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कोरोना के समय मोदी सरकार का मुस्लिम नौजवानों पर शिकंजा

मंगल की देर शाम जब यह सूचना मिली कि दिल्ली पुलिस (स्पेशल सेल)  ने जेएनयू और जामिया से पढ़े मुस्लिम नौजवानों पर ख़तरनाक धाराएं लगाई हैं तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए. थोड़ी देर बाद मेरे दिल में फिर यह ख्याल आया कि यह सरकार भला और कर भी क्या सकती है? जब पूरी दुनिया कोरोना के ख़िलाफ़ जंग लड़ रही है, तो केंद्र की मोदी सरकार अपने मुस्लिम नौजवानों पर दुश्मनी की भावना से टूट पड़ी है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ जेएनयू से पीएचडी पूरी कर चुके उमर ख़ालिद उन चार मुस्लिम अभियुक्तों में से एक हैं, जिनके ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया है. मीरान हैदर और सफ़ूरा ज़रगर भी यूएपीए के शिकार बने हैं. दिल्ली के भजनपूरा निवासी किसी दानिश पर भी यही मुक़दमा दर्ज किया गया है.

ध्यान रहे कि कुछ दिन पहले मीरान हैदर और सफ़ूरा ज़रगर को गिरफ्तार किया जा चुका है. पुलिस ने आरोप लगाया गया है कि फ़रवरी महीने के दिल्ली सांप्रदायिक दंगों की साज़िश मीरान ने रची थी. सफ़ूरा पर जामिया में चल रहे आन्दोनल से सम्बंधित आरोप है. दूसरी तरफ़ उमर ख़ालिद पर भड़काऊ भाषण देने का इलज़ाम है.

इन नौजवानों पर जितनी धाराएं लगाई गई हैं, उसका विवरण करना किसी भी एक लेख में संभव नहीं है. बस इतना जान लीजिए कि पुलिस ने इन पर वह वह तमाम ‘सेक्शन’ लाद दिए हैं, जो आईपीसी की किताब में सबसे कड़े थे. मीडिया ने यह भी इशारा किया गया कि इन नौजवानों के तार “भारत विरोधी” ताक़तों के साथ होने की जांच की जा रही है.

ख़ासकर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफ़आई) से उनके संबंध होने की जांच की जा रही है. पीएफआई दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में सक्रिय एक सामाजिक संगठन है. इनका राजनीतिक दल एसडीपीआई है, जिसका सोशल बेस मुख्य रूप से मुस्लिम हैं. यह दलित और ओबीसी को अपने साथ लाने की कोशिश कर रहा है. अभी तक उसको बड़ी चुनावी सफलता नहीं मिली है. कई इलाक़ों में इसका मुक़ाबला दूसरी मुस्लिम सोशल बेस वाली पार्टी जैसे मुस्लिम लीग से भी है.

दिल्ली विधानसभा चुनाव से एक-दो दिन पीछे जाकर याद कीजिए. आप आदमी पार्टी से लगातार पिछड़ रही भाजपा बौखलाई नज़र आ रही थी. उसने आख़िरी वक़्त में इलेक्शन को कम्युनल करने की कोशिश की और पीएफ़आई का ख़ौफ़ खड़ा किया. कहा गया कि शाहीन बाग़ में चल रहे प्रदर्शन को पीएफ़आई फंडिंग कर रहा था.

मगर जब चुनाव के नतीजे सामने आएं तो भगवा शक्तियां को धुल चाटनी पड़ी. इसके बाद भी हिंदुत्व ताक़तों ने अपनी सांप्रदायिक राजनीती नहीं बदली. कुछ दिन के विराम के बाद अब फिर इस सवाल को उठाया जा रहा है.

मुक़दमों में फंसाये गए इन युवाओं का यही दोष यह है कि वह सरकार की विफलताओं पर सवाल उठाते रहे हैं. वह सरकार की सांप्रदायिक नीति के आलोचक रहे हैं. उदाहरण के लिए सफ़ूरा ज़रगर जामिया में चल रहे विरोध-प्रदर्शन के दौरान बहुत सक्रिय थी. नागरिकता क़ानून के विरोध में जिस तरह मुस्लिम महिलाओं ने अपनी ठोस राजनीतिक समझ का प्रदर्शन किया है, वह उसका एक चेहरा थी.

सफ़ूरा ने अपनी गतिविधियों के माध्यम से उन अफ़वाहों को ख़ारिज किया कि मुस्लिम महिलाएं अपने समाज में बेबस मूरत के सिवा और कुछ नहीं हैं. सफ़ूरा और उनके साथियों ने यह दिखला दिया कि मुस्लिम महिलाएं भी देश-दुनिया की समस्याओं को लेकर फ़िक्रमंद रहती हैं. उनके दिलों में भी ग़लत नीतियों से लड़ने का फौलादी जज़्बा होता है.

वहीं मीरान हैदर जामिया में की पढ़ाई करने के लिए सीवान (बिहार) से आए. इंजीनियरिंग की पढ़ाई मुकम्मल कर उन्होंने पीएचडी में प्रवेश लिया. कई बार ऐसा कहा जाता है कि विज्ञान के छात्र सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहते हैं. उनकी दुनिया तो प्रयोगशालाओं तक सीमित है. लेकिन मीरान को देखते हुए यह बात पूरी तरह से ग़लत साबित होती है.

मीरान राजनीति के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का सपना देखा करते थे. उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा का आरम्भ अन्ना हज़ारे के भ्रष्टचार विरोधी आंदोलन से किया. बाद में वह आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए. लेकिन वहां उनको मायूसी मिली. फिर वह लालू प्रसाद यादव के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर राष्ट्रीय जनता दल में शामिल हुए. उन्हें दिल्ली में पार्टी की ज़िम्मेदारी दी गई.

कई सालों से सक्रिय युवा नेता के रूप में उभरे रहे थे. राजनीती के अतिरिक्त उनकी दिलचस्पी पढ़ने लिखने में भी रही है. वह अकादमिक मामलों में गहरी रुचि रखते हैं. उन्होंने ने खुद जामिया परिसर में कई लेक्चर आयोजित किया. नागरिकता विरोधी आन्दोनल के दौरान वह दिन-रात काम किया करते थे. अपने साथियों के साथ वह ग़ालिब के मूर्ति के क़रीब लगे मंच के आस-पास डटे रहते थे. वह भारत के संविधान की रुह धर्मनिरपेक्षता को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. यह बात हिंदुत्व ताक़तों को नागवार गुज़री है.

आप उमर ख़ालिद के बारे में जानते ही हैं. जब वर्ष 2009 में उन्होंने जेएनयू परिसर में क़दम रखा. उनका दाख़िला एमए आधुनिक इतिहास में हुआ. शुरू के दिन से ही वह शोषित वर्गों, विशेष रूप से आदिवासी समाज के प्रश्नों को लेकर चिंतित रहे हैं. आदिवासियों का विस्थापन, संसाधनों की लुट और उनकी बदहाली पर वह बहुत चिंतित रहा करते थे.

उनके सवाल बड़े मारक थे. आख़िर क्यों आदवासियों की जल जंगल और ज़मीन लूट ली जाती है और उनके पास साफ़ पानी तक पीने को नहीं मिलता. न सरकार उन्हें रोटी, कपड़ा और मकान मुहैया करा पाती है. उन्हें पुलिस की गोलियों का भी निशाना बनाया जाता है. जो बच जाते हैं वह शहरों में नौकर बनने के लिए मजबूर हैं. इन सवालों से उमर परेशान रहा है. तभी तो यह विषय उनके शोध का विषय बने, जिन पर उनको पीएचडी की डिग्री जेएनयू ने पिछले साल प्रदान की.

उमर के सवाल व्यवस्था की कड़वी सच्चाई को उजागर करने का प्रयास किया. यह सब सरकार को पसंद नहीं थी. जेएनयू में “देशद्रोह” के मामले में उसे दोषी बनाना उसे ख़ामोश करने की साज़िश थी. उमर और उनके जैसे अन्य साथी हिंदुत्व सरकार के लिए परेशानी का सबब रही है. पूंजीवादी और हिंदुत्ववादी एजेंडा उमर और उनके साथियों के सवालों के ख़ास निशाने पर रहे हैं.

उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा भी ‘गेमप्लान’ का हिस्सा है. यह सब कर सरकार अपनी नाकामी को ढकना चाहती है. कई अर्थशास्त्रियों ने मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की है कि कोरोना की लड़ाई सिर्फ़ लॉकडाउन से नहीं जीती जा सकती है. यदि सरकार ने श्रमिकों और गरीबों के लिए भोजन उपलब्ध नहीं कराया तो कोरोना से कहीं ज़्यादा लोग भुखमरी से मर जाएंगे, यही बात नोबल प्राइज जीत चुके इकोनॉमिस्ट ने भी साफ़ तौर से कही है.

इस तरह सरकार पर सामाजिक क्षेत्र में खर्च करने के लिए दबाव बन रहा था. मगर मोदी सरकार सोशल सेक्टर पर पैसा खर्च करना नहीं चाहती है, क्योंकि गरीबों पर पैसा खर्च करना इस सरकार की नज़रों में इसे पानी में बहाने के बराबर है. फिर क्या? अपनी विफलताओं से लोगों का ध्यान हटाने के लिए इस सरकार ने इन नौजवानों को गिरफ्तार करना ज़रूरी समझा. मक़सद साफ़ है कि आम राय को गरीबों और मज़दूरों के भुखमरी के सवाल से भटका दिया जाए.

कुछ हफ़्तों से यह काम सरकार तब्लीग़ी जमात का ख़तरा दिखाकर कर रही थी. लंबे समय तक इसका इस्तेमाल बेअसर साबित हो रहा था. तभी सरकार ने कुछ और ऑप्शन अपनाए. बाबा साहेब अम्बेडकर के रिश्तेदार एक्टिविस्ट स्कॉलर डॉ. आनंद तेलतुंबडे और मानवाधिकार के कार्यकर्ता गौतम नवलखा की गिरफ़्तारी इसी गेम प्लान का हिस्सा हैं. इन पर “शहरी नक्सली” होने के आरोप है. मीरान, सफ़ूरा, दानिश और उमर के ख़िलाफ़ मुक़दमा भी ‘पब्लिक ओपिनियन’ को देश के सुरक्षा जैसे संवेदशील प्रश्नों की तरफ़ धकेलना चाहिए.

मानवाधिकार मामलों के जानकर इस बात पर मायूसी ज़ाहिर की है कि राज्य यूएपीए का ग़लत इस्तेमाल अक्सर अपने आलोचकों को कुचलने के लिए करती रही है. इस काले क़ानून में ज़मानत मिलना बेहद बहुत मुश्किल काम है. जेएनयू के छात्र शरजील इमाम भी इसी एक्ट के तहत जेल में बंद हैं.

यही नहीं, इस धारा के तहत आरोपी को “आतंकवादी” तक घोषित किया जा सकता है और उल्टा उस पर ही खुद को निर्दोष होने की ज़िम्मेदारी थोप दी जाती है. संक्षेप में यूएपीए आरोपियों के मानवाधिकारों का बड़ा उल्लंघन है. क्या यह समय नहीं है कि हम लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपनी चुप्पी तोड़ें?

(अभय कुमार जेएनयू से पीएचडी हैं. इनकी दिलचस्पी माइनॉरिटी और सोशल जस्टिस से जुड़े सवालों में हैं. आप अपनी राय इन्हें [email protected] पर भेज सकते हैं.)

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