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छुट्टी का कोई दिन बिताएं किसी चिड़ियाघर में भी…

Rajiv Sharma for BeyondHeadlines

दिल्ली का चिड़ियाघर जिसे राष्ट्रीय प्राणी उद्यान कहा जाता है देश के अच्छे चिड़ियाघरों में से एक माना जाता है. हालांकि पेटा जैसी संस्थाओं की यह मांग अपनी जगह बनी रही है कि जानवरों को चिड़ियाघर में रखना एक ज़ुल्म है और ये जीव पूरी तरह जंगली और क़ुदरती माहौल में ही रखे जाने चाहिए. यहां रहते हुए ये कई ऐसी बीमारियों और असामान्यताओं का शिकार हो जाते हैं जो अपने क़ुदरती माहौल में रहते हुए नहीं होते. 

पुराने क़िले के पास यह चिड़ियाघर बहुत लंबे-चैड़े क्षेत्र में फैला है, जिसमें 2008 तक 130 प्रकार की प्रजातियों के जीव मौजूद थे. यह बहुत हरा-भरा है और लोगों की बहुत ही मनपसंद जगह है. लोग अपना छुट्टी का दिन यहां बिताना पसंद करते हैं. पिछले कुछ समय में इसके आकार-प्रकार और जीवों के रख-रखाव के तरीक़ों में बहुत फ़र्क़ आया है. यह चिड़ियाघर 1959 में बना था जिसके लिए विदेशी विशेषज्ञों की मदद ली गई थी.

पिछले दिनों जब मैं चिड़िया घर गया तो अभी मानसून के न आने के कारण चिलचिलाती घूप और भीषण गर्मी थी. ज्यादातर जीव बाहर दिखने की बजाए अपने बाड़ों के भीतर उन जगहों पर थे, जहां उनके लिए कुछ ठंडक का इंतज़ाम किया गया होगा. पहले जब हम चिड़ियाघर जाते थे तो वहां शुरू में हाथी या गजराज ही सैलानियों का स्वागत करते थे, लेकिन इस बार वे उस जगह नहीं थे. चिड़ियाघर देखने के लिए वहां गाड़ियों या ट्रालियों का भी इंतज़ाम है नहीं तो घंटे-डेढ़ घंटे में आप इसे पैदल घूमकर भी प्राणियों या जीवों को देख सकते हैं.

चिड़ियाघर में पहले जहां दाईं ओर हाथी दिखाई देते थे, उसके बजाए अब चिड़ियाघर देखने की शुरुआत बाईं ओर से होती है. जानवरों से छेड़छाड़ न हो इसके लिए वहां बाहर से कुछ भी ले जाने पर रोक है, लेकिन चिड़ियाघर के अंदर खाने-पीने के लिए कैंटीन का इंतज़ाम है. बाईं ओर से जहां चिड़ियाघर की शुरुआत होती है वहां सबसे पहले बोर्ड काला सारस लिखकर टांगा गया है. अंदर पानी में झांकने पर पता चला कि वहां एक काली बत्तख जैसा जीव तैर रहा है. उसके ठीक सामने दूसरी तरफ़ हिरणों का लंबा-चैड़ा बाड़ा है, लेकिन ज्यादा गर्मी की वजह से ज्यादातर हिरन अंदर की तरफ़ ही थे, हां उन्हें दूर से देखा ज़रूर जा सकता था. 

वहां से थोड़ा आगे बढ़ो तो गीदड़ और काली बिल्ली जैसे जीव थे, लेकिन उनमें से कोई भी बाहर नहीं था और लगभग सभी उन जगहों पर अंदर आराम फरमा रहे थे, जहां उनके लिए कुछ ठंडक का इंतज़ाम था. थोड़ा आगे बढ़ने पर एक बंगाल टाइगर दिखाई दिया. वह इतनी गरमी में भी बाहर ही बैठा था. उसके आगे रीछों का बाड़ा था, जहां तीन-तीन रीछ इकट्ठे घूम रहे थे. उनके लिए तीन गुफ़ानुमा जगह बनाई गई थीं, लेकिन ठंडक के लिए किसी तरह का इंतज़ाम नहीं था. वैसे चिड़ियाघर में ज्यादातर जानवरों के लिए ठंडक का सबसे बड़ा इंतज़ाम यही है कि ज्यादातर बाड़ों के आगे पानी की जगह बनी हुई है और जब किसी जानवर को ज्यादा गर्मी लगती है तो वह उस पानी में उतर जाते हैं.

जब मैं रीछों के बाड़े के सामने पहुंचा तो वहां मेरी मुलाक़ात एक गार्ड से हुई. मैंने सोचा इनसे ही कुछ जानकारी ले लेते हैं. उन्होंने मुझे बताया कि जहां बिना छुट्टी वाले दिन क़रीब एक हज़ार, लेकिन जिस दिन छुट्टी हो, उस दिन दो से तीन हज़ार लोग भी आ जाते हैं. 

साथ ही उस गार्ड ने यह कहकर मुझे कुछ डरा भी दिया कि साहब यह पब्लिक प्लेस है और यहां हर तरह के लोग आते हैं— शरीफ़ भी, बदमाश भी और लोफ़र भी. तब तक कोल्ड ड्रिंक पीने के बावजूद गर्मी से मेरा हाल बहुत बुरा हो चुका था. मैं पूरा का पूरा पसीने में नहा चुका था, इसलिए मैंने सोचा कि चिड़ियाघर के बारे में कुछ और सटीक जानकारी इनके डायरेक्ट्रेट से ले ली जाए, लेकिन मुझे पता चला कि वे तो लंच करने गए हैं और अभी उनके लौटने में घंटे भर की देरी है. इसलिए मैं वहां जो हरियाली और जीव देख सका, उसके साथ ही मुझे बाहर निकलना पड़ा. 

सारस के एक बाड़े पर बहुत अजीब सूचना लिखी हुई थी कि ये जिस पानी में ये बैठे हैं वह काई जैसा महसूस हो रहा है, लेकिन यही इन जीवों का भोजन भी है. चिड़ियाघर मैं पहले भी जाता रहा हूं, लेकिन इस बार वहां से बाहर निकलने पर जितना साफ़-सुथरा और बड़ा फूड कोर्ट मुझे दिखा, ऐसा वहां पहले कभी नहीं था.

तभी चिड़ियाघर से निकलकर मुझे उस 200 किलो वज़नी विजय नामक सफेद बाघ की याद आई जो अब भी वहीं बताया जाता है, जिसका सन् 2014 में एक मनोरोगी मक़सूद शिकार हो गया था. वह या तो खुद उस सफ़ेद बाघ के बाड़े में क़ूद गया था या गिर गया था. बाघ उसे कुछ कह नहीं रहा था, लेकिन लोगों ने उसे बचाने के लिए बाघ को पत्थर मारने शुरू कर दिए जिससे वह हिंसक हो गया और मक़सूद को घसीटता हुआ काफ़ी दूर तक ले गया और वह बच नहीं सका. 

लोगों ने इस हादसे के वीडियो बना डाले जो सोशल मीडिया पर कई दिनों तक वायरल होते रहे. जब यह इंसीडेंट हुआ था तब मैं मयूर विहार से निकल रही पत्रिका लोकायत में काम कर रहा था. यहां के विधायक माननीय मनीष सिसोदिया हैं. तब मक़सूद वाला इंसीडेंट मैंने भी बहुत मेहनत करके लोकायत पत्रिका में कवर किया था. 

दिल्ली के चिड़ियाघर की खूबसूरती और हरियाली तो मैंने कई बार देखी ही है, एक अरसा पहले कुछ लोगों के साथ मुझे भुवनेश्वर के चिड़ियाघर नंदन-कानन जाने का मौक़ा लगा था. हम दिल्ली में रहने वाले लोग अक्सर इस फोबिया से ग्रस्त रहते हैं कि दिल्ली देश की राजधानी है इसलिए यहां की हर चीज़ बाहर से श्रेष्ठ है, लेकिन वहां के चिड़िया घर नंदन-कानन ने मेरे इस भ्रम को तोड़ा था. वहां मैं जिन भी लोगों के साथ था, बहुत दुखी था, लेकिन उस दुख और परेशानी के बीच भी मैंने भुवनेश्वर के नंदन-कानन चिड़ियाघर को जैसा देखा वह वाक़ई लाजवाब था. वहां दिल्ली से कहीं ज्यादा जानवर या प्राणी तो थे ही और इंतज़ाम भी बहुत अच्छे थे. 

हमें वहां एक ऐसा गाइड मिला, जिसने हमारे लिए फोटोग्राफी तो की ही, तरह-तरह की आवाजें निकालकर मोरों तक को नचाकर दिखा दिया. दिल्ली के चिड़ियाघर में तो एक-दो शेर ही दिखते हैं, वहां मैंने उस चिड़ियाघर में एक साथ कई-कई शेर और शावक देखे. इसलिए आप यहां दिल्ली में रहते हुए दिल्ली के चिड़ियाघर की हरियाली, जानवरों और प्राणियों को देखकर तो खुश हो ही सकते हैं, लेकिन यदि दिल्ली के बाहर जाने का अवसर मिले तो वहां भी ऐसी सुविधाओं का लुत्फ़ उठाने से न चूकें.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और विभिन्न अख़बारों में अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखते रहे हैं.)

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