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ओखला : बदहाल इलाक़े के करोड़पति उम्मीदवार…

Afroz Alam Sahil, BeyondHeadlines

नई दिल्ली: ‘ओखला विधानसभा सीट’ शायद दिल्ली विधानसभा चुनाव में दिल्ली की सबसे दिलचस्प सीटों में से एक है. यहां से अब तक जिसने भी चुनाव लड़ने का साहस किया है, उन्हें यहां के लोगों के जज़्बातों से खेलना बखूबी आता है. मुद्दों के नाम पर सिर्फ़ जज़्बात को उभारने वाले मुद्दे ही होते हैं. यह अलग बात है कि चुनाव जीतने के बाद विधायक सारे जज़्बातों को भूल जाते हैं.

जज़्बातों के इस राजनीत का एक बेहद दिलचस्प पहलू यह है कि यहां से जीतने वाले के साथ-साथ चुनाव लड़ने वालों की आमदनी व मिल्कियत दिन-दुनी, रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ती रही. यह अलग बात है कि ओखला आज भी अपनी बदहाली की दास्तान बयां कर रहा है. मगर यहां के रहनुमा चुनाव दर चुनाव अपनी माली हैसियत को मालामाल करते जा रहे हैं. यानी समझौता जज़्बातों से हुआ है, मगर मिल्कियत बढ़ाने से कोई समझौता नहीं.

बताते चलें कि ओखला विधानसभा के चुनावी मैदान में इस बार 15 उम्मीदवार अपने क़िस्मत की आज़माईश कर रहे हैं.

वो 15 लोगों के नाम इस प्रकार हैं- (1) अमानतुल्लाह खान (आम आदमी पार्टी), (2) धरम सिंह (बहुजन समाज पार्टी), (3) परवेज़ हाशमी (कांग्रेस), (4) ब्रहम सिंह (भारतीय जनता पार्टी), (5) एम. आई. अंसारी (जागरूक जनता पार्टी), (6) डॉ. चन्द्र राजन अरोड़ा (लिबरल पार्टी ऑफ़ इंडिया), (7) तस्लीम अहमद रहमानी (सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया), (8) देवनारायण ठाकुर (राष्ट्रवादी जनता पार्टी), (9) मुशर्रत अली खान  (राष्ट्रीय आम जन सेवा पार्टी), (10) वेद प्रकाश (अवामी पार्टी), (11) शाज़िया फ़ैज़ान (अम्बेडकर नेशनल कांग्रेस), (12) अभय राज (स्वतंत्र), (13) अवनिन्द्र कुमार चौबे (स्वतंत्र), (14) जमालुद्दीन (स्वतंत्र), (15) बाबर रियाज़ (स्वतंत्र)

आईए सबसे पहले बात करते हैं यहां के कांग्रेस उम्मीदवार परवेज़ हाशमी की, कि कैसे यह जनाब दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की कर रहे हैं, और इनकी माली हैसियत बढ़ती जा रही है. 65 साल के एमएससी पास परवेज़ हाशमी की माली हैसियत 2008 में 4,25,20,837 (4 करोड़+) की थी, जो अब साल 2020 में बढ़कर 9,47,11,543 (9 करोड़+) हो गई है.

वहीं आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार अमानतुल्लाह खान (12वीं पास) 2008 में जब लोजपा से चुनाव लड़े थे तो उनकी माली हैसियत सिर्फ़ 5,57,000 (5 लाख+) की थी, जो अगले साल चुनाव में बढ़कर 2013 में 14,12,000 (14 लाख+) हो गई. लेकिन अब 2015 में जब वो आदमी आदमी पार्टी के उम्मीदवार बने, 2,00,73,316 यानी 2 करोड़ से अधिक के मालिक थे. अब 2020 में बढ़कर 3, 93,82,762 (3 करोड़+) हो गई है.

भाजपा के ब्रहम सिंह (10वीं पास) की भी कहानी थोड़ी अलग है. वो शुरू से ही करोड़पति थे. 2008 में इनकी माली हैसियत 10,04,65,303 (10 करोड़+) की थी, जो 2013 में बढ़कर 15,78,28,812 (15 करोड़+) हो गई. 2015 में यह जनाब 16,00,41,733 यानी 16 करोड़ के मालिक थे और अब 2020 में उनके पास 15,81,39,635 (15 करोड़+) है.

पहली बार बसपा के टिकट से क़िस्मत आजमाने वाले धरम सिंह (12वीं पास) भी करोड़पति हैं. वो इस समय 1,76,30,907 यानी 1.76 करोड़ के मालिक हैं. सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया के उम्मीदवार तस्लीम अहमद रहमानी 1,49,20,890 (1 करोड़+) के मालिक हैं, वहीं लिबरल पार्टी ऑफ़ इंडिया के प्रत्याशी डॉ. चन्द्र राजन अरोड़ा के पास 4,52,09,604 (4 करोड़+) की मिल्कियत है.

जज़्बातों के खेल और माली हालात में हुए चमत्कार के बीच यह सवाल ओखला के खुली फिज़ाओं में आज भी तैर रही है कि आख़िर कब इस इलाक़े की बदहाली दूर होगी? क्या यह इलाक़ा अगले पांच सालों में इंसानों के रहने लायक़ बचा भी रहेगा? आख़िर क्यों मुसलमानों के नाम पर सियासत करने वाले ओखला के बुनियादी दिक्कतों की कभी बात नहीं करते?

ऐसे अनगिनत सवालों के जवाब न जाने ओखला की अवाम कब से मांग रही है, मगर चुनाव की मंडी में सियासत का इतना शोर-गुल है कि इन सवालों का कोई खैर-ख्वाह नहीं…

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