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Reading: नहीं पचा मोदी की जीत का मैजिक आंकड़ा
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BeyondHeadlines > Election 2019 > नहीं पचा मोदी की जीत का मैजिक आंकड़ा
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नहीं पचा मोदी की जीत का मैजिक आंकड़ा

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published May 23, 2019 12 Views
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15 Min Read
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Rajiv Sharma for BeyondHeadlines 

11 अप्रैल से 19 मई तक सात चरणों में हुआ लोकसभा चुनाव ज़ाहिर है कि कहीं ज़मीन पर भी लड़ा गया होगा, लेकिन असली चुनावी जंग तो नतीजे आने से महज़ तीन दिन पहले एग्जिट पोल से लेकर नतीजे आने तक इलेक्ट्राॅनिक मीडिया पर लड़ी गई और मोदी और भाजपा ने इसमें बाज़ी मारी. 

असल में यह जंग एग्जिट पोल के नतीजों से शुरू हुई. इससे पहले न कहीं इस क़दर मोदी की हवा या लहर थी और न ही उनकी पार्टी पिछली बार से भी ज़्यादा सीटें हासिल करने जा रही पार्टी ही थी. इससे पहले समूचे मीडिया के लिए वह चुनाव नतीजों में सबसे लारजेस्ट सिंगल पार्टी भर थी, जिसे अपने चुने हुए राष्ट्रपति सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते थे, लेकिन नतीजों ने तो सारे अनुमानों को ही धता बता दिया. 

नतीजों में भाजपा एग्जिट पोल के नतीजों से भी कहीं आगे निकल गए. एग्जिट पोल सामने आने के बाद समूचा विपक्ष ईवीएम के वीवीपैट से सौ फ़ीसदी मिलान की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जिसे ख़ारिज कर दिया गया. एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद से ही भाजपा के हक़ में माहौल बनाया जाने लगा, लेकिन यह सब इतना एकतरफ़ा था कि कुछ लोग इसके ख़िलाफ़ हथियार तक उठाने की बात करने लगे. पर जैसे ही भाजपा और मोदी के पक्ष में चुनावी नतीजे आने शुरू हुए ये ईवीएम वाले और हथियार उठाने की बात करने वाले टेलीविज़न या न्यूज़ चैनलों से ग़ायब कर दिए गए. 

यह आधुनिक इलेक्ट्रिाॅनिक मीडिया की कारगुज़ारी है, जिसमें ज्यादातर न्यूज़ चैनलों की लगाम किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के ही हाथ में होती है. आख़िर एग्जिट पोल के नतीजे उम्मीदों के इतने उलट क्यों थे कि समूचा विपक्ष सौ फ़ीसदी वीवीपैट के मिलान की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा और कुछ लोग हथियार तक उठाने की बात करने लगे? और यदि एग्जिट पोल ग़लत थे तो फिर चुनाव परिणाम भाजपा के हक़ में उससे भी कहीं आगे क्यों निकल गए? धुआं वहीं से उठता है जहां थोड़ी बहुत आंच हो.

मैं कोई इंजीनियर या वैज्ञानिक नहीं हूं कि ईवीएम और वीवीपैट के तकनीकी पहलुओं की चर्चा करने बैठ जाऊं. यह मेरा काम नहीं है, लेकिन यदि देश के कुछ या बहुत से चुनावी नतीजे उम्मीदों के उलट लगने लगें तो एक पत्रकार और जागरूक नागरिक के तौर पर यह मेरा दायित्व है कि मैं उन पर उंगली उठाऊं. 

जब ईवीएम और एग्जिट पोल की बात चल रही थी तभी देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा कि जनादेश संदेह से परे होना चाहिए और यह चुनाव आयोग का दायित्व है. 

एग्जिट पोल आने के बाद एक टाॅक शो में आशुतोष ने कहा कि यदि मोदी सरकार पहले जैसा बहुमत हासिल करती है तो यह सवाल ज़रूर उठेगा कि जनता को यह चुनावी नतीजे कितने स्वीकार्य हैं. 

प्रशांत भूषण ने तो यहां तक कह दिया कि मुश्किल ईवीएम में गड़बड़ी की ही नहीं, उन्हें बदले जाने की आशंका की भी है. 

लेकिन अब जब चुनाव परिणाम आ चुके हैं और भाजपा और एनडीए ने पहले से भी ज्यादा सीटें हासिल कर ली हैं तो कोई इन सवालों को क्यों नहीं उठा रहा? वो ईवीएम और वीवीपैट वाले कहां गए? 

दरअसल, आज की राजनीति में एजेंडा तय करने या उसे बदलने का काम इलेक्ट्राॅनिक मीडिया ही कर रहा है और अब उसने मंच ईवीएम या वीवीपैट का ज़िक्र करने वालों की जगह जनादेश का सम्मान करने वालों के लिए सज़ा दिया है. 

क्या यह ऐसा मसला है कि जनादेश के सम्मान की बात कहकर अब इस पर चुप्पी साध लेना भी एक तरह की मजबूरी है? जिन दिनों चुनाव चल रहा था, उन दिनों मेरे समेत जिस तरह सारे मीडिया को भाजपा सिंगल लारजेस्ट पार्टी बनती दिख रही थी तब मुझे एक अख़बार उसकी 165 सीटें आती दिखा रहा था. मीडिया जो कुछ दिखा रहा था और जो हवा थी उसमें मेरा अनुमान भी यही था कि भाजपा को 150 से लेकर 200 तक सीटें मिल सकती हैं और उनके अपने राष्ट्रपति उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं. लेकिन अब तो भाजपा ने न सिर्फ 350 का आंकड़ा छू लिया है, बल्कि पिछली बार की चुनावी जीत को भी पीछे छोड़ दिया है. 

इस देश का कोई अंधा आदमी भी यह दावा नहीं करेगा कि इस बार भाजपा या मोदी के पक्ष में वैसी ही हवा या लहर थी, जो सन् 2014 के चुनाव में थी. फिर उनकी झोली में इतनी सीटें कहां से आ टपकीं? 

यदि एनडीए ने 350 के मैजिक आंकड़े को छूने के बजाए साधारण बहुमत ही हासिल किया होता तो शायद इस चुनावी नतीजे से किसी के भी परेशान होने या असहमत होने की इतनी गुंजाइश न होती. यदि यह चुनाव फेयर भी है तो भी यह ऐसा चुनाव है जिसमें साध्वी प्रज्ञा ने दिग्विजय सिंह को हरा दिया है. राहुल गांधी अमेठी में स्मृति ईरानी से हार गए हैं. इससे भी बड़ी बात यह है कि इस बार मैं यह सवाल इसलिए उठा रहा हूं कि इसी दशक के कम से कम दो और चुनावी नतीजों से भी मैं अपनी रज़ामंदी नहीं बैठा पाया था.

ज्यादा दिन नहीं हुए जब उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों के लिए फ़रवरी-मार्च 2017 में मतदान हुआ था. तब मैं नोएडा से निकल रहे अख़बार दैनिक भास्कर, नोएडा में संपादकीय पृष्ठ देख रहा था. मेरी टेबल के ठीक सामने एक इतना बड़ा टीवी लगा था. इस टीवी की आवाज़ तो बंद रखी जाती थी, लेकिन उसकी स्क्रीन पर जो ख़बरें चलती थीं, उनको हम पढ़ सकते थे. 

काम करते-करते हम कभी-कभी कंप्यूटर से अपनी नज़र हटाकर टीवी पर भी जमा लिया करते थे. विधानसभा चुनाव से संबंधित ख़बरें भी हम उस टीवी पर देखते थे. वहां हम जो कुछ देख रहे थे और जो कुछ अपने संपादकीय पृष्ठ पर छाप रहे थे, उसका पूर्वानुमान यही था कि अखिलेश यादव की छवि बहुत अच्छी है, वे युवा भी हैं और कांग्रेस का हाथ भी उनके साथ है, इसलिए वे साधारण बहुमत तो हासिल कर ही लेंगे. टीवी पर भी समाजवादी पार्टी का ही दबदबा था, फिर भले ही वह परिवारिक कलह की वजह से ही क्यों न रहा हो. तब भी यही अनुमान था कि वही जीतेंगे, लेकिन जब चुनाव परिणाम आया तो सब कुछ उलट-पुलट हो गया. 

सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन सिर्फ़ 54 सीटों पर सिमटकर रह गया और बहुजन समाज पार्टी को तो सिर्फ़ 19 सीटें ही मिल सकीं. दूसरी तरफ़ उत्तर प्रदेश में लंबे समय से सत्ता से दूर भाजपा गठबंधन को टक्कर देती तो दिख रही थी, लेकिन यह उम्मीद किसी को नहीं थी कि वह 312 सीटों के साथ तीन-चौथाई बहुमत हासिल कर लेगी. मैं यह चुनाव परिणाम देखकर सकते में आ गया और बहुत दिन उसी बारे में सोचता रहा. मैंने इस बारे में कई लोगों से बात भी की, लेकिन कोई भरोसे लायक़ जवाब नहीं मिला.

इसी बारे में सोचते-सोचते मैं आख़िर इस जगह पहुंचा कि यदि ये नतीजे ऐसे ही भाजपा के पक्ष में ही आने थे तो मुझे कौन से नतीजे पच सकते थे. इस पर सोचते हुए मैं इस जगह पहुंचा कि जैसा रिजल्ट मैं सपा और कांग्रेस गठबंधन के बारे में यानी साधारण बहुमत की बात सोच रहा था, यदि भाजपा ने भी वैसी ही जीत हासिल की होती तो शायद मैं उस नतीजे को पचा लेता, लेकिन भाजपा की इस तीन चौथाई बहुमत वाली जीत को पचा पाना मुमकिन नहीं है. 

कुछ-कुछ इसी तरह का फ़ैसला यह भी था कि भाजपा ने दो उपमुख्यमंत्रियों के साथ वहां योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बना दिया. उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा सरकार के शासन में वहां गोरखपुर लोकसभा उपुचनाव में कुछ ऐसा परिणाम सामने आया जिसकी उम्मीद किसी ने सपने में भी नहीं की होगी. जिन सूरमाओं के बूते भाजपा ने उत्तर प्रदेश में तीन चौथाई बहुमत हासिल किया था, वे ही अपने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की परंपरागत गोरखपुर सीट भी नहीं बचा सके और चुनाव हार गए. 

क्या हम इस चुनावी नतीजे को यह कहकर पचा या टाल सकते हैं कि विधानसभा और लोकसभा के चुनाव अलग होते हैं और अलग-अलग मुद्दों पर लड़े जाते हैं? मौजूदा भारतीय राजनीति में ऐसे हर उम्मीद के उलट चुनावी नतीजे को आप कहां जगह देंगे?

मेरे सामने कुछ ऐसी ही तस्वीर दिल्ली विधानसभा के पिछले दो चुनावों ने पेश की थी. अन्ना आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी ने जो पहला चुनाव 2013 में लड़ा, उसमें भाजपा और अकाली दल ने मिलकर सबसे ज्यादा 32 सीटें हासिल की थीं. आम आदमी पार्टी को 28 सीटें मिली थीं. जबकि कांग्रेस को सिर्फ़ आठ सीटों से ही संतोष करना पड़ा था. अभी अन्ना आंदोलन की यादें ताज़ा थीं और उसी से नई-नई निकली आम आदमी पार्टी से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन उन्होंने जल्द ही उप-राज्यपाल से छत्तीस का आंकड़ा बनाकर इन उम्मीदों पर विराम लगा दिया. हालांकि उन्होंने एक सीमा तय करके बिजली के बिल शायद आधे कर दिए और एक तय सीमा तक जल बोर्ड का पानी मुफ्त कर दिया था. 

यहां यह भी याद रहे कि यह पार्टी अपने सर्वोच्च आदर्श अन्ना हज़ारे की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ राजनीति और सत्ता में आई थी और अब तक न सिर्फ़ इसके बहुत सारे नामी-गिरामी नेता इससे किनारा कर चुके हैं, बल्कि इसी पार्टी ने न जाने कितनी बार अन्ना हज़ारे की लानत-मलानत झेली है. अन्ना हज़ारे के साथ इस पार्टी के नेताओं ने जो सपने दिखाए थे, वे खुद अभी तक उन्हें ही पूरा नहीं कर सके हैं. इस पार्टी ने उसी कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई, जिसके ख़िलाफ़ अन्ना हज़ारे ने दिल्ली में अनशन किया था. आख़िर यह गठबंधन दो साल के अंदर ही टूट गया और दिल्ली में दोबारा चुनाव हुए. 

सन् 2015 में हुए इन चुनाव परिणामों की आख़िरी हक़ीक़त साबित करने के लिए मेरे पास कोई सबूत तो नहीं है, लेकिन इस चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीतकर जो रिकाॅर्ड बनाया वह आज तक मेरे लिए अबूझ पहेली बना हुआ है. इस चुनाव में आम आदमी पार्टी की सीटें 28 से बढ़कर 67 हो गईं यानी उसे सीधे 39 सीटों का फ़ायदा हुआ. 

उधर भाजपा की सीटें 32 से घटकर तीन रह गईं और पिछले 15 सालों तक दिल्ली पर राज करने वाली कांग्रेस पार्टी अपना खाता तक नहीं खोल सकी. ये चुनाव आज तक मेरे लिए ऐसी पहेली बना हुआ है कि आख़िर ऐसा हुआ तो हुआ कैसे? तब मैंने एक पत्रिका का समाचार संपादक रहते हुए जो स्टोरी लिखी थी, उसके मुताबिक़ इसमें आम आदमी पार्टी और भाजपा के वोट शेयर पर ज्यादा असर नहीं हुआ था, लेकिन विधानसभा का पूरा गणित ही बदल गया था. और यदि ऐसा हुआ भी हो तो आम आदमी पार्टी ने, जिसके शीर्ष नेता को खुद को अराजकतावादी कहलवाने से भी परहेज़ नहीं था, और जो स्वयं बिना विभाग के मुख्यमंत्री हैं, ने दो साल में ऐसा क्या कर दिखाया कि उनकी सीटें विधानसभा में 28 से बढ़कर सीधे 67 हो गईं? उम्मीदों से बिल्कुल परे नज़र आने वाले ऐसे चुनाव परिणाम को आप क्या कहेंगे?

मेरी नज़र में लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के साथ ऐसे अप्रत्याशित चुनावी नतीजों में एक नतीजा और जुड़ गया है. भाजपा ने इस चुनाव में जीत के जिस मैजिक आंकड़े को छूआ है, उससे कोई अंधा या 24 घंटे अपनी आंखें बंद रखकर बैठने वाला आदमी ही इत्तफ़ाक़ रख सकता है. अंतिम सत्य यही है कि भाजपा के स्कोर बोर्ड पर चाहे जितनी सीटें टंगे, सच यही है कि इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा या मोदी के पक्ष में ऐसी कोई लहर नहीं थी, जिसे 2014 में हर किसी ने महसूस किया था.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और विभिन्न अख़बारों में अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखते रहे हैं. ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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