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BeyondHeadlines > Entertainment > ‘दिरिलिस एर्टुग्रुल’: मुस्लिम समाज को समझने- सीखने का बेहतरीन मौक़ा…
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‘दिरिलिस एर्टुग्रुल’: मुस्लिम समाज को समझने- सीखने का बेहतरीन मौक़ा…

Istikhar Ali
Istikhar Ali Published May 29, 2020 36 Views
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6 Min Read
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दिरिलिस एर्टुग्रुल एक टर्किश नाटक है जो ऑटोमन साम्राज्य के पहले के इतिहास को चित्रित करता है. ये सिर्फ़ कुछ घुमंतू क़बीलों के संघर्ष की कहानी ही नहीं है, बल्कि अपने हक़ के लिए लड़ने और आवाज़ उठाने वाले मुसलमानों के यशस्वी अतीत की कहानी को भी बख़ूबी प्रदर्शित करता है.

अब तक जितने भी टीवी सीरियल, फ़िल्में या नाटक बने हैं, मुसलमानों को आमतौर पर रूढ़िवादी, अत्याचारी या बर्बर दिखाया जाता रहा है. लेकिन ‘दिरिलिस एर्टुग्रुल’ मुसलमानों को एक बेहतरीन योद्धा के साथ राजनीतिक कूटनीतियों की ज़बर्दस्त समझ को भी चित्रित करता है. शायद यही वजह है कि ये नाटक मुस्लिम देशों के साथ-साथ ग़ैर-मुस्लिम देशों में भी बहुत तेज़ी से मशहूर हुआ है.

मुसलमानों का सिद्धांतों के लिए लड़ना और खड़े रहना, कमज़ोरों की देखभाल करना और मज़लूमों पर होने वाले ज़ुल्म को न सिर्फ़ रोकना बल्कि उन्हें दूर भी करना, ये सबकुछ काफ़ी बेहतरीन तरीक़े से दर्शाया गया है.

एर्टुग्रुल के दो डायलॉग आम तौर पर सबकी ज़बान पर है. पहला —“जीत हमारी नहीं है, यह अल्लाह की है…” (The victory is not ours, it belongs to Allah…) दूसरा —“एक देशद्रोही को माफ़ करना निर्दोष के ख़िलाफ़ अपराध है.” (Forgiving a traitor is a crime against the innocent.) ये दोनों ही डायलॉग व्यक्ति के दिलो-दिमाग़ पर गहरा छाप छोड़ रहे हैं क्योंकि एक ईमान तो दूसरा इंसाफ़ का ज़बरदस्त नमूना पेश करता है.

ये नाटक हमें कई अहम तालीम भी देता है. जैसे —न्याय स्थापित करना, निर्दोषों की रक्षा करना, अल्लाह पर यक़ीन करना और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ कभी हार ना मानना. वहीं औरतों का क़बीलों का सरदार होना, युद्ध में तलवारबाज़ी के साथ-साथ निर्णय लेने में भागीदारी होना, रूढ़िवादी और ग़ैर-मुस्लिम समाज के बुनी हुई झूठी कथाओं का भी पर्दफाश करता है जो मुस्लिम समाज को औरतों के उत्पीड़न के लिए हमेशा निशाना बनाते हैं.

एर्टुग्रुल का विरोध होना कोई सामान्य बात नहीं है. क्योंकि ये रूढ़िवादी समाज के ख़िलाफ़ मुस्लिमों के बेहतरीन इतिहास को चित्रित करने के साथ अल्लाह पर यक़ीन को बढ़ावा देता है. जो रूढ़िवादी गैर-मुस्लिम समाज का सबसे बड़ा डर है. ख़ास तौर पर 9/11 के बाद से इस्लामोफ़ोबिक समाज में अल्लाह पर बढ़ते यक़ीन को दुनिया का सबसे बड़ा ख़तरा माना जाता है. क्योंकि इस्लामिक क़ानून ना सिर्फ़ पूंजीवादी विचारधारा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है, बल्कि बढ़ती असमानता पर आघात करता है जो प्राईवेटाइज़ेशन का सबसे बड़ा हथियार है.

इसीलिए उनके द्वारा बनाए गए सीरियल्स या फ़िल्मों में मुस्लिम समाज के उन्हीं पहलुओं को दिखाया जाता है, जिससे पूरे मुस्लिम क़ौम को रूढ़िवादी व अत्याचारी का तमग़ा दिया जा सके. इसके अलावा सांस्कृतिक व्यवहार पर भी आक्रमण किया जाता है. इतना ही नहीं, इन पूंजीवादी विचारधाराओं द्वारा मुस्लिम समाज को इंसानियत के लिए ख़तरा बतया जाता है. ‘दिरिलिस एर्टुग्रुल’ इन्हीं तुच्छ मानसिकता व विरोधाभास पर कड़ा प्रहार करता है.

‘दिरिलिस एर्टुग्रुल’ एक ऐसा नाटक है जो ना सिर्फ़ मुसलमानों के अतीत की हक़ीक़त को दिखाता है बल्कि उसके ख़िलाफ़ रची गई साज़िशों पर भी प्रहार कर कूटनीति का भी पर्दाफ़ाश करता है. वहीं जिस धर्म को पूरी दुनिया मिलकर समाज के लिए ख़तरा बता रही, वो किस तरह से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ी और दुश्मनों के नापाक इरादों पर पानी फेर दिया. इस अहम तथ्य को भी बख़ूबी पेश करती है.

अभी तक मुस्लिम औरतों को जिस तरह से समाज में चित्रित किया गया है, उन तमाम कोशिशों पर प्रहार कर दिखाता है कि औरतों का क़बीले का सरदार होना और तलवारबाज़ी में उम्दा होने के साथ जंग पर जाना साबित करता है कि इस्लाम को किस तरह बदनाम किया जाता रहा है.

ये नाटक मुस्लिम समाज के दूसरों धर्मो के प्रति बेहतरीन धार्मिक व्यवहार को भी दिखाता है. एर्टुग्रुल का क़बीला धार्मिक विस्तार या प्रचार के लिए नहीं बल्कि अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था. ये लड़ाई सिर्फ़ सल्तनत बढ़ाने की नहीं थी. इस तरह से ये नाटक तमाम इस्लाम विरोधी रूढ़िवादी विचारधारा वाले लोगों की साज़िशों को असफल करने में कारगर साबित हो रहा है.

मुसलमानों को चित्रित करने वाले नाटकों में कहीं ना कहीं ये पहला प्रयास रहा है जिसमें मुसलमान के आतंकवादी और अमानवीय व्यवहार वाला नहीं दिखाया गया है. मुसलमान को अपने अस्तित्व और हक़ के लिए ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ने वाला दिखाया गया है. जिससे लोग डर रहे हैं कि कहीं ये मुस्लिम समाज में जागरूकता के साथ उन्हें अपने हक़ के लिए लड़ने के लिए प्रोत्साहित ना कर दे.

ये नाटक लोगों को सीखने और इस्लाम को समझने का एक बेहतरीन मौक़ा भी देता है. इंसानियत के ख़िलाफ़ अत्याचार और हक़ के लिए लड़ने और आवाज़ उठाना भी सिखाता है. ये मुस्लिम समाज को समझने और सीखने का बेहतरीन मौक़ा है जिससे अभी तक उन्हें महरूम रखा गया था.

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