India

पाकिस्तान से करतारपुर कॉरिडोर के लिए कौन किससे बात कर रहा है?

Rajiv Sharma for BeyondHeadlines

भारत के पूर्व क्रिकेटर और सबसे घुटे हुए राजनीतिज्ञ नवजोत सिंह सिद्धू पाकिस्तान में इमरान खान के शपथ समारोह में शरीक होकर और वहां के आर्मी चीफ़ क़मर बाजवा से गले मिलकर करतारपुर कॉरिडोर का जो प्रेम संदेश लाए थे, वह अब परवान चढ़ता दिख रहा है. 

अख़बार बताता है कि इस सिलसिले में दोनों देशों के राजनयिकों में लंबी-चैड़ी बातचीत हो चुकी है. अख़बार बताता है कि दोनों देशों के राजनयिक इस बात पर भी एकमत हैं कि करतारपुर कॉरिडोर से आने वाले श्रद्धालु बिना वीजा के भी करतारपुर साहिब के दर्शन करके जा सकते हैं. 

पर यह बात समझ से परे है कि जब हम पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सर्जिकल स्ट्राइक कर चुके हैं, एयर स्ट्राइक भी कर चुके हैं और दुनिया भर में उसे आतंकवाद पर अलग-थलग करने का अभियान छेड़े हुए हैं तो फिर करतारपुर साहिब कॉरिडोर पर पाकिस्तान से चर्चा कैसे हो रही है और उस चर्चा में हिस्सा कौन ले रहा है? 

हमारे शीर्ष नेता हर चौथे दिन इस बात का ऐलान करते हैं कि पाकिस्तान जब तक आतंकवाद को पालना-पोसना बंद नहीं करेगा तब तक कश्मीर समेत किसी भी मसले पर उससे कोई बातचीत हो ही नहीं सकती. फिर करतारपुर कॉरिडोर पर बात कैसे हो सकती है?

सिद्धू राजनीति के घुटे हुए खिलाड़ी हैं. जिस अमरिंदर सरकार में वह मंत्री थे, उससे तो वह पिछली 10 जून को ही इस्तीफ़ा दे चुके हैं. लेकिन यह इस्तीफ़ा उन्होंने मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को नहीं, तब के कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को सौंपा था. 

असल में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने उनके क़मर बाजवा से गले मिलने की आलोचना की थी. उन्होंने उन्हें वहां जाने से रोका भी था, लेकिन वह नहीं माने. जब उनका विभाग बदला गया तो वे अमरिंदर से और नाराज़ हो गए. 

कैप्टन अमरिंदर ने यह आरोप भी लगाया था कि नवजोत सिंह सिद्धू उनकी जगह खुद पंजाब का मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं. जब बीबीसी ने यह ख़बर दिखाई तो अचानक पता चला कि सिद्धू तो मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे चुके हैं.

रिलायंस कप के छक्कों से मशहूर हुए सिद्धू की राजनीतिक महत्वकांक्षाएं असल में बहुत लंबी-चौड़ी हैं. उन्होंने अमृतसर से अपनी पत्नी नवजोत कौर के लिए भी टिकट मांगा था, जो उन्हें नहीं मिला. कांग्रेस आलाकमान से भी वह लगातार इस बात को लेकर सौदेबाजी करते रहे कि उन्हें पंजाब का मुख्यमंत्री बना दिया जाए, लेकिन जिन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस के लिए पंजाब का चुनाव जीता था, उन्हें हटाना कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष को मंज़ूर नहीं था. 

वे हर समय कोई न कोई चाल चलते रहे और दस जून को अपना इस्तीफ़ा सौंपने के बाद भी उन्होंने किसी को इसकी भनक तक नहीं लगने दी और उनके स्टार कैंपेनर भी बने रहे. संभव है कि क़मर बाजवा से गले मिलने और कपिल शो से हटाए जाने के बाद अब उनकी निगाह पार्टी संगठन में किसी बड़े पद पर लगी हो. क्योंकि जानकारों का अब भी यही कहना है कि उनका तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष को दिया गया इस्तीफ़ा कोई मायने नहीं रखता और यदि उन्हें इस्तीफ़ा देना ही है तो उसे मुख्यमंत्री को ही भेजना होगा. 

वे अपनी हिलती-डुलती नैया को किनारे लगाने के लिए राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा से लेकर अहमद पटेल तक से मुलाक़ात कर चुके हैं, जिन्होंने उनके और अमरिंदर के बीच दूरी को पाटने की कोशिश तो की, लेकिन उन्हें अमरिंदर की जगह तरजीह देने से साफ़ इनकार कर दिया.

नवजोत सिंह सिद्धू इतने घुटे हुए राजनीतिज्ञ हैं कि अमृतसर से जेटली को पिछला चुनाव हरवाने और कैप्टन अमरिंदर को जिताने में भी उनकी अहम भूमिका थी. ऐन टाइम पर उन्होंने और उनकी पत्नी ने जेटली के लिए चुनाव प्रचार करने से साफ़ इंकार कर दिया. और तब जिन अमरिंदर सिंह को उन्होंने जितवाया अब अपनी सियासी जालसाज़ी के लिए उनकी पटरी उनके साथ भी नहीं बैठ रही. 

जेटली भी मंत्रिमंडल छोड़ते-छोड़ते अपने दो लोगों पर रहमो-करम कर गए. रजत शर्मा को तो उन्होंने डीडीसीए का अध्यक्ष बना दिया ताकि पंजाब से क्रिकेट टीम आए तो उसकी अच्छी आवभगत हो. और गौतम गंभीर को क्रिकेटर से सांसद या राजनीतिज्ञ बनाकर वे उनके साथ मंच साझा करते हुए कह गए हैं कि गौतम गंभीर सिद्धू जैसे नहीं हैं. 

बड़ी हैरानी के साथ मुझे भाजपा का संकटमोचक रहे अरुण जेटली का एक और बयान भी कभी-कभी याद आता है कि रामदेव तो असल में गांधी जी हैं. उनके इस बयान का मतलब मुझे आज तक समझ में नहीं आया. अभी चार-पांच दिन पहले ही अख़बार में यह ख़बर भी आई थी कि कहीं चाहे जो हो रहा हो भाजपा के सातों सांसद तो बिल्कुल चुप हैं. किसी का कहीं कोई बयान तक नहीं छपता. ये हाल तो इलेक्शन जीतने के बाद है और जब इलेक्शन हुआ नहीं था तब भी हालात यही थे.

सिद्धू को विवादों में रहने में मज़ा आता है. वे ऐसे बयान भी दे देते हैं जिससे चाहे पूरी क़ौम की नाक कट जाए. बाद में अकाल तख्त से माफ़ी मांग लो. उनकी इससे ज़्यादा बदज़बानी और क्या होगी कि जब पुलवामा में सीआरपीएफ़ के एक साथ 50 से ज़्यादा जवान फ़िदायीन हमले में मारे गए तो उन्होंने साफ़-साफ़ यह बयान दे डाला कि इसकी ज़िम्मेदारी किसी एक राष्ट्र या संगठन पर नहीं डाली जा सकती. 

जब इस हमले से पूरा देश ग़मगीन था तब वे ये बयान दे रहे थे. सीमा पर या एलओसी पर रोज़ शहीद हो रहे जवानों की शहादत पर कभी उनकी ज़ुबान खुली हो, यह भी कभी किसी ने नहीं सुना होगा. 

सौभाग्य या दुर्भाग्य से मुझे भी एक बार इनके घर पटियाला जाने का सुअवसर कभी मिला था. वे पटियाला के ही स्टेट बैंक पटियाला में भी नौकरी करते थे. रात में सड़क जाम हो गई और पता चला कि कोई दुर्घटना हो गई है. हम किसी तरह एक ट्रक में सवार होकर देर रात वहां पहुंचे. अगले दिन सुबह हमें पता चला कि वे अभी ग्राउंड में प्रैक्टिस कर रहे हैं. हमने रिक्शा किया और उधर को हो लिए. उनकी कार हमें रास्ते में ही मिल गई. घर में उन्होंने मुझे और फोटोग्राफर को समझाया कि आप अभी कहीं फ़िल्म वगैरह देख लो और शाम को खुलकर बात होगी. 

शाम को वे हमें अपनी एक निर्माणाधीन कोठी में ले गए. वहीं चाय का इंतज़ाम हो गया और उनसे बहुत सारी बातें होती रहीं. फोटोग्राफर के कहने पर उन्होंने कई पगड़ियां और शर्ट बदलकर फोटो भी खिंचवाए. मेरी नज़र में यह सारा सहयोग सिर्फ़ इसलिए चल रहा था क्योंकि उनके गुरु माननीय गुरचरण सिंह की सिफ़ारिश हमारे पास थी. लेकिन कहने पर भी न तो उन्होंने अपने बेटे को हमसे मिलवाया और न अपनी पत्नी को. हां, उन्होंने अपने ख़ास-ख़ास नस्लों वाले कुत्तों का बाड़ा हमें ज़रूर दिखाया.

वैसे सिद्धू का विवादों से नाता कोई नया नहीं है. एक आदमी की हत्या का आरोप भी उन पर लग चुका है, जिससे आख़िर सुप्रीम कोर्ट पहुंचकर ही उनकी जान छूटी थी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और विभिन्न अख़बारों में अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखते रहे हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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