तावित बजट सिर्फ़ 60 करोड़ रखा गया है.

समानता और भाईचारे से लेकर क़ौम की तरक़्क़ी के मक़सद से शैक्षिक, सामाजिक व आर्थिक उत्थान के साथ-साथ समाज में न्याय, स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के प्रति जागरूकता, अल्पसंख्यकों के पिछड़ेपन का पता लगाने हेतु शोध, इंफोर्मेशन और काउंसेलिंग सेन्टर्स, लाइब्रेरी, बुक बैंक आदि की स्थापना और आर्थिक रूप से अल्पसंख्यकों को मज़बूत करने हेतु खुद का रोज़गार स्थापित करने के लिए ट्रेनिंग जैसे कई महत्वपूर्ण मक़सद के लिए स्थापित की गई मौलाना आज़ाद एजुकेशन फाउंडेशन का बजट भी सरकार ने इस बार कम कर दिया है. पिछले वित्तीय साल यानी 2018-19 में इसके लिए 123.76 करोड़ का बजट था. लेकिन इस साल इसके लिए प्रस्तावित बजट सिर्फ़ 70 करोड़ रखा गया है.

विदेशों में अध्ययन के लिए शिक्षा ऋण पर ब्याज़ सब्सिडी (Interest Subsidy on Educational Loans for Overseas Studies) के लिए साल 2018-19 में 45 करोड़ का बजट था, लेकिन इसे इस साल घटाकर 30 करोड़ कर दिया गया है. 

बता दें कि केन्द्र में सरकार चाहे जिसकी भी हो, मगर कुछ स्कीमें ‘फ्लैगशिप’ स्कीमों के श्रेणी में आती हैं. उनके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं किया जाता है, क्योंकि वे एक बड़े तबक़े के मुस्तक़बिल से जुड़ी होती हैं. ऐसी ही एक स्कीम ‘मल्टी सेक्टोरल डेवलपमेंट प्रोग्राम’ (एमएसडीपी) यानी बहुक्षेत्रीय विकास कार्यक्रम है. लेकिन इस बार केन्द्र सरकार इस योजना को सदा के लिए समाप्त कर दिया है. हालांकि इसकी जगह प्रधानमंत्री जन विकास कार्यकर्म की शुरूआत की गई है. इस कार्यक्रम के लिए 1431 करोड़ का बजट प्रस्तावित है.

वहीं राज्य वक़्फ़ बोर्डों के अभिलेखों के कंप्यूटरीकरण का स्कीम को ख़त्म करके सरकार इस बार ‘क़ौमी वक़्फ़ तरक़्क़ी स्कीम एवं शहरी वक़्फ़ सम्पत्ति विकास योजना’ की शुरूआत की है. और इसके लिए 20.66 करोड़ का बजट रखा गया है. 

अल्पसंख्यकों की बाक़ी स्कीमों का चाहे जो हश्र हो, लेकिन सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए चलाए जा रहे स्कीमों की पब्लीसिटी का न सिर्फ़ हमेशा ध्यान रखा है, बल्कि इसके लिए साल दर साल अपने बजट में इज़ाफ़ा भी किया है. इस साल यही होता नज़र आ रहा है. साल 2018-19 में इसके लिए 55 करोड़ का बजट था. लेकिन इस साल इसके लिए प्रस्तावित बजट 60 करोड़ रखा गया है.

धोखाधड़ी की कहानी आई सामने

आपको जानकर हैरानी होगी कि अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय के बजट में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय स्कीमों को भी शामिल दिखाया गया है ताकि पहली नज़र में हर किसी को यही दिखे कि सरकार ने अल्पसंख्यक कल्याण के लिए दिल खोलकर अपना बजट बढ़ाया है. जबकि सच्चाई यह है कि इन स्कीमों और उनके लिए तय बजट को दोनों ही जगह दिखाया गया है. और ये बजट की रक़म भी कोई मामूली नहीं है. बल्कि पूरे 1573.25 करोड़ रूपये का बजट है.

गौरलब रहे कि इस आम बजट में देश के क़रीब 20 फ़ीसद अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए जो राशि आवंटित की गई है, वो कुल बजट का तक़रीबन 0.2 फ़ीसद ही है. अब आप खुद ही सोच लीजिए कि ‘सबका साथ -सबका विकास’ नारा कितना थोथला है.

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