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Reading: गांधीजी की ज़मीन पर कब्जा, यादों पर चढ़ गई धूल
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BeyondHeadlines > Exclusive > गांधीजी की ज़मीन पर कब्जा, यादों पर चढ़ गई धूल
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गांधीजी की ज़मीन पर कब्जा, यादों पर चढ़ गई धूल

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published February 1, 2013 11 Views
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8 Min Read
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Afroz Alam Sahil for BeyondHeadlines

गांधी जी के शहादत दिवस पर हमने उन्हें अपना श्रद्धासुमन अर्पित कर दिए हैं. हम हर साल यही करते हैं. गांधी 30 जनवरी को शहीद हुए थे लेकिन उनके सिद्धांत और आदर्श रोज शहीद हो रहे हैं. सिर्फ सिंद्धांत और आदर्श ही क्या, उनकी यादें और उनसे जुड़े धरोहरों के अस्तित्व को भी भ्रष्टाचार लीलता जा रहा है.

मैं गांधी को खोजने के लिए वृंदावन आश्रम जाता हूं, जहां गांधी नेताओं के वादों में तो दिख जाते हैं लेकिन वास्तविकता में नहीं. यह नेता जो गांधीवादी होने का दंभ तो भरते हैं, लेकिन गांधी से जुड़ी स्मृतियों व धरोहरों को सहेजने व बचाने के लिए अपने स्तर से कोई प्रयास नहीं करते. मैंने गांधी जी के वृंदावन आश्रम में जो देखा और सुना वह किसी भी गांधीवादी की आत्मा कचोटने के लिए काफी है.

यह वही आश्रम है जहां बापू सर्वप्रथम स्व. पंडित प्रजापति मिश्र व गुलाब खां के द्वारा निमंत्रित गांधी सेवा संघ के पंचम अधिवेशन के अवसर पर 02 मई, 1939 को पधारे थे और इसी बृंदावन में बनी पर्णकुटी में 09 मई, 1939 तक रहकर अधिवेशन का कार्य सम्पादन किया था और अपनी अमर-वाणी से जनता में प्रेरणा भरी थी. इसी अधिवेशन के दौरान बापू ने स्वावलंबन आधारित शिक्षा का सपना देखा था और 4 मई 1939 को बुनियादी शिक्षा की नींव डाली. और इसी वृंदावन आश्रम से उद्योग विकास और रोजगारपरक शिक्षा के लिए 29 बुनियादी विद्यालयों की शुरुआत की थी, लेकिन आज यहां उनके यादें ही शेष रह गयी हैं.

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आपको यहां आज सिर्फ गांधी की यादें ही मिलेंगी, लोभी लोगों ने आश्रम की ज़मीन तक को बेच दिया है. गांधी जी ने कभी जहां सूत काता, आज वो घर खंडहर में तब्दील हो चुका है, चर्खे या तो खराब पड़े हैं या गायब हो गए हैं. सनद रहे कि वृंदावन आश्रम में सूती, पाली, रेशमी एवं ऊनी वस्त्र उत्पादन सह बिक्री केंद्र पिछले 15 वर्षो से बंद है.

मथुरा भगत जो गांधी के समय इस आश्रम में माली का काम किया करते थे, एक-डेढ़ बरस पूर्व इलाज के अभाव में दम तोड़ चुके हैं. अब इनका पोता सतीश कुमार गांधी की यादों की रखवाली कर रहा है. हर रोज़ गांधी के प्रतिमा पर फूल की माला पहनाना इसका अहम काम था, पर विधायक वैधनाथ कुशवाहा ने इसका यह काम भी बहुत आसान कर दिया. सुबह चढ़ाए फूल शाम को सूख जाते हैं इसलिए विधायक जी ने एक बार ही प्लास्टिक की माला चढ़ा दी है. गांधी का यह आश्रम अब अंधेरे में ही रहता है, क्योंकि सतीश के लगाए बल्बों को भी लोगों ने गायब कर दिया है, सतीश कहता है कि अब वह बल्ब पर और खर्च नहीं कर सकता.

किसी जमाने में बृंदावन गांधी-कस्तूरबा ट्रस्ट के पास ग्राम सेवा केन्द्र, गांधी आश्रम के लिए 103 बीघा ज़मीन थी, इस 103 बीघे ज़मीन में जवाहर नवोदय विद्यालय, राष्ट्रीय बुनियादी विद्यालय बृन्दावन बालक, बृन्दावन कन्या, प्रजापति कन्या उच्च विद्यालय, खादी ग्रामोद्योग संघ, अनुसूचित जाति छात्रावास, डाकघर, स्वास्थ्य केन्द्र, शिव मंदिर आदि में ज़मीन आवंटित की गई. आवंटन के बाद 20 बीघा 06 कट्टा 06 धुर ज़मीन ट्रस्ट के पास शेष बची रह गई. इनसे होने वाली कमाई को साबरमती भेजा जाता था, जहां इस रकम से छात्रों को छात्रवृति दी जाती थी. लेकिन बिहार राज्य पंचायत परिषद के उपाध्यक्ष, भूतपूर्व मुखिया व चनपटिया के प्रखंड प्रमुख जगदीश नारायण पाण्डेय और जेपी आंदोलनकारी व समाजसेवी ठाकूर प्रसाद त्यागी बताते हैं कि 1980 में उस समय के ज़िला अधिकारी एस.एन.दूबे ने इस ट्रस्ट को भंग कर दिया. और इस सम्पत्ति के अधिकारी स्वयं बन गए और कस्टोडिन के रूप में चनपटिया के अंचलाधिकारी बी.डी. तिवारी को नियुक्त किया गया. अंचलाधिकारी ने 30 नवम्बर, 1986 को आश्रम का विधिवत प्रभार ले लिया.

वो बताते हैं कि यहां के अंचलाधिकारी जब  पद से रिटायर्ड हुआ तो सारे कागज़ात अपने साथ ही लेकर चला गया. तब से न तो कोई ट्रस्ट है और न ही कोई प्रभारी. और धीरे-धीरे आश्रम की सारी ज़मीने बिक गई. वो आरोप लगाते हैं कि जाते-जाते प्रभारी ने पवन कुमार मिश्र के पुत्र विजय कुमार मिश्र के नाम पर फर्जी रसीदें काट दिया और विजय ने  सारी ज़मीन बेच दिया. इस  मामले में 1993-94 में मर्डर भी हुआ. यहां तक कि अब मुख्य आश्रम तक को बेचने की तैयारी चल रही है.

आगे वो बताते हैं कि महाचंद्र प्रसाद सिंह ने पिछले साल ग्रामोद्योग का पुनः निर्माण करवाया था, लेकिन वर्तमान में वैधनाथ राउत ने ताला लगा दिया है, उसका कहना है कि एस.एन. दूबे ने कुछ काम करवाया था, जब तक काम के पैसे नहीं मिल जाते हैं, वो ताला नहीं खोलेगा. हालांकि इस पूरे मामले को लेकर पांच वर्ष पूर्व एक जांच समिति भी गठित की गई. प्रखंड विकास पदाधिकारी द्वारा पाया गया कि 35 एकड़ पर फर्जी कब्जा है और कई ज़मीने बेच दी गई हैं. लोगों के पास जो रसीद है वो फर्जी है और सरकार के पास भी कोई रिकार्ड नहीं है. कोई अभिलेख अंचल या ज़िला में नहीं है. हालांकि इस जांच समिति ने इस अतिक्रमण मुक्त कराने के आदेश भी दिए, लेकिन ज़िला प्रशासन इसमें अब तक कामयाब नहीं हो सकी है.

गांधी की जमीन को डकारने वाला पूर्व जिलाधिकारी आजकल किसी और घोटाले के आरोप में झारखंड की किसी जेल में बंद है. लेकिन गांधी की संपत्तियों पर कब्जा करने का वृंदावन आश्रम का मामला कोई अकेला नहीं होगा, जरा अपने आसपास देखिए, गांधी आश्रम या गांधी ग्रामोद्योग की स्थिति देखिए और बताइये कि गांधी को किसने शहीद किया?

सरकार हर साल गांधीजी की जयंती और शहादत दिवस पर जितना विज्ञापन खर्च करती है उतना पैसा गांधी आश्रमों पर खर्च करके उनकी यादों और सिद्धांतों को पुनर्जीवित किया जा सकता है,  लेकिन सरकार ऐसा नहीं करेगी. क्योंकि सरकार जानती है कि गांधी ने अपने सिद्धांतों के बल पर अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था, गांधी से ज्यादा बड़े उनके सिद्धांत थे और अगर उन सिद्धांतों पर लोगों ने फिर से चलना शुरू कर दिया, तो ये भ्रष्ट नेता कहां जाएंगे?

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