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BeyondHeadlines > India > बीमार है मानसिक अस्पताल…
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बीमार है मानसिक अस्पताल…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published January 7, 2013 18 Views
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19 Min Read
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Anita Gautam for BeyondHeadlines

कल दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल, जिसके अंतर्गत मनोरोग विभाग भी आता हैं, में एकाएक पहुंच गई. लंबी लाइन देख मुझे आश्चर्य हुआ कि मनोरोग विभाग में भी इतने मरीज़? पता करने पर मालूम हुआ कि यह लाइन ओपीडी मरीजों की है जिसमें लगभग पुरूषों की संख्या महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा थी. कुछेक माता-पिता अपने बच्चों को भी पकड़े खड़े थे. मुझे तो अधिकांश लोग आम इंसान की ही तरह लग रहे थे. फिर मैं सोचने लगी कि जब ये लोग ठीक हैं तो फिर यहां क्यों?

थोड़ा और आगे बढ़ कर देखा तो एक महिला जोर-जोर से हंस रही थी. और बीच-बीच में पंजाबी में गाली दे रही थी. उसको लाए उसके परिजन हाथ पकड़े खड़े थे. दूसरी ओर एक आदमी को उसकी पत्नी पकड़े खड़ी थी, वो भी जोर-जोर से चिल्ला रहा था…. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. फिर भी मैं आगे की ओर बढ़ी. मुझे पुरूष वार्ड के सामने दो आदमी ठीक-ठाक खड़े नज़र आए. मुझे लगा वो किसी मरीज़ के परिजन होंगे. मैंने जब उनसे बात करने की कोशिश की तो उनमें से एक बोला आप मुझ से बात करिए… मैंने उससे पूछा कि आप मरीज के साथ हैं? वो आराम से बोला मैं मरीज हूं और ये मेरे चाचा मेरे साथ हैं.

मैं आगे कुछ बोलती वो एकाएक बोल पड़ा, आप यहां क्या कर रही हैं? किसी डाक्टर को दिखाने आई हैं? मैंने कहा नहीं, ऐसे ही किसी से मिलने आई थी. जब मैंने उससे उसकी बीमारी के बारे में पूछा तो पहले उसके चाचा ने बताया कि इन्हें भूलने की बीमारी है या कहूं तो कभी-कभी पूरी यादाश्त ही चली ही जाती है. फिर कुछ समय बाद अपने आप ठीक हो जाता है.

उनकी बात को बीच में काटते हुए वो बोला मैडम हमारा नाम गोपाल है. आप जानना नहीं चाहेंगी कि हम ठीक-ठाक इंसान इस अस्पताल तक कैसे पहुंचे? उसकी वो बात मैं स्थिति और गोपाल की मानसिक पीड़ा को देखकर टाल नहीं सकी और मैंने भी जानने की इच्छा जताई.

उसने कहा हम मूलतः बनारस के हैं. कक्षा 10 में थे. पिताजी चाहते थे कि अच्छे नम्बर आएं और हम रात-दिन खुब पढ़ाई करते थे. पर उस रात न जाने बुआ को क्या हुआ बोली पढ़-पढ़ कर पागल हो रहा है. भैया इसे डाक्टर के पास ले चलो और पिताजी डाक्टर के पास ले गए. उस डाक्टर ने सोडियम पोटेशियम वालपोरेट नामक दवा दी. जिसके खाने से पहले तो मेरा सिर खुब दर्द किया फिर उल्टी आई और मैं बेहोश हो गया. बाद में रोज़ मुझे नींद की दवा देने लगे और आज मैं यहां आपके सामने अस्पताल में हूं. मेरे घर वाले हर बार मुझे अलग-अगल डाक्टर को दिखाते हैं. हर बार मेरी दवाईयां बदल दी जाती हैं.

मैंने गोपाल से उसकी मेडिकल हिस्ट्री के पर्चे दिखाने की बात कही तो वह थोड़ा गुस्साकर बोला ये मेरे घर वाले हर बार डाक्टर को भी टाल देते हैं. ये लोग मेरी हिस्ट्री किसी डाक्टर को नहीं दिखाते. क्योंकि उसकी बातों और पहनावे से वो मानसिक रोगी है किसी के लिए भी पहचानना मुश्किल था, सो मैंने उसे शांत करते हुए उसकी पढ़ाई के बारे में पूछी- उत्तर था 12वीं सीबीएसई से पी.सी.एम (फिजिक्स,कैमिस्ट्री और मैथस्), आईटीआई, निजामुद्दीन से कंप्यूटर में डिप्लोमा किया है.

मैं वाक़ई उसे देख कर हैरान थी. पर उसकी बातें और आंख में सच्चाई साफ-साफ नज़र आ रही थी और पास खड़े चाचा मुंह नीचे किये हुए थे. शायद उनका चुप रहना बहुत कुछ बयां कर रहा था. उसके तमाम प्रश्नों के उत्तर मेरे लिए दे पाना बहुत कठिन था. फिर भी मैं उसे इतना ही समझा सकी कि आपके घर वाले आपका बुरा नहीं सोचते. जब हम बीमार होते हैं तो दवा की ज़रूरत तो होती ही है और आप लगातार दवा लोगे तो जल्दी ठीक हो जाओगे.

बात करते करते वो मुझे महिला वार्ड तक भी ले गया. पर उससे बात करके दिमाग में बहुत उलझन थी कि क्यों उसके घर वालों ने ऐसा किया? आगे महिला वार्ड में 10 बेड थे. जिसमें सब अपने-अपने बिस्तर में बैठी थी. एक दो तो अकेले अपने आपसे बात कर रही थीं. और एक जोर-जोर से अपने बच्चे के लिए रो रही थी. उसके बाद मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं उस वार्ड में पैर रख सकूं.

फिर मैं एक ओपीडी कक्ष में गई. जहां मैंने देखा एक बड़े से हॉल में 5 डाक्टर राउंड टेबल पर मरीजों के साथ बैठे हैं. मरीजों के बीच मैं भी वहां खड़ी हो गई और मरीजों को देखने लगी. एक लड़की जिसके उसके पिताजी ले कर आए थे, बहुत गरीब लग रही थी. उसके पिता के अनुसार उसे हमेशा सिर दर्द होता है. उल्टी आती है. रात मे बहुत डर लगता है और वो कभी भी जोर-जोर से चिल्लाने लगती है. पिता का मानना था कि इस पर वही भूत है जो इसकी मां और बड़ी बहन पर है.

डाक्टर ने पूछा, तो फिर तुम इसे अस्पताल किसके कहने पर लाए? वो बोला तमाम ओझाओं को दिखाया. जादू-टोना-नज़र सब उतारा. एक-दो बाबाओं ने जो धागा पहनाने के लिए दिया वो भी पहनाया. फिर भी ठीक नहीं हुई. हमारी मालकिन ने बार-बार कहा की डाक्टर को दिखा दो, तो सोचा अब यहां भी दिखा लूं. पर जानता हूं कि जो भूत मेरी पत्नी और बड़ी बेटी को नहीं छोड़ा वो इसे कैसे छोड़ेगा….

खैर डाक्टर ने लड़की से साधारण बातें पूछी और बाद में उसके बाप को वहां से थोड़ा बाहर जाने के लिए कहा. उसके बाद डाक्टर ने पूछा तुम्हारे घर में कोई तुम्हें मारता-पिटता या गाली तो नहीं देता. वो थोड़ी सहमी हुई थी. उसने डरते-डरते मना किया. पुनः डाक्टर ने पूछा तुम्हारे पापा, चाचा या कोई पड़ोसी तुम्हें डराता तो नहीं है. वो धीरे से सिर हिलाई, बोली हां- पड़ोस वाला आदमी. मुझे उससे बहुत डर लगता है… उस समय तक डाक्टर और मेरे सामने काफी चीजें साफ हो गई थी कि ये साधारण बीमारी नहीं बल्कि डर है, जो कि इस तरह उस बच्ची के दिमाग में घर कर गई और अब मानसिक रूप से उसे परेशान कर रही है.

वहीं दूसरी ओर एक लड़के को उसकी बहन और भाभी हरियाणा से ले कर आए थे. उम्र करीब 20-22 साल होगी. उन लोगों का कहना था कि इसका पढ़ाई में बिल्कुल भी मन नहीं लगता. हमेशा शांत रहता है. पर जब गुस्सा आता है तो जो सामने आए उठा कर फेंकता है. अधिकांश समय इंटरनेट पर ही बिताता है. पिछली बार कुछ दौरा सा पड़ा था और 2-3 दिन अस्पताल में भर्ती भी रहा.

डाक्टर ने पूछा तुम्हारे कितने मित्र हैं? बोला कोई मेरा दोस्त नहीं है. मुझे किसी से दोस्ती नहीं करनी. मैं अकेला ही ठीक हूं. वो लड़का और उसके परिजन दिखने में ठीक-ठाक परिवार के लोग लग रहे थे. मैं फिर असमंजस्य में पड़ गई कि ये क्या मामला है. एकाएक उसने बहन और भाभी को बाहर जाने को कहा और उस मनोचिकित्सक महिला डाक्टर से कहा- मुझे सिर्फ लड़कियों में इंट्रस्ट है. मैं नहीं जानता ऐसा क्यों है, पर जब भी कहीं भी किसी लड़की को देखता हूं या कोई फिल्म देखता हूं तो मैं अपना आपा खो बैठता हूं. मैं कुछ गलत न कर दूं इसलिए कोई दोस्त नहीं बनाता और खासतौर से लड़की. आप बताओ कि मैं क्या करूं? फिर मेरे पास एक इंटरनेट ही तो एक ज़रिया है, पर घर वाले मेरी बात नहीं समझते…

वो बातें वहीं छोड़ते हुए मैंने बाहर जाते हुए एक डाक्टर का पीछा किया और उनसे यह सब जानने की कोशिश की आखिर यह सब बीमारी का कौन सा रूप है. ऐसे कितने मरीज़ डाक्टर तक पहुंच पाते हैं? डाक्टर का कहना था, कि अस्पताल में रोज़ 250 से 350 तक मरीज़ आते हैं. हम कोशिश करते हैं कि सबके साथ काउंसलिंग करें, पर स्टाफ नहीं है. हम 8-10 डाक्टर कैसे सब कुछ कर सकते हैं.

एक मरीज़ का मैंटल लेबल जानना और काउंसलिंग करना बहुत ज़रूरी है, और काउंसलिंग के दौरान कम से कम 40 से 50 मिनट की ज़रूरत होती है, पर सभी मरीजों को देखना होता है इसलिए हम एक को 8-10 मिनट में ही  निपटा देते हैं.

मेरे पूछने पर जो मरीज़ बात करने की स्थिति में नहीं होते या बहुत उग्र प्रवृति के होते हैं तब आप लोग क्या करते हैं? तो वो बोले, ऐसे मरीजों को हम तुरंत दिल्ली के शाहदरा मेंटल अस्पताल में रैफर कर देते हैं क्योंकि यहां केवल 10 बेड का वार्ड है. बहुत ज्यादा सुविधाएं नहीं हैं. न ही सुरक्षा के लिए इतने गार्ड हैं और न ही हमारे पास इतना नर्सिंग स्टाफ…

मैंने उनसे मेडिकल ईलाज के साथ और किसी थैरेपी की बात पूछी तो वह बोले कि, हां यहां इन मरीजों को दवा के साथ-साथ योगा, मेडिटेशन या आर्युर्वेद का उपचार देते हैं. कई बार मेडिटेशन से शुरूवाती दौर के मानसिक पीड़ित को राहत मिल भी जाती है, पर अक्सर ऐसा नहीं होता.

खासतौर से उन मरीजों को जिन्हें सिज़ोफेनिया होता है अर्थात एक प्रकार का पागलपन जिसमें व्यक्ति नकारात्मक विचार, कुंठित, लंबे समय से बेरोजगार, घरहीन, मनोभाव और व्यवहार से जुड़ी लंबे समय से चली आ रही समस्या से जुड़ा होता है. इस बीमारी से पीड़ित लोगों का जीवन काल बहुत लंबा नहीं होता और महिलाओं की अपेक्षा पुरूषों में अधिक होता है. लेकिन शुरूआती दौर में ही मरीज़ का उपचार करा लिया जाए तो दवाओं के माध्यम से ठीक होने की संभावना रहती है.

जब मैंने कारण जानने की कोशिश की तब एक बड़ी गंभीर बात सामने आई कि अधिकांश महिलाएं अपने पतियों को यहां ले कर आती हैं पर तब बहुत दिक्कत होती है जब किसी पीड़ित महिला को उसके परिवार वाले लाएं खासतौर से 30 से 45 के बीच वाली. उनके परिवार वाले क्या सोचते हैं, मुझे नहीं पता पर फिर भी वो लोग कई केसेज़ में बहुत देर कर देते हैं.

जब मैंने पुरूषों में होने वाले मानसिक रोगों की बात की और क्या पुरूषों में सैक्स को लेकर भी कोई फोबिया होता है, जानने की कोशिश की तो उनकी बात सुन हैरान रह गई. पता चला अधिकांश पुरूष ऐसे होते हैं, जिन्हें सैक्स का भूत सवार होता है. ये वो भूत नहीं जो किसी झाड़-फूंक से या ओछइती से ठीक हो जाए, ये वो भूत होता है जो कि 9 माह की गर्भवती पत्नि तक को नहीं बख्शता. पर ऐसी महिलांए जिनके पति इस मानसिक रोग से पीड़ित हैं, वो 100 में से एक दो ही सामने आती हैं. अल्बत्ता अधिकांश महिलाएं हमारे पास पति की समस्या बताते हुए पर्चे पर दवा लिख दिजीए, ऐसा बोलती हैं पर मरीज का मेंटल लेबल जाने बिना हमारे लिए यह नामुमकिन होता है. उनका मानना था कि अभी समाज में महिलाओं को खुल कर सामने आना चाहिए.

फिर मुझे एक और लाइन दिखी, जो शायद उस अस्पताल का दवा कक्ष था. लोग लाइन में लगे अपना पर्चा दिखा के दवा ले रहे थे. पर मुझे समझ नहीं आया कि एक तरफ डाक्टर बोल रहे थे कि हम ज्यादा दवा नहीं लिखते. सप्ताह में दो बार या पंद्रह दिन में 3-4 बार काउंसलिंग के लिए मरीज़ को बुलाते हैं, तो फिर ये लोग इतनी सारी दवाएं क्यों ले रहे हैं?

मैंने दवा देने वाली सिस्टर से बात भी की उनका कहना था कि सरकारी अस्पताल में जो दवा मिलती है, निहायती घटिया क्वालिटी की होती है. हम तो मरीजों को खुद बोलते हैं कि अगर आप बाहर से दवा ले सको तो ज़रूर लो क्योंकि यहां की दवाओं के साल्ट बहुत ही घटिया और लो क्वालिटी के होते हैं. जो बाहर की दवा खाकर आप 15 दिन में फर्क महसूस करोगे वहीं यहां की सरकारी दवा 1 महीने तक खाओगे तब शायद ही कुछ असर होगा. हम क्या करें, अमीर लोग तो यहां आते नहीं गरीबों को कुछ पता नहीं होता, क्योंकि वो अनपढ़ हैं. जो बीच के लोग होते हैं, वो थोड़ा बहुत समझते हैं. बाकि हम क्या करें, ऐसे भी लोग हैं जो दवा खरीद नहीं सकते उनको ज्यादा डोज देना ही एकमात्र उपाय है.

मैं 3 घंटे उस अस्पताल के प्रांगण में इधर-उधर देखती रही, और वहां के माहौल को समझने की कोशिश करने लगी. मेरे मन में बार-बार प्रश्न आ रहा था कि सरकार एड्स, टी.बी या पोलियों के मामले में तो डब्ल्यूएचओ का पालन करती है. ऐसे रोगों के रोकथाम के उपायों के बारे में भी बात करती है. एचआईवी के नाम करोड़ों रूपये भी खर्च करती है. फिर क्यों वो मानसिक रोगियों के लिए कुछ नहीं करती? यहां मानसिक रोगी सिर्फ वो नहीं है, जो किसी को मारपीट रहा है, गाली दे रहा या अपने कपड़े फाड़ कर बिना शर्म खुले बदन घुम रहा है. मानसिक रोगी में वो लोग भी शामिल हैं, जो अपने अड़ोस-पड़ोस में हो रही किसी गलत घटना का शिकार हो चुके हैं. वो बच्चें हैं जो उनकी आयु के बच्चों की तुलना में पढ़ाई से लेकर खेलने खाने तक में बहुत पीछे हैं.

वो औरतें, जो शायद घरेलू हिंसा का शिकार हुई हैं. या जिन्हें समाज और परिवार ने बहुत नीचे की ओर धकेल दिया है. और वो आदमी भी हैं जो दिन में 5-6 बार सैक्स को भोजन की तरह खाना भी चाहते हैं. इसके लिए चाहे महिला की जान तक क्यों न चली जाए. और फिर यही लोग अपनी भूख शांत करने की स्थिति में बाहर घूमते हैं, पर हम आम इंसान को लगता है ये भूखा भेडि़या है, पर उसके पीछे शायद ही कोई उसकी मानसिक विकृति के पहचानने या वो मानसिक रोगी है इसबात का पता लगा सकता है.

हो सकता है अपराध करने वाला कोई मानसिक रोगी ही हो क्योंकि जब इंसान अपना आपा खो बैठता है तभी कोई अपराध करता है, और अपना आपा खोने के बाद इंसान का दिमाग पर वश नहीं होता. अनेक बार इस तरह के खुलासे भी हुए हैं कि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति पहले डिप्रेशन का शिकार था, इसलिए उसने आत्म हत्या की. विपरित इसके कुछेक लोग आत्महत्या करने में विफल हो जाते हैं. किन्तु बाद में मनोचिकित्सक की कांउसलिंग के माध्यम से वह बेहतर जीवन भी जीते हैं.

इन सब बातों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार को मानसिक रोगियों के लिए भी विशेष ध्यान देना चाहिए. सरकार को चाहिए कि जिस प्रकार हैजा और पोलियो से हमने मुक्ति पा ली है, वैसे ही अगर समाज को ठीक करना है तो शुरूआत मानसिक रोगी से ही करनी पड़ेगी, क्योंकि वो मानसिक रोगी भी हमारे ही देश का भविष्य हैं.

अगर मानसिक रोगी का उपचार समय से और डाक्टर की निगरानी में हो जाए तो काफी हद तक अपराधों पर भी काबू पाया जा सकता है. किन्तु सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की कमी और घटिया सरकारी दवाईयां हमेशा से ही संदेह के घेरे में रही हैं. न जाने यह सरकार कब ठोस क़दम उठाएगी? आमिर खान की लाख कोशिशों के बाद भी आज तक तारे जमीं पर ही हैं, किन्तु तारों की सही जगह तो आसमान में चकमना है, शायद यह बीमार स्वाथ्य विभाग समझे.

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार व ‘स्वस्थ भारत विकसित भारत’ अभियान चला रही प्रतिभा जननी सेवा संस्थान से जुड़ी हुई हैं) 

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