Election 2019

लोकसभा चुनाव में ब्राह्मण क्या सोच रहा है?

Abhay Kumar for BeyondHeadlines

बिहार में गंडक नदी के किनारे बसा एक गांव पीपरा है. ज़िला मुख्यालय मोतिहारी से 35 किलोमीटर दूर और दक्षिण पश्चिम दिशा में बसा है. चम्पारण के अन्य गांवों की तरह पीपरा में भी अंग्रेज़ों की ज़ोर ज़बरदस्ती की वजह से किसान नील की खेती करने को मजबूर थे. नगदी फ़सल नील की जगह किसान अनाज बोना चाहते थे. इन्हीं समस्या को लेकर गांधी के नेतृत्व में 1917 में चम्पपारण सत्याग्रह चला. आंदोलन के बाद नील की खेती बंद तो हो गई मगर आज भी पीपरा के खेत “लीलवा”  के नाम से जाने जाते हैं.

जहां तक पीपरा गांव की डेमोग्राफ़ी की बात है तो यहां ब्राह्मणों की आबादी अच्छी ख़ासी है. मिश्र, उपाध्याय, शुक्ल और तिवारी जैसी ब्राह्मण जातियां बड़ी संख्या हैं. स्वर्ण वर्ग की अन्य जाति कायस्थ और भूमिहार हैं, मगर इन का अनुपात बहुत कम है. पिछड़ी जातियों में यादव, कोयरी, कुर्मी, नुनिया की संख्या अधिक है. मुसलमान और दलित समाज के सैकड़ों परिवार इस गांव में रहते हैं. मोटे अनुमान के मुताबिक़ बहुसंख्यक गैर स्वर्ण समाज ही है, मगर गांव पर दबदबा ब्राह्मणों का है. बिहार में कर्पूरी ठाकुर और लालू के उभार के बाद सवर्णों का शोषणकारी शिकंजा ढीला पड़ा है, मगर ब्राह्मणों का वर्चस्व अब भी बहुत हद तक बरक़रार है.

गांव के स्वर्ण पहले कांग्रेस के कट्टर समर्थक होते थे. तब नेहरू गांधी परिवार “शुद्ध” ब्राह्मण जाति का माना जाता था. 1990 के दशक में जब मंडल राजनीति का उभार हुआ तब जनता दल के उम्मीदवार को हराने के लिए यहां के ब्राह्मण कांग्रेस के उम्मीदवार के पक्ष में बूथ लूटा करते थे. मगर भाजपा के उभार ने ब्राह्मणों की राजनीतिक सोच को बदल दिया है. आजकल इनके नज़दीक कांग्रेस ‘मुसलमानों की पार्टी’ हो गई है और वे इस बात से ‘दुखी’ हैं कि इंदिरा गांधी ने एक ‘मुस्लिम’ से शादी की. उनको लगता है कि फ़िरोज़ नाम का हर शख्स सिर्फ़ मुस्लिम होता है.

गांव के बांध से सटे शुक्लाजी की डेयरी की दुकान है, जहां शाम के वक़्त गांव भर के बहुत सारे ग्वाले बाल्टी में दूध भर कर बेचने के लिए आते हैं. एक शाम मैं भी वहां मौजूद था. मैंने देखा कि शुक्ला जी का हट्टा कट्टा नौजवान बेटा ग्वालों का दूध खरीद रहा था. वह दूध को छोटी डिबिया में डाल कर मशीन की मदद से फैट की मात्रा की जांच कर रहा था. जिस दूध में जितना ज़्यादा फैट की मात्रा थी, उसे उतना ज़्यादा दाम मिलना था.

इसी बीच शुक्लाजी दूध बेच रहे ग्वालों को मुफ्त में चुनावी प्रवचन देने लगे —’इस बार भी मोदीजी ही आ रहे हैं. ठगबंधन [महागठबंधन] कहीं मैदान में नहीं है!’

पास बैठे दूधवाले उनकी बातों को सुन रहे थे. उनमें से कुछ अपना सर भी हिला रहे हैं. मैंने महसूस किया कि सर हिला कर वह शुक्लाजी को यह यक़ीन दिला रहे थे कि उनकी बात बड़ी अहम है. सवर्णों के दबदबे की वजह से हाशिये पर जी रहे लोग उनकी हां में हां मिलाना अपनी खैरियत समझते हैं.

शुक्लाजी का प्रवचन जारी रहा. मोदी की तारीफ़ के साथ उन्होंने लालू प्रसाद की बुराई करनी शुरू कर दी —‘लालू के राज में बिहार का विनाश हो गया. लालू ने जानवरों का चारा तक खा लिया. लालू के राज में बिहार में जंगलराज था. जेल में वह अपनी करनी का फल भोग रहे हैं.’ लालू के साथ साथ शुक्लाजी ने तेजस्वी को भी नहीं बख्शा -‘तेजस्वी अंगूठा छाप है.’

पास बैठे दूधवाले भी उनकी बात को काटने की हिम्मत नहीं कर रहे थे. मैं जानबूझ कर इस बहस में नहीं पड़ना चाहता था. मुझे लगा कि शुक्लाजी सिर्फ़ बोलने के मूड में थे. वह कुछ सुनने को तैयार नहीं थे.

मेरे पास गांव का एक ब्राह्मण नौजवान भी बैठा हुआ था. उसने मामूली पढ़ाई की है और आजकल चेन्नई में नौकरी करता है. आर्थिक हालत बहुत मज़बूत नहीं है, फिर भी वह आर्थिक मसले पर काम और साम्प्रदायिक मुद्दों पर ज़्यादा बात करने में दिलचस्पी रखता है. अब वह भी शुक्लाजी की बात सुनकर जोश में आ गया और लालू की खिंचाई करने में कुछ ज़्यादा ही आगे बढ़ गया— ‘लालू के राज में सवर्णों को नौकरी नहीं दी गई. जानबूझ कर उनके साथ अन्याय किया गया. लालू ने बिहार का बेड़ा गर्क कर दिया.’

आख़िरकार मैं अपने आप को रोक नहीं सका और कहा— ‘जिस लालू पर आप स्वर्णों को नौकरी से दूर रखने का इल्ज़ाम लगा रहे हैं. क्या आप यह साबित कर सकते हैं कि लालू के राज में ब्राह्मणों को नौकरी नहीं मिली और लालू के बाद की सरकारों ने ब्राह्मणों को खूब सरकारी नौकरी दी?’

मेरी बातों को शुक्लाजी और ब्राह्मण नौजवान सुन रहे थे. ‘जहां तक बात चारा घोटाले की तो क्या यह सच नहीं है कि इस घोटाले में लालू के अलावा दर्जनों लोग भी अभियुक्त हैं? अगर “चारा चोर” लालू को कहा जा रहा है तो फिर यह उपाधि पंडित जगन्नाथ मिश्रा को क्यों नहीं दी जाती है? क्या इस बात में थोड़ी भी सच्चाई नहीं है कि चारा घोटाले में लालू को जानबूझ कर ज़मानत नहीं दी जा रही है? क्या लालू के साथ बदले की कार्रवाई नहीं हो रही है? जब उन्होंने अपने ही खर्च पर बीमारी की हालत में रांची से दिल्ली जाने का अनुरोध किया तो उनको क्यूं रोक दिया गया?’

इन प्रश्नों को सुनकर शुक्ला जी और ब्राह्मण नवजवान गुस्से से लाल हो गए. दोनों के कहा कि लालू अपने ‘पाप के कामों का फल जेल में भोग रहा है.’

पास बैठे दूधवाले हमारी बातों को ग़ौर से सुन रहे थे. हमारी बहस को सुनकर कुछ और लोग आस पास से इकट्ठा हो गए. शुक्लाजी का हट्टा कट्टा बेटा दूध के फैट की मात्रा का गणना करते हुए हमारी बातों को सुन रहा था. फैट के हिसाब से वह किसी को 26 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से तो किसी को 42 रुपये लीटर के हिसाब से क़ीमत दे रहा था. पैसा दूधवालों को नगद नहीं मिलता है बल्कि उनके बैंक खाते में आता है. यहीं आकर मुझे मालूम हुआ की जिस एक लीटर फूल क्रीम दूध के लिए हम मदर डेयरी को 50 रुपये से ज़्यादा देते हैं उसके लिए दूधवालों को सिर्फ़ 26 रुपये मिलता है.

कुछ देर के बाद में शुक्लाजी की डेयरी से निकल कर, मैं गांव के ब्राह्मणों की टोली से गुज़रा. एक ऐसी टोली मिश्र ब्राह्मणों की है. उनके घर गांव के मुख्य सड़क के पश्चिम दिशा में बसा हुआ है. उनके बीच यह भी अंधविश्वास है कि रोड से पूरब बसने पर उनका विनाश हो जाएगा. हालांकि ज़मीन के आपसी बंटवारे की वजह से कुछ मिश्र ब्राह्मण सड़क से पूरब भी जा बसे हैं और सुखी भी नज़र आ रहे हैं.

मिश्र ब्राह्मणों की टोली में एक रिटायर्ड शिक्षक का घर था. रिटायर्ड शिक्षक एक ज़माने में सीपीआई के नेता हुए करते थे. मगर कम्युनिस्ट पार्टी के ख़त्म होते दबदबे के बाद वह कांग्रेस को वोट करते हैं. मगर उनके घर में बाक़ी सब भाजपा के कट्टर समर्थक हैं. उनका नौजवान पौत्र अभी भाजपा का प्रखंड नेता है. उसने बताया कि स्थानीय भाजपा सांसद उसका फ़ोन हर वक़्त रिसीव करता है.

‘आरक्षण ख़त्म होना चाहिए’, रिटायर्ड शिक्षक के पौत्र ने ज़ोर से बोला. उसने कहा कि ‘समाज में आरक्षण की वजह से तनाव बढ़ रहा है.’

उसके सवालों का जवाब देते हुए मैंने तर्क दिया कि ‘आरक्षण की प्रासंगिता आज भी बनी हुई है. ब्राह्मणों की आबादी भारत में एक अनुमान के मुताबिक़ 4 से 5 प्रतिशत है. मगर जब हम किसी भी संस्था में जाते हैं तो देखते हैं कि ब्राह्मण जाति के लोग वहां भरे हुए हैं. संसद, मीडिया और यूनिवर्सिटी हर तरफ़ ब्राह्मण लोगों का दबदबा है. वहीं दूसरी तरफ़ दलितों की आबादी भारत में 15 फ़ीसद है मगर उनका प्रतिनिधि हर तरफ़ न के बराबर है. पिछड़ों की हालत भी बहुत बेहतर नहीं है.’

आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने की उसकी मांग के विरोध में तर्क देते हुए मैंने कहा, ‘यह इसलिए कारगर नहीं है क्योंकि भारत में जाति की चेतना ज्यादा है. मिसाल के तौर पर एक ब्राह्मण लड़की की शादी एक ब्राह्मण शिक्षक से आसानी से हो जाती है मगर जब एक दलित शिक्षक एक ब्राह्मण लड़की से शादी का प्रस्ताव लेकर जाता है तो उसको जान से मार दिया जाता है.’

आगे मैंने कहा कि ‘अगर आर्थिक स्थिति की बात की जाए तो क्या यह सच नहीं है कि 70 प्रतिशत के आसपास दलित भूमिहीन हैं? क्या यह सच्चाई नहीं है कि गरीब का रिश्ता जाति से भी है? जैसे जैसे आप ऊंची जाति से नीची कही जाने वाली जातियों की तरफ़ बढ़ते हैं तो क्या गरीबी भी बढ़ने नहीं लगती है?’

मैंने नोटिस किया कि रिटायर्ड शिक्षक का पौत्र किसी भी तर्क को सुनने के लिए तैयार नहीं था. वह एक सवाल के बाद दूसरे सवाल पर कूद जाता. आरक्षण के बाद उसने मोदी, मुसलमान और पाकिस्तान की बहस छेड़ दी —‘मोदी नहीं होते तो देश की रक्षा कौन करता? कांग्रेस भला देश की क्या रक्षा कर पाएगी? उसके शासन में पाकिस्तानी सेना के भारतीय जवानों का सर काट कर ले जा रही थी.’

जब मैंने कहा कि ‘मोदी से पहले देश की हिफ़ाज़त कौन कर रहा था?’ जवाब नहीं होने की वजह से उसने बात घुमा दी और कहा कि ‘आप पाकिस्तान का समर्थन करते हैं. आप मुसलमान और पाकिस्तान के समर्थन में उर्दू में लेख लिखते हैं.’

क्या उर्दू पढ़ना-लिखना पाकिस्तान का समर्थन करना है? मैं उसकी बात सुनकर चकित हो गया. फिर मैंने उसको समझने की कोशिश की और कहा —‘क्या यह हक़ीक़त नहीं है कि महात्मा गांधी की हत्या से संबंधित एफ़आईआर उर्दू में लिखी गई थी? अगर ऐसा है तो फिर क्या एफ़आईआर दर्ज करने वाले दिल्ली पुलिस के अफ़सर भी पाकिस्तानी हो गए? क्या यह सच नहीं है कि उर्दू और हिन्दी एक ही भाषा है और दोनों भारत में पली-बढ़ी और जवान हुई हैं? आज जिस उर्दू को पाकिस्तान से जोड़कर देखा जा रहा है उस भाषा में आज़ादी के समय तक कामकाज होता था.’

मगर वह यह सब सुनने को रिटायर्ड शिक्षक का पौत्र बिल्कुल भी तैयार नहीं था. अब वह भारतीय पायलट अभिनंदन की रिहाई का क्रेडिट मोदी को देने लगा और कहा कि ‘अगर मोदी न होते तो अभिनंदन के टुकड़े टुकड़े पाकिस्तान कर दिया होता.’ फिर उसने मोदी की विदेश नीति का बखान किया और कहा कि मोदी की वजह से पाकिस्तान और चीन भारत से डरे हुए हैं.

इस पूरे बहस के दौरान विडंबना देखिए कि इस ब्राह्मण नौजवान ने एक बार भी बात शिक्षा, रोज़गार और स्वास्थ्य पर नहीं की. एक बार भी उसने स्कॉलरशिप और रोज़गार पर राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्र के बारे में चर्चा नहीं की.

मगर सबसे अफ़सोसनाक बात यह है कि हिंसक और साम्प्रदायिक सोच ब्राह्मण टोली के बच्चों तक पहुंच गई है. इसी मिश्र टोली के छोटे छोटे बच्चे मुस्लिम और पाकिस्तान विरोधी बातें खेलते खेलते बोलते हैं.

पहली क्लास में पढ़ रही एक छोटी बच्ची ने मुझे बताया कि मुस्लिम पाकिस्तानी होते हैं. जब पूछा कि कौन मुस्लिम है, कैसे पता चलता है तो उसने कहा कि ‘मेरे स्कूल में आदिल पढ़ता है और आदिल मुस्लिम नाम होता है. मुस्लिम पाकिस्तानी होते हैं.’

इसके पिता से बात करने पर पता चला कि वह मोदी को वोट इसलिए कर रहे हैं कि वही मुस्लिमों को ‘ठीक’ कर सकते हैं.

कांग्रेस ब्राह्मण टोली में अलोकप्रिय होती जा रही है. यह बदलाव भाजपा के उभार के साथ हुआ. ब्राह्मण की नज़र में कांग्रेस ‘मुसलमानों की पार्टी’ है. यही नहीं, उनके मुताबिक़ मोतीलाल नेहरू ‘मुस्लिम’ थे और इंदिरा गांधी का पति फ़िरोज़ गांधी ‘मुस्लिम’ था. आजकल ममता बनर्जी के ऊपर भी यहां का ब्राह्मण समाज बहुत नाराज़ है और उन्हें ‘बांग्लादेश की मुस्लिम औरत’ बताया जा रहा है.

बातें तो और भी हुईं मगर सब का ज़िक्र यहां मुमकिन नहीं है. अफ़सोस इस बात का है कि ब्राह्मण समाज जो आर्थिक, समाजिक और शैक्षणिक तौर पर दूसरी जातियों से कहीं आगे है इस तरह के साम्प्रदायिक सोच से ग्रसित है. माना कि सारे ब्राह्मण एक ही तरह से नहीं सोचते हैं और न ही वे एक ही पार्टी को वोट करते हैं. मगर जो कुछ मैंने ऊपर बयान किया वह उनके बीच एक बड़े ट्रेंड के रुप में उभर चुका है जो चिंता का विषय है.

(जेएनयू से जुड़े अभय कुमार शोधार्थी हैं. उनके रिसर्च का विषय ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड है.)

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