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तो क्या अब हमारी अदालतें भी योगी के ‘ठोक दो’ प्लान पर चलेंगी?

BeyondHeadlines News Desk

लखनऊ: पिछले दिनों पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का एक फ़ैसला चर्चे में है. अदालत ने कहा है कि यूपी की तर्ज पर अगले 6 महीने में क़ानून बनाया जाए ताकि पंजाब-हरियाणा में बढ़ते गैंग कल्चर को उखाड़ फेंका जाए. 

कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि छह महीने के भीतर दोनों राज्यों से गैंगस्टरों की सफ़ाई शुरू हो जानी चाहिए. हाईकोर्ट ने दोनों राज्यों को छह माह में ऐसा क़ानून बनाए जाने के आदेश भी दे दिए हैं.

रिहाई मंच ने अदालत के इस आदेश को लोकतंत्र विरोधी आदेश क़रार दिया है और कहा है कि कोर्ट की भाषा योगी के ठोक देने, ऊपर पहुंचा देने जैसी आपत्तिजनक है. तो क्या अब हमारी अदालतें भी योगी के ‘ठोक दो’ प्लान पर चलेंगी? 

रिहाई मंच द्वारा जारी अपने प्रेस बयान में अध्यक्ष एडवोकेट मुहम्मद शुऐब ने कहा है कि यह अदालती निर्देश ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश में उसी क़ानून का सहारा लेकर पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों की एनकाउंटर में हत्याएं की जा रही हैं, नौजवानों को विकलांग बनाया जा रहा है. ऐसे कई मामलों की जांच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग कर रहा है और सुप्रीम कोर्ट में भी पीयूसीएल की याचिका विचाराधीन है. ऐसे में आंख मूंद कर दिया गया पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का यह फ़ैसला आपराधिक पुलिस मानसिकता को बढ़ावा देने वाला है.

एडवोकेट शुऐब से स्पष्ट तौर पर कहा कि क़ानून व्यवस्था दुरूस्त करने के नाम पर अगर किसी क़ानून से संविधान और मौलिक अधिकारों की धज्जियां उड़े तो यह न्याय के हित में क़तई नहीं है. ऐसा क़ानून मौलिक अधिकारों के ख़िलाफ़ राज्य का घातक हथियार होगा, राज्य प्रायोजित हत्याओं को वैधानिकता प्रदान करेगा और राज्य के हित में लोकतंत्र को बंधक बनाएगा.

उन्होंने कहा कि अपराधियों के सफ़ाए के नाम पर उत्तर प्रदेश में हुए इनकाउंटर लोगों को जीने के अधिकार से वंचित करने और मानवाधिकार का गंभीर उल्लंघन किए जाने के मामले हैं. यह विडंबना की इंतेहा है कि अदालत ने फैसला सुनाते समय इस तथ्य को ध्यान में नहीं रखा. इस अदालती फ़ैसले ने फ़र्जी एनकाउंटर के आरोपों से घिरी योगी सरकार को जैसे राहत देने का काम किया है. हाईकोर्ट के फ़ैसले से उत्साहित होकर उत्तर प्रदेश पुलिस ने बिना किसी देरी के आंकड़े सार्वजनिक कर दिए. 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार योगी सरकार के ढाई सालों में कुल 3599 इनकाउंटर हुए. इनमें 73 मौतें हुईं और 1059 कथित अपराधी घायल हुए. तमाम मामलों में घुटने के नीचे बोरा बांध कर गोलियां मारी गईं. कुल 8251 अपराधियों को गिरफ्तार करने का दावा किया गया. इसके बावजूद प्रदेश में अपराधों में वृद्धि लगातार जारी है. मतलब यह कि अपराध मुक्ति का सरकारी अभियान अपराधियों के ख़िलाफ़ कहने भर को है. इरादा तो दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ राजनीतिक प्रतिशोध लेना है. 

ऐसे में उत्तर प्रदेश का उदाहरण देकर क़ानून बनाने और अपराधियों का सफ़ाया करने की बात कहना सत्ताधारी दल से जुड़े अपराधियों को संरक्षण और संगठित अपराध को बढ़ावा देना है. यह राजनीतिक विरोधियों के दमन को क़ानूनी लबादे में जायज़ ठहराने जैसा है.

एडवोकेट शुऐब ने कहा कि हर एक नागरिक को जीने का अधिकार है, यह मौलिक अधिकार है. एनकाउंटर मतलब हत्या करना नहीं होता. हत्या करना संगीन जुर्म है और उसके लिए क़ानूनन सख्त सज़ा का प्रावधान है. हत्या करने का कोई क़ानून नहीं हो सकता इसलिए इसे किसी भी स्थिति में न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता. सज़ा देने का अधिकार किसी सरकार को नहीं दिया जा सकता. 

बता दें कि यूपी में ‘उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट —1986’ लागू किया गया है. इसके तहत कई प्रावधान व विशेषाधिकार हैं. इस क़ानून के तहत गवाहों की सुरक्षा के लिए भी विशेष प्रावधान है और ऐसे अपराधियों पर अलग से अदालत गठित कर उनके ख़िलाफ़ सुनवाई की जाती है.

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