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लखनऊ जेल से एक क़ैदी का खत…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published October 3, 2012 12 Views
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6 Min Read
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BeyondHeadlines News Desk

सलाम!

हम भी इंसान हैं और देशभक्त शहरी भी जो नापाक साजिशों के तहत दहशतगर्दी के आरोप में ज़बरदस्ती फंसाए गए बेकसूर हैं. आज हम लोग बेइन्तहां जुल्म से परेशान होकर आपस में आत्महत्या और उसकी जायज गुंजाइश के बारे में एक दूसरे से पूछने लगे हैं. हमारे खिलाफ़ होने वाली अमानवीयता (जो जेल अधिकारियों की आपराधिक मानसिकता के कारण है) ने हमें इस क़दर मायूस कर दिया है कि आत्महत्या ही आखिरी विकल्प लगने लगा है.

हममें से सभी को अपने-अपने घरों, बाजारों, खेतों से, राह चलते हुए गैर-कानूनी कैद कर अगवा करके, गैर कानूनी हिरासत में रखकर भयानक हिंसा के ज़रिए कहानियां गढ़कर लखनऊ, बाराबंकी, उन्नाव या फिर अन्य दूसरी जगहों से कई-कई दिन बाद गैरकानूनी सामानों के साथ गिरफ्तारियां दिखाकर लंबी-लंबी पुलिस हिरासत में लेकर सुबूत गढ़ने के बाद सलाखों के पीछे ढ़केल दिया गया.

सुरक्षा के नाम पर हाई-सेक्योरिटी के नाम पर बने कमरों में ठूंसकर बेपनाह उत्पीड़न पहले भी किया गया और आज भी इरादतन साम्प्रदायिक तौर पर जारी है.

सीलन भरी अंधेरी, बेरोशनदान वाली आठ गुणे बारह की छोटी सी सेल में लगातार बंद रखा जाता, एक मिनट के लिए भी न खोला जाता. तेरह जून 2008 दिन शुक्रवार को जुल्म का नंगा नाच करते हुए हमें चमड़े के हंटरों और लाठियों से हमारे जिस्मों को फाड़ा और तोड़ा गया. पवित्र कुरान को अपवित्र किया गया, उसके पन्ने फाड़कर शौचालय में फेंका गया.

हमारे सारे कपड़े, चादर, किताबें जप्त कर ली गईं, बल्कि शुरु के ही दिनों में कपड़ों पर पाबन्दी लगा दी गई कि सिर्फ दो जोड़े कपड़े, एक लुंगी, एक तौलिया यहां तक की अण्डरवियर भी दो से ज्यादा रखने की इजाज़त न दी जाती थी.

तंग होकर हमने लंबी भूख हड़ताल, खाने-पीने का मुकम्मल बाईकाट विरोध के बतौर किया. तब 27 जनवरी 2009 से आधा घंटा के लिए पत्थर की ऊंची दीवारों वाले इतने छोटे से बरामदे में खोला जाने लगा जिसमें से 12 बजे के बाद से ही धूप गायब हो जाती और हरियाली का तो नामों निशान तक नज़र नहीं आता.

दिसम्बर 2011 से बहुत दरख्वास्त करने पर एक घंटे के लिए खोला जाने लगा. पता होना चाहिए कि जेल के रजिस्टर में हमें बाकी कैदियों की तरह मैनुवल के लिहाज से खुला ही दिखाया जाता है, जबकि हम यहां लगातार बंद रखे जाते हैं.

लगातार बंद रहने की वजह से यहां लोग बीमार रहने लगे हैं. जबकि कई तो डिप्रेशन के शिकार हो चुके हैं, याददाश्त प्रभावित हो चुकी है. और कईयों की आंखे कमजोर होने लगी हैं.

कई साल से ऊपर हो गए होंगे जेल मुआयना पर आने वाले मजिस्ट्रेट को हाई-सेक्योरिटी तशरीफ लाए हुए.  बड़े अफसरान और ऑथोरिटीज को हाई सेक्योरिटी नहीं लाया जाता कि हम शिकायत न कर दें. हमारी दरख्वास्तें ऑथोरिटीज को नहीं फॉरवर्ड की जाती कि कहीं हमें इंसानी हुकूक देने को न कह दिया जाय.

सुप्रीम कोर्ट की बकायदा हिदायत है कि किसी भी अण्टर ट्रायल को कैद कर तनहाई में न रखा जाय. सजायाफ्ता को भी सिर्फ तीन माह तनहाई में रखे जाने की गुंजाइश है. हमारे साथ गैरकानूनी, गैरइंसानी और आपराधिक बर्ताव क्यों रखा जाता है, जबकि हम साजिशन फंसाए गए बेकसूर नागरिक हैं.

साथियों ऐसे में अधिकारियों की तंग नजरी, बड़े ऑथोरिटीज तक पहुंच न हो पाने, मुक़दमों का जल्द फैसला न हो पाने और ज़रुरत की दवाओं के न मिल पाने की वजह ने बहुतों को बहुत मायूस कर दिया है. जिसकी वजह से कुंठा व बेचैनी से मजबूर होकर आत्महत्या के जायज़ होने या गुंजाइश होने का मसला अक्सर होने वाली बातचीत में मुझसे पूछा जाता है. साजिशों में फंसाए गए इन लोगों को कैसे समझाया जा सकता है. जबकि ये परेशान कैदी जब थोड़ी देर खुले में ताजा हवा या धूप खाने और बीमारियों के सही इलाज की दरख्वासत करते हैं कि सर ऐसे तो हम मर जाएंगे तो हंसी उड़ाते हुए कहा जाता है कि मर जाओ हमें क्या फर्क पड़ता है, सुसाइड कर लो. हम जवाब दे लेंगे और जहां चाहे शिकायत कर लो हमें फर्क नहीं पड़ता.

यहां के लोगों और खुद अपनी बेबसी देखकर,  प्रशासन का रवैया देखकर दिल हिल जाता है. रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि हम हिन्दोस्तान की जेल में हैं या अंग्रेजों की. हम किसी सेकूलर स्टेट में हैं या कम्यूनल स्टेट में. हम आपसे मदद के प्रार्थी हैं. हुकूमती सतह पर या बड़ी अदालतों और ऑथोरिटीज के ज़रिए इन्सानी हुकूक़ के खिलाफ़ हो रहे कार्यवाइयों पर लगाम लगाया जा सकता है.

मेहरबानी करके नफ़रत की इस भट्टी में सिसकती, बिलखती इंसानियत को बचाने के खातिर देश की मज़बूती व तरक्की के खातिर हम बेबसों की तरफ ध्यान दीजिए. क्योंकि इंसाफ़ से मुल्क व हुकूमत को मज़बूती मिला करती है.

द्वारा-
मोहम्मद तारिक कासमी
कैदी हाई सेक्योरिटी,
सी ब्लाक जिला जेल
लखनऊ, उत्तर प्रदेश

22 सितम्बर 2012

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