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Reading: गांधी रहते तो उनका हार्ट अटैक हो गया होता: शम्भू दत्त
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BeyondHeadlines > Latest News > गांधी रहते तो उनका हार्ट अटैक हो गया होता: शम्भू दत्त
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गांधी रहते तो उनका हार्ट अटैक हो गया होता: शम्भू दत्त

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published October 2, 2012 12 Views
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14 Min Read
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94 वर्षीय शम्भू दत्त (शर्मा) आज भी गांधी के विचारों को घर-घर पहुंचा रहे हैं. गांधी के सपनों को साकार करने में जुटे शम्भू दत्त से ‘हिन्द स्वराज के सौ वर्ष और स्वतंत्र भारत’ विषय पर रू-ब-रू हुए आशुतोष कुमार सिंह….

प्र0- गांधी की स्वराज दृष्टि अन्य भारतीय राजनीतिज्ञों की स्वराज दृष्टि से किन अर्थों में अलग थी?

उत्तर- आज के राजनीतिज्ञों में दृष्टि बची कहां है. गांधी जी कहा करते थे कि जनता को अपने नुमाइंदों के कर्मों पर प्रश्न उठाने का, उन पर लीगल एक्शन लेने का एवं ऐसे सभी कार्य करने का अधिकार है जिससे की वातावरण गंदा न हो.

आज संसद में 125 सांसद ऐसे हैं जिन पर देश के कचहरियों में सीरियस क्रिमीनल केसेज हैं. यह मैं नहीं कह रहा हूं, यह खुद इन सांसदों ने स्वीकार किया है कि हमारे खिलाफ़ मुकदमें चल रहे हैं.

हमने सुप्रीम कोर्ट में एशोसिएसन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के साथ मिलकर एक रीट पेटीसन लड़ा था. यह केस लम्बा चला. कोर्ट का फैसला हमारे हक़ में आया. कोर्ट ने कहा कि जनता को अपने प्रतिनिधियों की सम्पत्ति के बारे में सब कुछ जानने का अधिकार है. जनता के हक़ में गांधीयन सत्याग्रह ब्रिगेड सरकार से तीन क़दम उठाने की मांग करती है.

प्र0- कौन-कौन से क़दम?

उत्तर- पहला यह कि लोकपाल बनाया जाए. गत् 40 वर्षों से लोकपाल बनाने की बात हो रही है. मौजूदा सरकार के प्रधानमंत्री एवं कांग्रेस अध्यक्ष ने लिखित रूप में यह आश्वासन दिया था कि सरकार बनने पर वे लोकपाल बनायेंगे. परन्तु दुर्भाग्य की बात है कि यह विधेयक मनमोहन सिंह पेश तक नहीं कर पाएं.

राजनीतिक भ्रष्टाचार रोकने में लोकपाल एक अहम रोल अदा कर सकता है. मेरा मानना है कि गर कौम की रहनुमाओं में ही भ्रष्टाचार घर कर जाएं तो ऐसे में उस कौम को डूबने से कोई नहीं बचा सकता.

प्र0- आपकी दूसरी मांग-

उत्तर- हम सरकार से दूसरी मांग यह करते हैं कि उन लोगों को अयोग्य घोषित करें, जिनके खिलाफ सीरियस क्रिमनल केसेज हैं. मैं तो उन पार्टियों को भी दोषी मानता हूं- जो ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देती हैं. पार्टियां कहती हैं कि वह जीतने वालों को टिकट देती है. ठीक है, लेकिन क्या एक अरब की इस जनसंख्या में उनको 545 ईमानदार एवं बेदाग चरित्र वाले उम्मीदवार नहीं मिलते हैं? सभी पार्टियों ने मिलकर राजनीतिक अपराध को बढ़ावा दिया है.

प्र0- आपने उन उम्मीदवारों को टिकट नहीं देने की वकालत कर रहे हैं, जिनपर महज मुक़दमें चल रहे हैं. आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं. ऐसे में उनके अधिकारों का हनन नहीं होता?

उत्तर- आपने ठीक कहा. लेकिन आपको क्या लगता है, शहाबुद्दीन, लालू यादव, शिबू शोरेन, पप्पु यादव- सरीखे तमाम लोगों पर क्या कोई झुठा केश दर्ज कर सकता है!

यदि कोई करता भी है तो आप सीधे इसका कम्पलेन हाईकोर्ट में कीजिए कि आप पर फर्जी मुक़दमा किया गया है. नैतिकता भी कोई चीज होती है. आप अपने को पहले सारे मामलों में बरी करा लो फिर चुनाव लड़ो. एक आइडियल बनों. लोग तुमसे प्रेरणा लेंगे.

प्र0- आपकी तीसरी मांग.

उत्तर- जो राजनीतिज्ञ अपनी सम्पत्ति का ब्योरा नहीं देते उनकी सम्पत्ति को जब्त किया जाए. यह बात हमारी ही नहीं है. इस बावत लॉ कमिशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन वी.पी. जीवन रेड्डी ने भारत सरकार को 1999 ई0 में ही कहा था कि जन प्रतिनिधियों की सम्पत्ति को सार्वजनिक किया जाए एवं ऐसी मशिनरी तैयार की जाएं जिससे जन प्रतिनिधियों की आय का सही ब्योरा चेक आउट किया जा सके. यह दुखद बात है कि 1999 में इससे सम्बंधित एक बिल लाया गया लेकिन अभी तक वह पेश तक नहीं हो पाया है.

सरकारी अधिकारियों के लिए एक पब्लिक सर्विस कंडक्टर रूल बनाया गया है, जिसके तहत इनको अपने ऐसेट्स डिक्लियर करने होते हैं, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिज्ञों के लिए यह ज़रूरी नहीं है.

सरकार के पास इस तरह का कोई मशिनरी नहीं है जो यह चेक करे कि राजनीतिज्ञ जो अपने असेट्स के बारे में बता रहा है वह सही है या गलत.

प्र0- अभी जो स्थिति बन रही है इसका कारण कहीं राष्ट्र राज्य की यूरोपीय अवधारणा को यथावत अपनाया जाना तो नहीं है?

उत्तर- यह कहना गलत है. हमारे संविधान को एक सभा ने मिलकर बनाया. जिसमें सरदार पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, जवाहर लाल नेहरू, भीम राव अम्बेडकर जैसे पंडित वकील थे. पूरे विश्व के संविधानों का अध्ययन करने के बाद यह संविधान बना.

हमारा संविधान अच्छा है. कितनी भी अच्छी चीज क्यों न हो जब वह बेइमानों के हाथ में पड़ती है तो वह चीज मिट्टी हो जाती है. इस बारे में राजेन्द्र प्रसाद कहा करते थे कि विधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, इसकी उपयोगिता तभी है जब यह सुयोग्य लोगों के हाथ में हो. पाकिस्तान में तो विधान बन भी नहीं पाया. जिन लोगों को इस संविधान से कहीं भी आपत्ति है, वे बताएं कि वैकल्पिक क्या व्यवस्था हो सकती है. हमारे पास संविधान में संशोधन करने की गुंजाइस तो हैं ही. लेकिन एक जो सबसे महत्वपूर्ण विषय है, वह है कि जब तक यहां का नागरिक संविधान में वर्णित कर्तव्यों का पालन नहीं करता है, तब तक उसके अधिकारों के कोई मायने नहीं है.

प्र0- यदि कर्तव्यों की ही बात करें अथवा नैतिकता की ही बात की जाएं तो, ‘हिन्द स्वराज’ में गांधी ने जो सपना देखा था, जो बातें कहीं थी, वे बातें आज के मौजूदा हालात में कितना अर्थयुक्त हैं?

उत्तर- गांधी के विचारों के मूल में दो मुख्य बातें है- पहला सत्य और दूसरा अहिंसा. बाकी जितनी भी बातें हैं- मसलन चरखा, शराब बंदी, वयस्क मताधिकार की बात, सभी इन मूल बातों के प्रयोग में साधन के समान है. गांधी ने जो कुछ भी कहा उसके पीछे एक दूर दृष्टि थी.

उन्होंने वयस्क मताधिकार की ही बात की और कहा कि देश के प्रत्येक वयस्क (महिला/पुरुष) को मत देने का अधिकार होना चाहिए. इस बात पर विरोध भी हुआ परन्तु गांधी का मानना था कि जनता के नुमाइंदे जब गांव-गांव वोट मांगने जायेंगे तब ग्रामीण जनता में राजनैतिक समझ बढ़ेगी, उनकी भागीदारी सुनिश्चित होगी. जनता अगर नाराज़ हो जाए तो कैसी भी सरकार हो उसको उखाड़ कर फेंक देगी. आज के राजनीतिज्ञ वोट के लिए जनता को शराबी एवं बेइमान बना रहे हैं. ऐसा गांधी ने कभी नहीं सोचा होगा. आज गांधी रहते तो यह सब देखकर उनका ‘हार्ट अटैक’ हो जाता.

एक बार मैं काका कालेलकर से मिला और उनसे गांधी को एक पैरा में डिफाइन करने को कहा- उन्होंने मुझसे कहा एक पैरा में क्यों? कहो तो मैं गांधी को चार शब्दों में समेट दूं. उन्होंने फिर बताया कि- सत्य, अहिंसा, संयम एवं सेवा, इन चार तत्वों से मिलकर गांधी का निर्माण होता है. तब से मेरे लिए ये चार शब्द जीवनमंत्र बन गए.

प्र0 – आप इन चारों शब्दों को अपने नब्बे वर्षीय जीवन में कहां तक उतार पाएं हैं?

उत्तर- मैं तो इन्हीं शब्दों को कसौटी मानकर चलता हूं. कई बार गिरता हूं, सम्भलता हूं और पुनः एक सत्याग्रही की तरह चल पड़ता हूं. मैंने 1942 में गांधी जी के कहने पर सरकारी नौकरी को छोड़ दिया था. उसी समय मुझे गिरफ्तार कर लिया गया. परन्तु हम सत्याग्रहियों का आंदोलन खत्म नहीं हुआ जो निरंतर आज भी लोक सेवक संघ के रूप में चल रहा है.

प्र0- आज के संदर्भ में यदि हम देखे तो हमारी भाषा, संस्कृति, अर्थव्यवस्था एवं राष्ट्रीय सम्प्रभुता पर वैश्विक पूंजि का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है. जिसको समीक्षक नव-उपनिवेशवाद की संज्ञा तक देने लगे हैं. इस स्थिति को आप किस रूप में देखते हैं?

उत्तर- आज दुनियां सिमटकर एक मोबाइल में बंद हो गई है. आज वैश्विक गांव की बात हो रही है. जो भी भाषा, संस्कृति होगी या है वह मानव समुदाय के हितार्थ ही बनती बिगड़ती है. जहां तक इसके प्रभाव का प्रश्न है तो ऐसा नहीं है कि हमारे ही देश पर पड़ रहा है. हमारी सभ्यता, संस्कृति का प्रभाव भी अन्य देशों पर पड़ा है. जब हम दूसरे देशों में जाकर व्यापार कर सकते हैं, पूंजी लगा सकते हैं, वहां की कम्पनियों का अधिग्रहण कर सकते हैं तो फिर दूसरों को आप अपने देश में आने से कैसे रोक सकते हैं? कम्प्यूटर आया था तब भी हाय-तौबा मची थी, लेकिन इसने कितनों को बेरोजगार किया. लगभग नहीं के बराबर. कितनों को रोजगार दिया, यह छुपी हुई बात नहीं है. आईटी का बूम सभी जानते हैं. हम लोग अकारण डरे हुए हैं.

प्र0-इसी संदर्भ में एक और प्रश्न, आज के भारत में गांधी, भगत सिंह, नेहरू, अंबेडकर, लोहिया, सुभाष एवं जे.पी. के विचारों पर पूंजिवाद हावी है. विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश एवं विश्व व्यापार संगठन अपने हिसाब से भारत को चला रहे हैं?

उत्तर- मैं आपकी बातों से सहमत नहीं हूं. इन बैंकों से मदद हम लेते. हम इनके पास जाते हैं.

प्र0- एक और अहम सवाल उठता है कि आज जिस तरह से राजनीतिक अस्थिरता का माहौल पूरे देश में है. ऐसे में वह कौन सी राजनीतिक पार्टी है जो इस अस्थिरता के माहौल से भारत को निकाल सकती है?

उत्तर- यह बात तो ब्रह्मा भी आएं तो नहीं बता सकते हैं. लेकिन तुलनात्मक रूप से क्रांग्रेस को मैं अच्छा समझता हूं.

प्र0- आप उस कांग्रेस की बात कर रहे हैं जिसकी महत्ता को खुद गांधी ने 28 जनवरी 1948 को नकार दिया था?

उत्तर- यह बात सही है कि गांधी जी अपने मरने के दो दिन पहले यह कहे थे कि ‘कांग्रेस’ की ज़रूरत इस देश को नहीं है. कांग्रेस को भंग कर दिया जाएं. परन्तु ऐसा नहीं हो सका. गांधी को मार दिया गया. खैर यह अलग विषय है. आज के परिपेक्ष्य में मुझे कांग्रेस लिस्ट कम्युनल लगती है. जबकी भाजपा कम्यूनल दिखती है. ऐसा नहीं है कि भाजपा में अच्छे नेता नहीं है. भ्रष्टाचार के मामले में सभी पार्टियां बराबर हैं. आज जनता की नज़र में राजनीति चलाने वालों का ग्राफ बहुत गिर गया है.

प्र0- एक नये, सुंदर, नैतिक-अनुशासित एवं सही अर्थों में स्वतंत्र भारत को लेकर आपके क्या सपने रहे थे?

उत्तर- हमारे ख्वाबों की ताबीर इतनी भयानक होगी उम्मीद न थी. मैं तो मानता हूं कि जब नागरिक चुप बैठ जाएगा. जुल्म बरदास्त करेगा तो देश डूब जायेगा. एक बार पुनः सत्याग्रह करने की ज़रूरत है ताकि ‘हिन्द स्वराज’ की परिकल्पना पूर्ण हो सके.

प्र0- एक अंतिम प्रश्न, आज का नौजवान भटके हुए हैं. भारत का भविष्य इन्हीं पर टिका हुआ है. भारत के भावी कर्णधारों को आप क्या कहना चाहेंगे?

उत्तर- मैं भी इनसे वही बात कहुंगा जो हमारे बुजूर्गो ने मुझसे कहा था. गर भारत ही नहीं रहेगा तब कौन जीवित रहेगा. यदि भारत बचा रहा तब रहने वाले तो आप ही होंगे.

(नोटः शम्भू दत्ता गांधीयन सत्याग्रह ब्रीगेड के महासचिव हैं. लोक सेवक संघ के कार्यकारी चेयरमैन हैं. इन्होंने अपने नाम से ‘शर्मा’ शब्द को जाति सूचक होने के कारण हटा दिया है. और इनका यह साक्षात्कार 10 अक्टूबर 2008 को लाजपत भवन, नई दिल्ली में में लिया गया था. जो पहली बार BeyondHeadlines पर प्रकाशित किया जा रहा है.)

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