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उस लाइब्रेरी में जहां पांच साल किताबों की खुशबुओं के बीच गुज़ारे वहां ज़बरदस्ती घुसकर पुलिस ने गोलियां चलाई हैं…

By Umesh Pant

जामिया में पांच साल रहा पर पुलिस की ऐसी बर्बरता कभी नहीं देखी. इस एक दशक में यह देश कितने हैरतअंगेज़ तरीक़े से बदल गया है.

उस लाइब्रेरी में जहां पांच साल किताबों की खुशबुओं के बीच गुज़ारे वहां ज़बरदस्ती घुसकर पुलिस ने गोलियां चलाई हैं. छात्रों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा है.

यह अफ़सोसनाक है कि हमारे लोकतंत्र ने सामूहिक रूप से एक ऐसा निज़ाम चुन लिया जो पढ़ने-लिखने वालों पर लाठियां-गोलियां चलवा रहा है, उन्हें लहूलुहान कर रहा है. एक ऐसा निज़ाम जो कुछ ख़ास शैक्षणिक संस्थानों और ख़ास भौगोलिक पहचानों को खलनायक की तरह पेश करने पर आमादा है.

पहले कश्मीर और फिर पूर्वोत्तर को हिंसा की आग में झोंक दिया गया. पिछले साल पूर्वोत्तर की महीने भर की यात्रा के दौरान यह देखकर संतुष्टि हुई थी कि वहां उस हिंसा का कोई नामो-निशान नज़र नहीं आया था जिसके लिए हमेशा से उसे मीडिया में स्टीरियोटाइप किया गया था. सबकुछ शांत था और हर जगह लोगों ने दिल खोलकर स्वागत किया. लेकिन वो पूर्वोत्तर भी अब हिंसा की आग में जल रहा है. और अब दिल्ली को उस आग में झोंका जा रहा है.

यह आग कौन भड़का रहा है और इसके फैलने से किसे फ़ायदा होगा यह बात भले ही आप अपने-अपने चश्मे से देखकर तय करें लेकिन इससे नुक़सान हमारा ही है यह बात किसी से नहीं छिपी.

आग भड़काने का खेल भले कहीं से शुरू हो पर इसकी आंच का फ़ायदा हर तरह की सियासत को होता है और इसकी लपटों में हर बार देश का अमन-चैन झुलस जाता है.

जो पत्थर उठा रहे हैं, जो आग लगा रहे हैं वो भी सही नहीं हैं, लेकिन जो चुने हुए लोग हमारी पुलिस को गुंडों में तब्दील कर रहे हैं, जो हमारी ही सौंपी हुई सत्ता का अपने मनमाने क़ानूनों को लागू करने के लिए बेहूदा तरीक़े से इस्तेमाल कर रहे हैं वो देश का भला सोचने वाले लोग क़तई नहीं हैं.

किसी भी तरह की हिंसा के विपक्ष में खड़े होकर अपना विरोध दर्ज कीजिये. इस आग को भड़कने से रोकिये. यह आग हमारे लोकतंत्र को बहुत कमज़ोर कर रही है.

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