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एक पत्रकार और उसका परिवार पिछले तीन सालों से कर रहा है एक दूसरे ही कोरोना वायरस का सामना!

आजकल इस देश में कोरोना की बड़ी चर्चा है. कोरोना यानी ऐसा जनांदोलन जो सरकार, राजनीति, माफ़िया, गिरोह और गैंग मिलकर चला रहे हैं. यह जनांदोलन शब्द एक भाजपा नेत्री का ही दिया हुआ है, इसके लिए मैं उनसे माफ़ी चाहता हूं.

यह एक ऐसा वायरस है जिसमें प्रधानमंत्री को हर तीसरे दिन देश को संबोधित करना पड़ रहा है और जब भी वे राष्ट्र को संबोधित करने आते हैं तो हर बार कोई न कोई नया शिगूफ़ा छोड़ जाते हैं. जैसे कभी वो घंटियां-थाल बजाने को कह जाते हैं और कभी मोमबत्तियां-दीए जलाने को. ऐसे समय में आतिशबाज़ी तक भी होती है.

मेरे जैसों की मुश्किल यह है कि ये सारे के सारे काम शुभ समय में किए जाने वाले हैं और उधर देश-विदेश में मरीज़ों और मरने वालों का आंकड़ा तो बढ़ता ही जा रहा है. एक अख़बार के मुताबिक़ यह ऐसा कोरोना है कि चीन में तीन हज़ार लोगों के मरने के बाद वहां जश्न मनाया गया और बाक़ायदा एक कोरोना कपल ने शादी की जिसे तीस लाख लोगों ने टेलीविज़न पर लाइव देखा.

ये कैसा कोरोना है? इसके बारे में विश्वसनीय जानकारी या सूचना एक ही है और वो यह है कि यह चीन की एक सी फूड मार्किट से फैला था. लेकिन उसके बाद सारी दुनिया में फैल गया. फिर भी ये देश तो अब भी दस-बीस ही हैं, बाक़ी देशों में न कोई मरीज़ है और न ही उससे कोई मौत हुई है.

हां, टेलीविज़न पर और अख़बारों में अस्सी से नब्बे फ़ीसदी ख़बरें इसी की चल रही हैं. जब ये कोरोना और इसके लिए लागू लाॅकडाउन इतने ख़तरनाक मोड पर है, ठीक तभी हमारे इतने ख़ास काबीना मंत्री का दर्जा पाए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल एक मस्जिद खाली करवाने जाते हैं, लेकिन उन्हें किसी मास्क की ज़रूरत महसूस नहीं होती? यह कोरोना वायरस ऐसा भी है.

इसलिए हम कोरोना को भूल जाते हैं और एक दूसरे ख़तरनाक वायरस की फ़िक्र करते हैं. यह भी कोरोना के साथ-साथ ही जहां द्वारका मोड़ के पास उत्तम नगर के विपिन गार्डन में मैं रह रहा हूं, वहां लंबे-चैड़े इलाक़े में फैला है. मैं और मेरा परिवार पिछले तीन सालों से लगातार यहां इसका सामना कर रहे हैं या इसे भुगत रहे हैं.

इसे भी आप वैश्विक माहमारी कह सकते हैं. जिसे मैं लगभग पिछले तीन साल से बार-बार मर-मरकर झेलता जा रहा हूं. अपनी सुविधा के लिए हम इसका नाम किरोना रख छोड़ते हैं. ये किरोना इतना ख़तरनाक है कि इसने माफ़िया, गिरोह और गैंग का रूप ले लिया है जो कुछ भी करने को तो तैयार रहता ही है. बहुत से लोकल लोगों को छोड़कर इनके बारे में यह पता लगाना भी मुश्किल है कि ये आते कहां से हैं या इन्हें भेजता कौन है?

इस किरोना वायरस, माहमारी या आपदा का समय भी बड़ा ख़ास है. इसे पैदा करने वाले बहुत ही खुलकर खेल रहे हैं. यह ऐसे समय में अवतरित हुआ है जब हमारे घर के ठीक सामने एक क़ब्रिस्तान टूटा पड़ा है, उधर नवरात्रे भी लाॅकडाउन की भेंट चढ़ गए हैं. और ये ऐसा समय है कि जब इस माहमारी और आपदा का संरक्षण दे रही दो-दो महिलाएं इसकी ख़ातिर ही हुए लाॅकडाउन में घर पर अपनी भूमिका के लिए बनी रह सकती हैं.

ये महिलाएं भी किसी डेरे या आश्रम का प्रताप और आशीर्वाद हो सकती हैं. अगर अड़ोस-पड़ोस से किसी के इंस्ट्रूमेंट्स आपको रात को सोने के बजाय जाम करके रखने लगें और आप सुबह इस अहसास के साथ उठें कि मैं तो सोया ही नहीं था तो समझिए कि इस वायरस का प्रकोप आपके आसपास है.

अड़ोस-पड़ोस में किरोना वायरस हो तो ऐसा भी होता है कि सुबह से रात तक और रात से सुबह तक आपकी पेंट ढीली की जाती रहे और आप सिर्फ़ बेल्ट ही कसते रहें. अगर आप और आपके परिवार के लोग कटिंग करवाने पहुंचे और वहां से सब कुछ मुंडवाकर वापस लौटें तो समझिए कि वहां भी इस किरोना वायरस के कीटाणु मौजूद थे. अगर रात को आपको महसूस हो कि किसी ने अड़ोस-पड़ोस से ढेरों मच्छर तो आपका खून पीने के लिए नहीं छोड़ दिए तो समझिए कि वहां इस किरोना वायरस के कीटाणु मौजूद हैं.

अगर आपके इलाक़े के गाय, कुत्ते और कबूतरों जैसे बेज़ुबान प्राणी किसी ख़ास वजह से आपको हलकान दिखें या अजीबो-गरीब व्यवहार प्रदर्शित करने लगें और आपको लगे कि वे तो किसी के इशारों या उंगलियों पर ही नाच रहे हैं तो समझिए कि इस किरोना वायरस के कीटाणु आपके आसपास मौजूद हैं.

अगर आपको लगे कि कोई आपकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ आपके दिमाग़ में गालियां और अपशब्द फीड कर रहा है तो समझिए कि इस किरोना वायरस के कीटाणु आपके आसपास ही हैं. अगर किसी फ़र्ज़ी आपदा के चलते आपके रिहाइशी इलाक़े में सभी ज़रूरी सामानों के बजाय सिर्फ़ मामूली तंबाकू जैसा सामान ही पांच रुपये के बजाए चार गुना दामों पर बीस रुपये में बिकने लगे और कुछ दिनों बाद वह फिर पांच रुपये में ही मिलने लगे तो समझिए कि इस किरोना वायरस का मैनेज करने वाले और फैलाने वाले आपके आसपास ही हैं.

अगर आपको यह लगे कि रात को सोए-सोए ही कोई आपके बाल तक उड़ा रहा है तो समझिए कि यह वायरस या आतंकवाद आपके सिरहाने ही खड़ा है. अगर आपको लगे कि आपके ख़ास टेलीविज़न पर एंकर या रिपोर्टर भी आपको देख रहा है और वहां जो दृश्य दिखाया जा रहा है वह आपकी सेहत को कोई नुक़सान पहुंचा सकता है तो समझिए कि इस माहमारी का वायरस आपको डस सकता है.

अगर ग्रेजुएट होते हुए भी आपको ऐसा अख़बार मिलने लगे और फिर अचानक वह भी मिलना बंद हो जाए जिसके लेखों और ख़बरों को पढ़ना आपके लिए बहुत यातनाप्रद हो तो समझिए कि यह वायरस आपके काफ़ी क़रीब पहुंचा हुआ है. अगर आपके अड़ोस-पड़ोस के लोग दिनभर गली में रैंकने के अलावा अपने घर में किन्हीं ख़ास मौक़ों पर रोना-पीटना या नुक्कड़ नाटक जैसे आयोजन करना शुरू कर दें तो समझिए कि यह ख़तरनाक वायरस आपके समीप ही है.

अगर आपको यह पता चल जाए कि पिछले सात साल से आपको लैट्रिन से निवृत्त हो पाने या न हो पाने की अनुमति पड़ोसियों से मिल रही है तो आपको समझना चाहिए कि यह कीटाणु किस हद तक भयावह हैं या अब तक कैसी मार कर रहे थे. यह किरोना वायरस ऐसा भी है कि आप कोई चीज़ या खाना ही खाएं और आपको पता ही न चले कि वह पता नहीं किसके पेट में चला गया.

अगर दुकानों पर दुकानदार आपको दूसरे ग्राहकों के नाम पर किसी ख़ास वजह से रोककर खड़ा रखना शुरू कर दें तो समझिए कि यह वायरस आपसे ज़्यादा दूर नहीं है. इन्हीं दुकानों पर ठीक उसी समय भेजा गया या इनवाइट किया गया कोई बच्चा ही अगर आपको बहुत कुछ भुला जाए तो आप समझ सकते हैं कि यह कितना ख़तरनाक वायरस है.

घर से बाहर कुछ लोगों को आपके सामने हाथ रगड़ने या मसलने की ज़रूरत महसूस हो सकती है, अगर ऐसा हो तो समझिए कि यह इसी किरोना वायरस का कमाल है.

रात को अकेले लेटे-लेटे जब आप यह सोच रहे हों कि इस वायरस से अपने को बचाए कैसे रखा जाए और आपकी गली के कुत्ते इतने समझदार हों कि वे भी भौंक-भौंककर आपको यह बताएं कि यह काम बड़ा ही ज़रूरी है तो समझिए कि इस वायरस ने आदमियों तो आदमियों कुत्तों को भी अपनी ज़द में ले रखा है.

और अगर आपको यह लगे कि इस वायरस से बचाव या ऐसी गड़बड़ियों से जूझने के बजाए आपके घर के लोग तो जो कुछ हो रहा है और एक ख़ास तरह के आतंकवाद के आगे घुटने टेके हुए हैं तो समझिए कि यह वायरस आपके साथ-साथ उन्हें भी धमका रहा होगा.

इस वायरस से जुड़ी सबसे भयावह बात यह है कि अगर आपको एक दिन पता चले कि आपके घर में रह रही औरत दिन में दस-बारह घंटे सुप्रीम कोर्ट के नेट को मानवाधिकार बताए गए अधिकार का इस्तेमाल भारी प्रताड़ना के लिए भी कर सकती है और उसका न आपसे कोई वास्ता है और न आपके बच्चे से. या फिर वह आपसे ज़्यादा आपके अड़ोसियों-पड़ोसियों की वफ़ादार है तो आप खुद ही समझ सकते हैं कि यह ख़तरनाक वायरस कहां तक पहुंच चुका है.

अगर यह औरत रोज़-रोज़ अपने रंग-रूप और आकार-प्रकार बदलती जाए तो ज़ाहिर है कि इस वायरस के कीटाणु ख़तरनाक तो हैं ही. हो सकता है कि आपके साथ उसको भी अपनी ज़द में ले रहे हों.

हां, एक बात ख़ास है कि ऐसी औरत के साथ रहते हुए भी अगर आप सालों से इस तरह भी चलते जा रहे हों कि कभी खाना खा लिया और कभी नहीं तो हो सकता है कि आपमें इतना माद्दा पैदा हो गया हो कि आप कम से कम इस ख़तरनाक वायरस से दुनिया को तो अवगत करा ही दें और उससे बचाव के तरीक़े भी बता दें.

अगर आप जब सबसे ज़्यादा दुखी हों तभी आपको अड़ोस-पड़ोस से और कभी धर्मपत्नी के मोबाइल से बहुत ही मधुर संगीत सुनने को मिले तो आपको समझना चाहिए कि किरोना का वायरस संगठित ही नहीं वेल मैनेज्ड भी है. ऐसा वेल मैनेज्ड कि प्रधानमंत्री के एक संबोधन पर सारा इलाक़ा ही एकजुट और तैयार है.

ये तैयारी ऐसी है कि इसने एक माफ़िया, गिरोह या गैंग का रुख ले लिया है और हम मर-मरकर जीने को मजबूर हैं. प्रधानमंत्री के ख़ास संबोधनों को सभी लोग इतने ग़ौर से कब से और क्यों सुनने लगे?

अगर आपको ऐसा महसूस हो कि बार-बार करोड़पति पड़ोसियों के बच्चे खो जाते हैं और उन्हें आवाज़ें लगा-लगाकर कहीं वे मेरा अपना या घर के दूसरे लोगों का अपहरण न कर लेते हों तो मुझे क्या किसी को भी यह समझने में देर नहीं लगनी चाहिए कि ये किरोना वायरस कितना ख़तरनाक है.

वैसे यह किरोना वायरस चाहे हो कितना भी ख़तरनाक, लेकिन अगर आप हमारी ही या हमारे जैसी ही किसी कॉलोनी में रहते हैं तो आपको भी घर पर ही या घर से बाहर निकलते ही इस वायरस के कीटाणुओं या उनकी विशेषताओं के दीदार हो जाएंगे.

मुझे इस माहमारी का दीदार सबसे पहले सुसराल में एक मृत व्यक्ति की क्रिया में हुआ था. हालांकि आज भी मेरा मानना है कि वह आदमी मरा ही नहीं क्योंकि मैंने उक्त मृत व्यक्ति की शक्ल वहां देखी ही नहीं. यही मेरा इस माहमारी के कीटाणुओं से पहला साक्षात्कार था.

वहां मुझे एक बहुत ख़ास रिश्तेदार ने मुंह संवारकर दिखाया था जिसका मतलब यह होता है कि आप कुछ खाना-पीना चाह रहे हैं तब से मेरा ख्याल यही है कि यही इस माहमारी का सबसे बड़ा और पहला लक्षण है. लेकिन मुश्किल यह है कि मुंह तो हर कोई संवारता है किसी न किसी चीज़ के लिए तो फिर यह माहमारी तो दर्जनों, सैंकड़ों या हज़ारों क्या लाखों लोगों को निगल सकती है. क्या ऐसा हो सकता है? यह मुंह संवारने जैसे क़ानून आख़िर इस इक्कीसवीं सदी में आ कहां से गए?

घर से बाहर निकलते ही आप देख सकते हैं कि किरोना वायरस से ग्रसित व्यक्ति को आपके सामने किसी ख़ास जगह पर ख़ास तरह की खुजली हो सकती है. और अगर आप किसी दूसरे की मर्ज़ी से ही किसी ख़ास जगह पर खुजाने लगें तो आप समझिए कि आपको भी सावधानी की ज़रूरत है.

इसी तरह अगर घर के बाहर कोई व्यक्ति आपके सामने किसी ख़ास मौक़े पर छींकता है तो आप समझिए कि उस आदमी में भी इस वायरस के कीटाणु हैं और वह समय आपके लिए अशुभ हो सकता है. अगर दो आदमी ख़ासतौर पर आपको हंसते-मुस्कुराते हुए हाथ मिलाते हुए मिल जाएं तो समझिए कि उनमें कोई गुप्त समझौता हो गया है और वह आपके लिए बहुत ख़तरनाक भी हो सकता है.

कभी इसके लिए मुझे घर से बच्चे की हिदायत मिली थी कि अगर कोई हाथ मिलाना भी चाहे तो उसके आगे हाथ जोड़ देना ही बेहतर होगा. अगर कोई व्यक्ति किसी ख़ास मौक़े पर बाक़ायदा आपके सामने खड़ा होकर ख़ासतौर पर अपने मोबाइल का इस्तेमाल कर रहा है तो समझिए कि वह आदमी ही नहीं उसका मोबाइल तक यह वायरस आप तक पहुंचाने में सक्षम है फिर चाहे नेट को सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक या मानवाधिकार ही क्यों न बताया हो. अब यह बात और है कि उक्त व्यक्ति का मोबाइल जो कमांड दे रहा हो उसे अड़ोस-पड़ोस का कोई वार रूम आगे बढ़ा रहा हो.

अगर आप घर में किसी अड़ोस-पड़ोस की मर्ज़ी से हर काम ख़ासतौर पर टाइम देखकर ही कर रहे हैं तो समझिए कि वहां ऐसे कीटाणु मौजूद हैं जो आपको रोगग्रस्त कर सकते हैं. अगर आपके घर में अड़ोस-पड़ोस की मर्ज़ी से ही आप के दिमाग़ पर क़ब्ज़ा करके उस पर जबरन यह क़ानून थोपकर रखा जा रहा हो कि आप तो रोटी खा गए या चाय या पानी पी गए तो आपको समझना चाहिए कि इस वैश्विक माहमारी के कीटाणु आपसे दूर नहीं हैं. इसमें दिलचस्प बात यह है कि रोटी का क़ानून तो आपको पढ़ाया जा रहा है, लेकिन बाक़ी चीज़ों का कोई क़ानून नहीं समझाया जा रहा. लेकिन उन चीज़ों को भी जब खाने के लिए इस्तेमाल करना चाहें तो वह भी उतना ही ख़तरनाक घोषित कर दिया जाता है.

वैसे मुझे एक जगह से यह भी समझाया गया कि आपके दिमाग़ को कंट्रोल में रखकर आपके साथ यह आतंकी खेल खेला जा रहा है. आप जिस घर में रह रहे हैं और जिस टॉयलेट का इस्तेमाल कर रहे हैं, वहां अगर आपका साथी किसी ख़ास वक़्त पर पादता है या हगने-मूतने जाता है तो वह भी आपके लिए ख़तरनाक हो सकता है.

वैसे इस वायरस के इन ख़ास कीटाणुओं से भी ख़तरनाक वह यातना है जो एक ख़ास तरह की मानसिकता के आतंक में साये में आपको क़ैद रखकर सालों दी जा सकती है और बीमारी के नाम पर कोई फ़र्ज़ी एमबीबीएस डाॅक्टर दवाओं के नाम पर और ज़हर खिला सकते हैं. ये किरोना यहां इस हद तक भी फैला है कि पहले खुद इस पत्रकार का, फिर उसके पिता का और अब उसके बेटे का भी दिमाग़ी उपचार चल रहा है. मेरी जानकारी में घर के सभी लोगों का दो नंबर का इलाज हो चुका है.

इस वायरस के कीटाणु इतने ख़तरनाक हैं कि आपके पड़ोसी आपका बैड हिलाकर भी दिखा देते हैं और आपकी रात भर कमेंट्री सुनने के लिए आपको बाक़ायदा बताकर किसी गुप्त माइक का प्रबंध भी कर सकते हैं. यह भी हो सकता है कि आप रात को अपने ठीक-ठाक सोने के लिए कोई सेफ़ बेड ही ढूंढते रहें.

जब मैं यह सब लिख रहा हूं तो मैं कंस्ट्रेट नहीं कर पा रहा और मुझे पूरे फोलो में लिखने नहीं दिया जा रहा और अपने लिखने के जो बिंदू मेरे पास हैं उन्हें याद करने के लिए मुझे कुर्सी से उठकर बाहर जाना पड़ रहा है. यह भी क्या इसी माहमारी के कीटाणुओं या वायरस से पैदा हुई मुश्किल है?

मेरा इस देश में इस तरह के आतंक से तो नहीं लेकिन इतनी ग़ैर क़ानूनी आपदा से यह पहला ही वास्ता है. इसलिए मैं यह सोचने को मजबूर हूं कि इस देश का लोकतंत्र, संविधान और सरकार कहां हैं और इस माहमारी के क़ानूनी पहलू क्या-क्या हैं?

वैसे इस माहमारी और आपदा का एक पहलू मेरे दिमाग़ में हमेशा बना रहता है कि यह इस घर को या मुझे मिटाने के लिए जबरन पैदा की गई आपदा है और यह मिशन यहां से लेकर वहां गली के नुक्कड़ तक ही बड़ी पर्देदारी में चल रहा है. लेकिन उसके लिए यहां जो जमावड़ा किया गया है वह बड़ा सकते में डालने वाला है.

मेरे दिमाग़ से 24 घंटे कनेक्ट रहकर मुझे समझा-समझाकर पागलों जैसा बनाए रखने वाले आतंकी बताते हैं कि यह तो 14वीं सदी का क़ानून है. मैं यही सोच-सोचकर परेशान हूं कि इस 21वीं सदी में यह 14वीं सदी का क़ानून यहां क्या कर रहा है? वह भी मेट्रो ट्रेन आने से पहले क़रीब-क़रीब इस सबसे पिछड़ा हुआ इलाक़ा माने जाने वाले इलाक़े में.

यहां क़ानून हरियाणा और खापों का लागू बताया जाता है, पंजाब वालों से सुबह-शाम दो-दो घंटे टेलीविज़न पर माता की फ़र्ज़ी और काली लाइव भक्ति सुनना भी ज़रूरी है और ज्योत जलाना भी और यहां आशीर्वाद देवभूमि हिमाचल प्रदेश से पहुंच रहे हैं.

मैं लगातार यहां इन बुरे हालात से गुज़रता आ रहा हूं कि बेहद बदतर हालत में मुझे मेरे मरने के दिन तय करके बताए जाते हैं. यहां लंबे समय से भिखारी और कंजर प्रजाति के लोग भी घर की बेल बजाकर या दरवाज़ा पीटकर भिक्षा मांगने के लिए ख़ासतौर पर भेजे जाते रहे हैं.

एक दिन मुझे बाबा रामदेव की दुकान से एक आई ड्रॉप लाना था. मैं वहां गया भी और लौटा भी, लेकिन वहां जाते हुए और लौटते हुए मैंने देखा कि दो बेढंगे प्रेत ठीक मेरे आगे-आगे चलने की कोशिश कर रहे हैं. मैं तो उसी तरह निकल आया लेकिन बाक़ी लोगों को भी सावधान रहने की ज़रूरत है.

अगर आपके आगे-आगे कोई इस तरह से चले तो तुरंत सावधान हो जाइए क्योंकि उनमें कोरोना के तो नहीं, हां किरोना के कीटाणु ज़रूर हो सकते हैं. क्या यह क़ानून किसी कश्मीर से आया है, किसी इंगलिश्तान से या किसी इब्राहिम लोधी की क़ब्र से? फिर ये यहां लागू कैसे हो गया और वह भी माहमारी और आपदा का क़ानून. अगर यह इसी तरह लागू हुआ है तो हमारे अपने क़ानून, संविधान, संसद और लोकतंत्र कहां हैं?

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. ये उनके निजी विचार हैं.

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