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बीआरआई पर खुली मुख़ालफ़त से लग सका मसूद अज़हर पर बैन

Photo Courtesy : PTI Photo/Santosh Hirlekar

Rajiv Sharma for BeyondHeadlines

चीन के अपना रुख बदलने से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर पर बैन को देश का सत्तारूढ़ राजनीतिक धड़ा बड़ी जीत बता रहा है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो सार्वजनिक मंचों से इसे तीसरी सर्जिकल स्ट्राइक बता रहे हैं. लेकिन दूसरे विपक्षी धड़े को आपत्ति है कि इस बैन में न तो जैश की कश्मीरी आतंकी गतिविधियों का ज़िक्र है और न ही पुलवामा अटैक का. इसलिए यह महज़ एक खानापूर्ति है जैसा हाफ़िज़ सईद के मामले में किया गया. 

फिर भी इससे कोई फ़ायदा हो या न हो, लेकिन यह तो कहा ही जा रहा है कि अब आने वाले समय में मसूद अज़हर पर कार्रवाई को लेकर भारत समेत दुनिया के तमाम देशों की निगाहें पाकिस्तान पर टिकी रहेंगी.

मसूद अज़हर पर बैन को लेकर सरकार और विपक्षी धड़ा चाहे जो क़यास लगाता रहे, लेकिन हक़ीक़त कुछ और ही है. हक़िक़त यह है कि मसूद अज़हर पर बैन न तो जैश-ए-मोहम्मद की कश्मीरी गतिविधियों की वजह से लगा है और न ही पुलवामा अटैक की वजह से, यह असल में चीन की महत्वाकांक्षी योजना बीआरआई के लिए ज़्यादा से ज़्यादा समर्थन जुटा लेने की कोशिशों का नतीजा है. 

बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के नाम से जानी जाने वाली इस योजना का भारत सबसे खुला विरोधी रहा है. इस बार तो अमेरिका ने भी बीआरआई समिट का बहिष्कार कर दिया. सिर्फ़ अमेरिका ही नहीं, अब जापान जैसे देश भी इसके ख़िलाफ़ भारत और अमेरिका के सुर में सुर मिलाने लगे हैं. 

ऐसे में चीन ने मसूद अज़हर पर बैन पर सहमति जताने की यह चाल इसलिए चली ताकि बीआरआई पर शायद इससे ही भारत की खुली मुख़ालफ़त कुछ कम हो और सारी दुनिया को यह संदेश भी जाए कि चीन भी उतना ही आतंकवाद के ख़िलाफ़ है जितने कि अन्य देश. हो सकता है कि दोनों देशों में अंदरखाने इस बारे में कोई सहमति भी बनी हो. 

असल में यदि चीन की इस बड़ी परियोजना को अच्छी तरह खंगाला जाए तो यह साफ़ हो जाता है कि यह पूरी दुनिया पर अपना दबदबा क़ायम करने की चीनी की विस्तारवादी साज़िश का हिस्सा है.

असल में मसूद अज़हर पर सुरक्षा परिषद् में चीन के आपत्ति हटाने का समय ही ऐसा है कि जो उसके इस क़दम की हक़ीक़त खुद-ब-खुद बयान कर देता है. 

हाल ही में चीन ने बीआरआई पर दूसरी अंतराष्ट्रीय समिट आयोजित की, जिसमें सौ से ज्यादा राष्ट्राध्यक्षों को न्यौता गया था, लेकिन इसमें से 37 राष्ट्राध्यक्ष ही शामिल हुए, हालांकि सौ के क़रीब देशों के प्रतिनिधि ज़रूर मौजूद रहे. ऐसे में बीआरआई पर भारत और अमेरिका के खुले विरोध को कुछ हद तक ही सही शांत करना चीन की कूटनीतिक मजबूरी थी. इसीलिए चीन का यह क़दम ऐसे समय में सामने आया कि एक तरफ़ बीआरआई की समिट चल रही थी और दूसरी तरफ़ चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में मसूद अज़हर पर अपने रुख से पलटी मार ली. 

असल में अब चीन को यह डर सताने लगा था कि यदि उसने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में अपने इस इकलौते रुख को नहीं बदला तो उसे आने वाले समय में कई मंचों और मुद्दों पर उसे सिर्फ़ भारत की ही नहीं अमेरिका, जापान और फ्रांस जैसे देशों की मुख़ालफ़त भी झेलनी पड़ सकती है. 

भारत बीआरआई का खुला विरोधी इसलिए है कि इसके तहत चीन पाकिस्तान में जो आर्थिक गलियारा बना रहा है वह पीओके से होकर गुज़रता है और भारत इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन क़रार देता है. वैसे बीआरआई पर भारत के विरोध की यही एक वजह नहीं है, वह बड़े पैमाने पर इसे चीन की सारी दुनिया पर अपना दबदबा देखने की ख्वाहिश का नतीजा मानता है.

असल में चीन इस बीआरआई योजना से एशिया से लेकर अफ्रीक़ा और यूरोप तक को एक सड़क, रेल और समुद्री मार्ग से जोड़ देना चाहता है. ज़ाहिर है कि इससे चीन की सैन्य ताक़त भी बढ़ेगी और वह एक महाशक्ति के तौर पर अमेरिका को चुनौती देने की स्थिति में आ जाएगा. 

जहां-जहां भी इसके मार्ग पहुंचेगे, वहां-वहां अपने आप चीनी सैन्य ताक़त का दबदबा भी क़ायम हो जाएगा. कुछ ही दिन हुए दक्षिण चीन सागर से दो अमेरिकी सैन्य युद्धपोतों के गुज़रने पर चीन ने कड़ा ऐतराज जताया. इसलिए अमेरिका लगातार कह रहा है कि चीन अपनी सैन्य और दूसरी ताक़त बढ़ाने में जुटा हुआ है. 

हाल ही में पेंटागन से आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन न सिर्फ़ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपना दबदबा बना रहा है, बल्कि वे कई दूसरे इलाक़ों में भी अपना रुतबा क़ायम करने में लगा है. 

2019 चीनी सैन्य शक्ति नामक रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके लिए वह छोटे-छोटे देशों को अपने क़र्ज़ के मकड़जाल में फंसाने में जुटा है. ऐसे बहुत सारे छोटे देश हमारे पड़ोसी हैं, इसलिए यह भारत के लिए खतरे की घंटी है. यदि चीन इस बीआरआई योजना की मार्फत हमारे पड़ोसी देशों नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश तक पहुंच बना लेता है तो यह भारत के लिए कितना बड़ा ख़तरा होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है.

बीआरआई पर समर्थन और खुली मुख़ालफ़त को रोकने के लिए चीन ने मसूद अज़हर पर ही पलटी नहीं मारी, इसी डर को भांपते हुए राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने समिट में शामिल होने आए देशों के प्रतिनिधियों से यह वादा भी किया कि बीआरआई को पारदर्शी बनाया जाएगा. 

अपने कामों में और ख़ासतौर पर कूटनीतिक और सैन्य मोर्चे पर चीन कितनी पारदर्शिता बरतता है यह सभी जानते हैं. इस समिट की ख़ास बात यह है कि हमारे दो क़रीबी राष्ट्रों रूस और पाकिस्तान ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन ने जहां समिट में इस योजना की भूरि-भूरि प्रशंसा की, वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा कि सभी देशों को इसका हिस्सा बनना चाहिए क्योंकि यह देशों को और क़रीब लाने का काम करेगी. 

यहां हमें यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन भले ही आज तक कभी पाकिस्तान की यात्रा पर न गए हों, लेकिन बीआरआई पर उनके सुर पूरी तरह से चीन और पाकिस्तान वाले हैं. अभी तो हालत थोड़ी बदली है, लेकिन कुछ समय पहले तक उनके प्रतिनिधि अंतराष्ट्रीय मंचों से भारत की आतंकवाद पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिशों की मुख़ालफ़त कर चुके हैं. इसलिए यह बीआरआई परियोजना भारत के ख़िलाफ़ चीन, रूस और पाकिस्तान का धुरी बनाने बनाने वाली योजना भी है. 

रूस और पाकिस्तान जैसे और देशों को चीन बीआरआई पर अपने साथ देखना चाहता है, इसलिए उसने ठीक समिट के समय ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में मसूद अज़हर पर बैन के ख़िलाफ़ अपना वीटो वापस लेकर दुनिया को यह दिखाने की कोशिश की कि वह भी आतंकवाद के ख़िलाफ़ है. 

यहां हमें यह भी याद रखना चाहिए कि दुनिया की इकलौती महाशक्ति अमेरिका के ख़िलाफ़ जो भी धुरी बनती है रूस उसका पहला हिस्सेदार होता है, जैसे वह सीरिया में असद अल-बशर की सरकार के साथ खड़ा है. इसकी मूल वजह यही है कि अमेरिका वहां उसका विरोधी है.

बहरहाल, बीआरआई पर मुख़ालफ़त के अलावा अन्य मंचों से भी विरोध के सुरों को हल्का करने के मक़सद से ही सही, चीन ने मसूद अज़हर पर सुरक्षा परिषद् में अपना वीटो हटाकर बेशक एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की हो, लेकिन इसमें भारत को भी कुछ न कुछ फ़ायदा तो है ही. 

इसका सबसे बड़ा फ़ायदा यही है कि चीन के बदले रुख से यह साफ़ हो गया कि पाकिस्तान में ऐसे आतंकी खुले घूमते हैं जिन पर क़ायदे से प्रतिबंध होना चाहिए. 

यहां यह याद रखा जाना चाहिए कि मसूद अज़हर पर तो चीन ने इतनी मुश्किल से बैन पर सहमति जताई, लेकिन अपने यहां वह सुरक्षा के नाम पर लाखों उइगर मुसलमानों को बंधक बनाए हुए है और उन्हें अपने रीति-रिवाजों का पालन तक करने की इजाज़त नहीं देता. 

उसका कहना है कि बीआरआई परियोजना की कामयाबी के लिए ही उसका अपने इस शिनझियांग प्रांत में सुरक्षा के लिहाज़ से सख्ती बरतना ज़रूरी है. चीन को पूरी दुनिया पर अपना दबदबा देखने के लिए ही सही, यदि बीआरआई जैसी योजना के लिए और ज्यादा देशों का साथ चाहिए तो उसे समय रहते अपना यह दोगला रवैया भी बदल लेना चाहिए.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और विभिन्न अख़बारों में अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखते रहे हैं.)

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