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राष्ट्रवाद का बदलता संभाषण और भारतीय राजनीति

Syed Mohammad Shahnawaz for BeyondHeadlines

राष्ट्रवाद एक ऐसी अवधारणा है जिस पर वाद-प्रतिवाद तो काफ़ी हो चुकी है, परंतु अभी तक संवाद स्थापित नहीं हो पाया है. इसकी जटिलता का प्रमुख कारण इसकी बहुआयामी प्रवृत्ति है. राष्ट्रवाद को विश्व भर के कई विद्वानों द्वारा परिभाषित किया गया है, लेकिन उनके वैचारिक अवधारणा के संदर्भ में मत-भिन्नता है. 

पश्चिमी संदर्भ में, राष्ट्रवाद को एक समुदायिक चेतना के रूप में देखा जाता है, जो उनकी स्वधीनता की सोच और राजनैतिक स्वायत्तता पर आधारित है. दूसरी ओर मार्क्सवादी विचारधारा ने राष्ट्रवाद को वर्ग संघर्ष से जोड़ा है (लुई एल स्नाइडर 1964:12).

मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार राष्ट्रवाद मुख्यतः दो प्रकार के हैं. एक अभिजात वर्ग का राष्ट्रवाद जिनमें आपसी एकता सुदृढ़ है और दूसरा सर्वहाराओं का, जो विश्व के अलग-अलग भागों में अभी भी अपनी विविधता में एकता के लिए संघर्षरत हैं.

राष्ट्रवाद को शुरुआत में जन्म स्थान (प्राइमोर्डियल नेशनलिज्म) पर आधारित अपनापन के रूप में देखा जाता है और बाद में परिस्थितिनुसार यह रचनात्मक एवं संस्थागत राष्ट्रवाद से होते हुए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में बदल जाता. कहने का तात्पर्य यह है कि सर्वप्रथम सामुदायिक चेतना या अपनापन जन्म के आधार पर होता है, उसके बाद परिवार, जाति, संप्रदाय, धर्म, समाज, संस्था तथा संस्कृति से होते हुए अपनेपन और सामूहिकता का दायरा बढ़ता जाता है.

भारतीय उप-महाद्वीप में राष्ट्रवाद की पश्चिमी और मार्क्सवादी दोनों व्याख्यान प्रासंगिक हैं. यहां प्रारंभ में राष्ट्रवाद को औपनिवेशिक शासन के ख़िलाफ़ स्वाधीनता आंदोलन के रूप में देखा गया था; लेकिन ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य से भारत की स्वतंत्रता के बाद इसकी अवधारणा बदल गई. स्वतंत्रता के बाद अब भारत में इसका सार सांस्कृतिक और ज़ेनोफोबिक राष्ट्रवाद (अपनों से प्यार से ज़्यादा दूसरों से नफ़रत के अधार पर सामुदायिक एकता) की ओर मुड़ रहा है, जो भविष्य के लिए घातक ही नहीं अपितु प्रलयंकारी भी है.

मोटे तौर पर भारतीय ‘राष्ट्रवाद’ विचारधारा और प्रतीकवाद का एक सम्मिश्रण है, जो लोगों को अंग्रेज़ों के दमनकारी नीतियों से मुक्ति के लिए एकजुट किया था. ध्यान देने वाली बात यह है कि लोग अभी भी कहने को तो आज़ाद हैं, परंतु दमनकारी एवं जनता विरोधी नीतियों में कहीं से भी कमी नहीं आई है. 

पहले हम एक कंपनी (ईस्ट इंडिया कंपनी) के ग़ुलाम थे, आज कई कंपनियों ने मिलकर हमें ग़ुलाम बना रखा है. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि पहले के स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने भविष्य की पीढ़ी के लिए संघर्रत रहे पर आज की पीढ़ी को वर्तमान तक की फ़िक्र नहीं है. जो लोग अपने पिता के अत्याचार से माता को, और नेता के अत्याचार से जनता को बचा नहीं पा रहे हैं वो रविन्द्रनाथ टैगोर के राष्ट्रवाद की अवधारणा को सत्यापित करने की बात कर रहे हैं. 

आज, राष्ट्रवाद एक अवधारणा के रूप में, सर्वाधिक बहस किए गए विषय में से एक हो गया है. इसे कई लेखकों द्वारा परिभाषित किया गया है, हालांकि, सभी स्थानों एवं स्थितियों के लिए इसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं है. इसका प्रमुख कारण है कि, मानवता राष्ट्रों में विभाजित है, प्रत्येक राष्ट्र का अपना चरित्र, इतिहास और नियति है (एंथनी डी स्मिथ 2009: 61). 

इसलिए, इसकी स्थिति कई अन्य संस्थाओं पर निर्भर करती हैं. उदाहरण के तौर पर एक विशेष राष्ट्र या राज्य में रहने वाले एक विशिष्ट समुदाय की जातीय, सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक पहचान के आधार पर राष्ट्रवाद की अवधारणा निर्धारित होने लगी है.

मूल रूप से, राष्ट्रवाद एक वैचारिक तथा राजनैतिक अवधारणा है जो कई रूपों में उभर सकता है. यह व्यापक और प्रासंगिक व्याख्याओं का विषय है. स्मिथ ने अपने कार्य “एथनो-सिम्बोलिज्म एंड नेशनलिज्म” में राष्ट्रवाद के कुछ प्रमुख उद्देश्यों तथा लक्षणों की पहचान की है (एंथनी डी. स्मिथ 2009: 61-63), जो इस प्रकार हैं.

1. स्वायत्त (बाहरी हस्तक्षेपों से मुक्ति)

2. क्षेत्रीय एकीकरण, सामाजिक समन्वय, भाईचारा तथा सौहार्दपूर्ण समन्वय.

3. पारंपरिक अनुष्ठान और कलात्मक समानता के आधार पर पहचान.

4. अद्वितीय उत्पत्ति, इतिहास तथा संस्कृति के अधार पर प्रामाणिकता.

5. पैतृक क्षेत्र के अधार पर पहचान.

6. सामुदायिक पहचान के प्रति सम्मान.

7. सांस्कृतिक पहचान के आधार पर उत्तराधिकार की भावना.

8. गौरवशाली इतिहास पर आधारित भविष्य की अवधारणा.

मुख्यतः कुछ वैचारिक लक्ष्यों की अभिव्यक्ति, गौरवशाली इतिहास तथा एकजुट प्रयासों के आधार पर राष्ट्रवाद को मनुष्य के मन की स्थिति के रूप में देखा जाता है. जॉन हचिंग्सन (1994) के अनुसार, “दो विशिष्ट और कभी-कभी प्रतिस्पर्धी प्रकार के राष्ट्रवाद हैं; एक राजनैतिक राष्ट्रवाद जिसका उद्देश्य स्वायत्त राज्य की स्थापन है; और दूसरा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है जो सामुदायिक पहचान पर आधारित विशिष्ट समुदाय के नैतिक उत्थान की मांग करता है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पीछे का षड्यंत्र यह है कि यह हमेशा धारणा, अवधारणा, आस्था और विश्वास का मुखौटा लगा के आता है. 

धारणा पर तो हम कुछ तर्कपूर्ण सवाल कर सकते हैं परन्तु आस्था और विश्वास पर सवाल करना आज भी पाप माना जाता है. पाप की अवधारणा ही ग़ज़ब है. इसके संदर्भ का संस्कृति के नाम पर बहुत ही दुरुपयोग हुआ है. खैर, इतिहास गवाह है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का शायद ही कभी राष्ट्र के कल्याण और स्वायत्तता से कोई संबंध होता है (एंथनी डी. स्मिथ 2009: 66). 

हालांकि राजनैतिक राष्ट्रवाद हासिल करने के बाद; जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उद्देश्य समुदाय को पुनर्जीवित करना होता है तो धर्म पर आधारित राष्ट्रवाद उभरता है, जो एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव करता है और उसे हाशिए पर ले जाता दिखाकर बहुसंख्यकों के भावना का दुरुपयोग करता है. सांस्कृतिक एवं धार्मिक राष्ट्रवाद के प्रलयंकारी दुष्प्रभाव का उदाहरण हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान से बेहतर कोई नहीं हो सकता. अगर हम एक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान ही बनना चाहते हैं तो हमें विश्व की सर्वश्रेष्ठ सभ्यता कहलाने का कोई हक़ नहीं.

हचिंगसन ने राष्ट्रवाद को लोगों के विचारों और व्यवहार में दृढ़ता से निहित माना है (अर्नेस्ट गेलनर और एंडरसन 1985, दर्शन और सामाजिक विज्ञान, 15 (1): 73) और इश्तियाक अहमद ने राष्ट्रवाद को आत्मनिर्णय के राजनैतिक सिद्धांत के रूप में को देखा है (इश्तियाक अहमद 1996: 07). इस संदर्भ में राष्ट्रवाद को एक अलग घटना के रूप में देखा जाता है जो लोगों के विचार और व्यवहार को स्वाधीनता की प्रक्रिया में जोड़ती है.

अर्नेस्ट गेलनर का मानना है कि “राष्ट्रवाद आधुनिक या आधुनिकीकरण करने वाले समाजों के कुछ विशिष्ट गुणों का एक खोजपूर्ण और अपरिहार्य प्राकृतिक लक्षण है. (अर्नेस्ट गेलनर 1981 “राष्ट्रवाद”, सिद्धांत और समाज, 10: 6, p.753). 

उन्होंने राष्ट्रवाद को एक राजनैतिक सिद्धांत के रूप में माना है जो राजनैतिक और राष्ट्रीय इकाई को एक सूत्र में बांधता है. इसके अलावा, वह बताते हैं कि, “राष्ट्रवाद एक संतोष की भावना या क्रोध की भावना हो सकती है जो सिद्धांत के उल्लंघन या उसकी पूर्ति से उत्पन्न होती है.” 

आगे गेलनर कहते हैं कि राष्ट्रवादी सिद्धांतों का कई कारणों से उल्लंघन किया जा सकता है, जिससे समूहों के बीच असहनीय भावना उभरती हो. जैसे कि राष्ट्रों की सीमाओं पर राजनैतिक नियंत्रण की कमी तथा शासक के विशेष समूहों के पक्ष में निर्णय लेने की मजबूरी (अर्नेस्ट गेलनर 1983: 01) महत्वपूर्ण हो सकती है.

कोहन के अनुसार राष्ट्रवाद भाषा, धर्म एवं रीति-रिवाज और आधारित एक विशेष समूह के बीच कुछ अंतर्निहित समानता के आधार पर एक विशिष्ट राजनैतिक भावना है. उन्होंने राष्ट्रवाद को एक ऐसे विचार के रूप में परिभाषित किया जो एक व्यक्ति के मस्तिष्क और हृदय को नए विचारों और नई भावनाओं से भरता है और उसे अपनी चेतना को संगठित कार्यकर्मो में बदलाव के लिए प्रेरित करता है. उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रवाद की वृद्धि लोगों को राजनैतिक समरूपता में आत्मसात करने की एक प्रक्रिया है. (मिक्सी जोनाथन 2001: 109)

जुर्गइंसमेर ने अपनी पुस्तक, “रिलीजियस नेशनालिज्म कांफ़्रॉन्ट्स द सेक्युलर स्टेट (1994)”, में पाकिस्तान के उद्भव को धर्म आधारित राष्ट्र-निर्माण के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में देखा है, जहाँ पहले धार्मिक पहचान के अधार पर राष्ट्र बना और बाद में भाषा और संस्कृति ने एक ही धर्म के मानने वालों को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया, परिणामस्वरूप बांग्लादेश अस्तित्व में आया. यहां भी एक ही राष्ट्र (बांग्लादेश) में दो समूह हो गए. एक ने भाषाई राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया जिसे हम बंगाली राष्ट्रवाद के नाम से जानते हैं और दूसरे ने क्षेत्र के आधार पर बांग्लादेशी राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया. 

कहने का तात्यपर्य यह है कि राष्ट्रवाद ने हमेशा अपने विरोध में दूसरे प्रकार के राष्ट्रवाद को हमेशा खड़ा किया है जिससे समाज अलग-अलग भागों में बंटता चला गया है. राष्ट्रवाद उस एक प्याज की भांति है जिसका हर तह खुलता जाता है और अंत में प्याज़ अपना सामूहिक स्वरूप खो देता है.

जुर्गइंसमेर के अनुरूप; एंडरसन का तर्क है कि, “राष्ट्रवाद राजनीति या तर्क का विषय नहीं, लेकिन धर्म के आधार पर भावनात्मक एकजुटता है. कई बार यह देखा गया है कि सामुदायिक चेतना का आधार धार्मिक पहचान के इलावा और कुछ नहीं होता” (जोनाथन मिक्सी 2001: 109). 

पाकिस्तान के उभार के संदर्भ में यह माना जा सकता है कि धर्म ही एक ऐसा कारक था जिसने दो अलग-अलग क्षेत्रों (1200 मील) के लोगों को एक राज्य (पाकिस्तान) की मांग के लिए एकजुट किया. धर्म (इस्लाम) के अलावा दोनों पक्षों (पूर्वी पाकिस्तान और सर्वश्रेष्ठ पाकिस्तान) के लोगों के पास कुछ भी समान नहीं था. उनके पास न केवल भारत द्वारा अलग की गई प्रादेशिक दूरी थी, बल्कि वे जातीयता, परंपराओं, संस्कृतियों, अनुष्ठानों और कई और चीजों के मामले में भी एक दूसरे से बहुत भिन्न थे.

उपर्युक्त कुछ परिभाषाओं से यह स्पष्ट है कि राष्ट्रवाद को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा गया है जिसके माध्यम से एक जातीय-सांस्कृतिक पहचान स्वाधीनता की ओर बढ़ती है. इसने अठारहवीं सदी के फ्रांसीसी “1789 की क्रांति” (उमुट ओजकिरीमली 2000: 12) के अंत के बाद से स्वाधीनता की मांग के रूप में अपनी जड़ें जमा ली हैं. यह राष्ट्रवाद के उदय का ही परिणाम था कि विविधता से भरे समूह वाले कई साम्राज्य विघटित हो गए और नए स्वतंत्र राज्य समरूप सांस्कृतिक पहचान के साथ उभरे.

तीसरी दुनिया में राष्ट्रवाद का अंतिम लक्ष्य स्वतंत्र राज्य का दर्जा हासिल करना था. इस तरह, तीसरी दुनिया में राष्ट्रवाद को जातीय-सांस्कृतिक पहचान के आधार पर लोगों को एकजुट करने और फिर किसी विशेष क्षेत्र पर अपने संप्रभु अधिकारों का दावा करने की प्रक्रिया के रूप में भी देखा जा सकता है.

लुई स्नाइडर ने राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय आंदोलनों को सामंती या साम्राज्यवादी शक्तियों के ख़िलाफ़ संघर्ष के रूप में देखा है (लुई एल स्नाइडर 1964: 12). ऐसे कई विद्वान हैं जिन्होंने विकासशील देशों के संदर्भ में राष्ट्रवाद को देखा है और उसी के अनुसार इसे परिभाषित करने की कोशिश की है. ऐसे कई विद्वान हैं जो औपनिवेशिक शासन के ख़िलाफ़ संघर्ष में राष्ट्रवाद की भावना को आधारभूत स्तंभ मानते हैं.

तीसरी दुनिया में, कई देशों के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रवाद ने अत्यंत प्रभावी भूमिका निभाई है. हालांकि राष्ट्रवाद की प्रकृति प्रत्येक राज्य में अपने लोगों और राजनैतिक कुलीनों की विशिष्ट पहचान के कारण समान नहीं थी. कुछ राज्यों के स्वतंत्रता आंदोलनों का अध्ययन करने पर हम यह पाते हैं कि वहां राष्ट्रवाद समग्र संस्कृति और प्राचीन परंपरा के आधार पर लोगों को एकजुट किया है; जबकि अन्य स्थानों में जातीय-सांस्कृतिक और भाषाई पहचान लोगों की आकांक्षाओं को संयोजित करने के लिए बहुत प्रभावी साधन थे. सभी मामलों में, राष्ट्रवाद की भूमिका समाज के विभिन्न वर्गों को एक करने के लिए थी, चाहे वह किसी भी प्रकार की पहचान हो. अतः यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रवाद राजनैतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एक समूह या समुदाय द्वारा माने जाने वाली एक वैचारिक भावना है. राष्ट्रवाद के नकारात्मक और सकारात्मक दोनों अर्थ निहितार्थ हो सकते हैं. 

उदाहरण के लिए, हिन्दू राष्ट्रवाद में नागरिकता की प्राथमिक पहचान के लिए राष्ट्र हित से ज़्यादा हिन्दू होना आवश्यकता है. सकारात्मक नोट पर, इसने सभी हिन्दुओं को एक समान मंच पर एकजुट किया है. परन्तु वास्तव में यह सामूहिक रूप से जो हिन्दू नहीं हैं उनकी सांस्कृतिक पहचान को समाप्त करने का आडम्बर है जो कि किसी भी धर्मनिरपेक्ष समाज या रास्ट्र के लिए विघटनकारी होता है.

अपनी पुस्तक नेशनलिज्म: थ्योरीज़ एंड केसेस में, लेखक एरिका हैरिस (2009) ने राष्ट्रवाद की वैचारिक बुनियाद और समकालीन बहसों का खूबसूरती से उदाहरण दिया है. शुरुआत में, वह राष्ट्रवाद को एक सर्वव्यापी सोच के रूप में लेती हैं जो आम लोगों के दिमाग़ को प्रभावित करती है. हैरिस के अनुसार, राष्ट्रवाद की भावना कभी-कभी नाटकीय रूप से नियंत्रण से परे होती है और यह राजनैतिक तथा सांस्कृतिक पहचान को भी प्रभावित करती है. वह इस तर्क को नहीं मानती हैं कि सांस्कृतिक पहचान दूसरों के लिए शत्रुता का कारण बनती है लेकिन यह मानती हैं कि विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के आधार पर आसानी से दूसरों का शोषण किया जा सकता है. 

इसके अलावा उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद एक सार्वभौमिक विचार है, लेकिन किसी एक परिभाषा को सार्वभौमिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता है. हैरिस के अनुसार राष्ट्रवाद एक राजनैतिक विचारधारा से संबंधित ज़रूर है, परन्तु यह ऐतिहासिक जड़ों और समकालीन अभिव्यक्ति के बीच संबंध भी प्रदान करता है. 

उनका मानना है कि, राष्ट्र के अर्थ तथा उत्पत्ती के बीच वैचारिक विवाद के बावजूद, राष्ट्रवाद को हमेशा व्यक्तिगत या सामूहिक पहचान से संबंधित और वैचारिक परिणामों की एक भावना के रूप में समझा जाता है. इतिहास, स्थान, भाषा और रिवाज पर आधारित एक ही राष्ट्रवाद में विश्वास रखने वाले विशिष्ट समूहों के बीच अपनेपन की भावना आम होती है. 

लिया ग्रीनफील्ड ने अपनी पुस्तक, एडवांस इंट्रोडक्शन टू नेशनलिज्म में राष्ट्रवाद को अपने समय की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनैतिक घटना बताया है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद आधुनिकता का सांस्कृतिक ढांचा है और इस प्रकार यह विशेष रूप से आधुनिक अनुभव के सभी आयामों को परिभाषित करता है.

जैसे-जैसे समाज विकसित हो रहा है, राष्ट्र और राष्ट्रवाद का संभाषण भी बदल रहा है. ‘राष्ट्र’ शब्द की उत्पत्ति एक लैटिन शब्द ‘natio’ से हुई थी जिसका अर्थ है शारीरिक रूप से पैदा होने वाली कोई चीज़.

प्रारंभ में इसे केवल उन विदेशी मनुष्यों पर लागू किया गया था, जो रोम में रहते थे और रोम के नागरिक नहीं माने जाते थे. उन्हें जानवरों से भी ज़्यादा बर्बर माना जाता था. जब मध्य युग में लैटिन भाषा सीखने की एक भाषा बन गई, तो शब्द natio का उपयोग केवल विदेशी के लिए एक शब्द के रूप में किया जाने लगा. इसी अर्थ में यह पहली बार पूरे यूरोप में धार्मिक अध्ययन केंद्रों में छात्रों के समुदायों के लिए लागू किया गया था. 

धीरे-धीरे पर्यवेक्षकों के साथ छात्रों के विश्वविद्यालय आने-जाने वाले मार्गों का नाम नेशन्स रखा जाने लगा. इसके बाद natio को किसी विशेष विचारधारा के मानने वाले समुदाय को संदर्भित किया जाने लगा.

आगे चलकर “राष्ट्र” को असाधारण उच्च पदस्थ व्यक्तियों, सर्वोच्च प्राधिकरण, सांस्कृतिक और राजनैतिक अभिजात वर्ग के समूह के रूप में निरूपित किया गया (ग्रीनफील्ड 2016: 11) 

शब्द ‘राष्ट्र’ (जैसा कि आज इसका इस्तेमाल किया जाता है) 15वीं शताब्दी के अंत में और 16वीं शताब्दी के प्रारंभ में इंग्लैंड में उभरा, जब राष्ट्र अपने सुगम अर्थों में “people” शब्द का पर्याय बन गया. यहां तक कि शब्द ‘people’ (उस समय सभी यूरोपीय भाषाओं में) को विशेष रूप से समाज के निचले, सामान्य वर्गों के लिए संदर्भित किया गया था, जिनके पास कोई अधिकार नहीं था. यह “rabble (निम्न वर्ग)” या “plebs” (जनसाधारण) का पर्याय था. इसलिए, “nation” के साथ “people” की बराबरी करना, प्रतीकात्मक रूप से इन वर्गों को ऊंचा करना था जिन्हें पहले से ही दब्बू माना जाता था. उच्च और निम्न वर्गों को एक साथ एक संप्रभु समुदाय के बराबर लाने के लिए उन्हें कुलीन वर्ग के अधिकार के साथ संपन्न किया गया तथा सभों को एक सामान्य सदस्य के रूप में मौलिक अधिकार दिए गए. अपनी संपूर्णता में सामाजिक चेतना विकसित हुई, जिससे वर्तमान राष्ट्रवाद का जन्म हुआ (मूल रूप से चेतना का एक नया रूप, जिसमें संप्रभु राष्ट्र का विचार निहित है.) 

16 वीं शताब्दी के शुरुआत में, राष्ट्रवाद को अंग्रेज़ी शब्दकोश में एक शब्द के रूप में जोड़ा गया, जिसे थॉमस एलियट द्वारा 1538 में प्रकाशित किया गया था (ग्रीनफील्ड 2016: 12). धीरे-धीरे राष्ट्रवाद का अध्ययन राष्ट्र के विकास और प्रकृति के विश्लेषण के लिए आवश्यक होने लगा. यह राजनैतिक स्वायत्तता और पराधीनता से आज़ादी के लिए एक राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में विभिन्न विविधताओं को एक सूत्र में पिरोहने का एक महत्वपूर्ण उपकरण रहा है (क्रेग कैलहोन 1993: 213). 

रिचर्ड हैंडलर के विचार में, “राष्ट्रवाद एक विचारधारा है जो सीमा, निरंतरता और विविधता में समरूपता से संबंधित है” (रिचर्ड हैंडलर 1988: 06)

सत्रहवीं शताब्दी के ब्रिटिश राजशाही के ख़िलाफ़ विद्रोह (क्रेग कैलहौन 1993: 212) और अठारहवीं शताब्दी की फ्रांसीसी क्रांति 1789 (युमट ओज़किरिमली 2000: 12) के बाद से राष्ट्रवाद का विचार बहुत अधिक प्रचलित हुआ है. शुरू में राष्ट्रीयता के सिद्धांत पर सभी मामलों पर लागू होने वाले एक सामान्य सिद्धांत को लागू करने, या सुसंगत और व्यवस्थित तरीक़े से प्रत्येक विरोधाभास को हल करने का कोई प्रयास नहीं हुआ. (एंथनी डी. स्मिथ 1998: 10) 

लेकिन, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवाद के विघटन की प्रक्रिया और तीसरी दुनिया में नए राज्यों की स्थापना के कारण राष्ट्रवाद सामाजिक एवं राजनैतिक अनुसंधान का प्रमुख विषय-वस्तु बन गया (युमट ओजकिरिमली 2000: 13).

अंत में यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रवाद के सार को भले ही पूरा समझा जा सकता है लेकिन इसकी विशेषताओं तथा लक्षणों को अच्छी तरह से परिभाषित करना कठिन है, इसलिए भारत के संबंध में राष्ट्रवाद की विशेषताओं को परिभाषित करने की आवश्यकता है. राष्ट्रवाद को किसी राजनैतिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए एक विचारधारा या एक अवधारणा के रूप में लिया जा सकता है, लेकिन जब राष्ट्रवाद एक विशेष राष्ट्र के प्रति किसी विशेष समुदाय की भावना या निष्ठा को उकसाने का उपकरण बन जाए तो यह अन्य निवासियों के साथ-साथ संप्रभु राष्ट्र के लिए भी समस्या पैदा करता है. 

मूलरुप से राष्ट्रवाद किसी विशेष काल्पनिक समुदाय के बीच अपनेपन की भावना पैदा करता है, लेकिन यह अपने दुश्मनों की खोज भी उसी काल्पनिक समुदाय की मांग को प्रचारित करने के लिए करता है, जबकि देशभक्ति केवल राष्ट्र के लिए प्रेम और निष्ठा की भावना है. इसलिए, ‘राष्ट्रवाद’ और ‘देशभक्ति’ को अलग-अलग समझने की आवश्यकता है. राष्ट्रवाद के अपने सकारात्मक और नकारात्मक पहलू हैं लेकिन राष्ट्रवाद का नकारात्मक पहलू साहित्य में स्पष्ट रूप से स्पष्ट नहीं है. 

देशप्रेम, राष्ट्रवाद से ज़्यादा उपयोगी शब्द है क्योंकि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद किसी भी प्रकार का राष्ट्रवाद अपने दुश्मन को तलाशता है जबकि देशप्रेम पूरे राष्ट्र और उसमें रहने वाले सभी लोगों में एकजुटता की भावना को प्रफुल्लित करता है. 

अतः अपने देश भारत के लिए राष्ट्रीयता से ज़्यादा भारतीयता की भावना जगाने की आवश्यकता है. आज़ादी के पश्चात राजनेताओं द्वारा किसी भी प्रकार के राष्ट्रवाद का प्रचार असल में राजनैतिक विफलताओं को छुपाने का एक ढोंग है. आधुनिक युग में जबसे ‘राजनीति’ से ‘नीति’ ग़ायब हुई है तथा जबसे नेतागण राज करने की बात करने लगे हैं, एक नए राष्ट्रवाद का उदय हुआ है.

(लेखक सैय्यद मोहम्मद शाहनवाज़ एक राजनीतिक विचारक और लेखक हैं. वर्तमान में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़ से राष्ट्रवाद पर पीएचडी कर रहे हैं. इन से [email protected] पर सम्पर्क किया जा सकता है.)

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