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BeyondHeadlines > India > आपके गांव में इससे पहले कभी कुछ ऐसा हुआ था..?
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आपके गांव में इससे पहले कभी कुछ ऐसा हुआ था..?

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published September 15, 2013 8 Views
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17 Min Read
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Rahisuddin ’Rihan’ for BeyondHeadlines

उत्तर-प्रदेश के ज़िला मुजफ्फरनगर से करीब 120 किलोमीटर दूर… हम प्रदेश के ही विधानसभा क्षेत्र लोनी के राशिद अली गेट इलाके में है. इलाके के एक मदरसे में 700 से ज्यादा लोग अपना घर-गांव सबकुछ छोड़कर शरणार्थी के तौर पर यहां रहने को मजबूर हैं. अपनी और अपनों की किसी तरह जान बचाकर यहां पहुंचे लोगों में बच्चे, दूध-मुंहे बच्चे, बूढ़े, नौजवान, महिलाएं सभी शामिल हैं. लेकिन इनके परिवार के कुछ सदस्य अपने ही गांव में दंगाईयों के हाथों मारे गए तो कुछ रास्ते में बिछड़ गए. बिछड़ने वालों का अभी तक इनसे कोई संपर्क नहीं हो पाया है.

Muzaffarnagar riots witnessedमोहल्ला राशिद अली गेट स्थित ‘जन्नत-उल-इस्लाम’ मदरसे में आने-जाने के लिए मुख्य दरवाजे में दो गेट हैं. एक बड़ा और एक छोटा. मदरसे में आने-जाने के लिए आमतौर पर छोटे गेट का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि बड़ा गेट ईद-बकरीद या मोहल्ले में किसी की शादी के मौके पर ही खोला जाता है, बाकी समय यह बंद रहता है. लेकिन जब हम मदरसे के गेट पर पहुंचे तो बड़ा गेट खुला था.

गेट में दाख़िल हुए तो सिर पर कपड़ों की गठरी लिए कुछ महिलाएं बाहर आ रही थी. उनमें से एक को रोककर हमनें पूछा..’आप लोग कहां जा रहे हैं..?’ तो उधर से जबाव आया..‘हमारे स्थानीय रिश्तेदार हमें ले जाने आएं है, इसलिए हम उनके साथ जा रहे है.’

हम मदरसे में आगे बढ़ते हैं. बायी तरफ नीचे फर्श पर छोटे-छोटे समूहों में बैठे लोग अपने-अपने परिचितों से बातचीत करते नज़र आते हैं. सभी के चेहरों पर मायूसी छाई हुई है. उनमें से कुछ लोग हमें आशा भरी नज़रों से, तो कुछ लोग शक़ की निगाहों से देखने लगते हैं. हम उनके पास जाकर अपना परिचय देते हैं तो उनके दिल का दर्द जुबां पर उमड़ आता है. एक सांस में अनगिनत किस्से सुना दिये जाते है. शरणार्थियों के चेहरों पर दंगे की तस्वीरें साफ दिखने लगती है.

अफवाहों ने लगाई गांव में आग

जिला गाजियाबाद के कस्बा बुढ़ाना से 10 किलोमीटर दूर गांव टयावा निवासी 80 वर्षीय बुजुर्ग महिला हलीमन, मदरसे में हमारे आने की ख़बर पाकर एक युवक का सहारा लेते हुए हमारे पास आकर बैठ जाती हैं.

हमारे कुछ पूछने से पहले ही अपने गांव के बारे में खुद-बखुद हमें बताने लगती हैं.  ‘हमारे गांव में सबकुछ ठीक-ठाक था. शांति का माहौल था. तभी कहीं से सुनने को मिला… दूसरे समुदाय के लोगों ने अपनी गाय को खुद ही गायब कर दिया है और इल्ज़ाम हम लोगों पर लगा रहे हैं… हमारा परिवार कुछ समझा भी नहीं था कि पूरे गांव में गाय को गायब करने की अफवाह तेज़ हो गई… दंगाई हमारे समुदाय के लोगों पर ज़ुल्म ढाने लगे… हमारे समुदाय के लोग जान बचाने के लिए गांव से भागने लगे…’

आप यहां मदरसे में कैसे पहुंची..?  सवाल पर बुजुर्ग महिला पास बैठे अपनी महिला पड़ोसियों की तरफ हाथ करते हुए बताती हैं  ’जब सब सुरक्षित ठिकानों पर जाने के लिए गांव छोड़ रहे थे, तब मैं इनके साथ आ गई’

बुजुर्ग हलीमन के परिवार में बेटे और बहुएं सभी हैं, लेकिन आपस में सभी बिछड़े हुए हैं. बुजुर्ग हमसे अपने परिवार को जल्दी मिलवाने की गुहार लगाती हैं.

फर्जी विडियो सीडी ने डाला आग में घी

ज़िला मुजफ्फरनगर से लगभग 16-17 किलोमीटर दूर थाना भौरा कलां अंतर्गत गांव बढ़ा बोरा निवासी गुलबहार (32) फर्जी विडियो सीडी के बारे में हमें बताते है कि ‘मुजफ्फरनगर में दंगे के बाद से ही हमारे आसपास के गांवों में दंगे के विडियों की चर्चा होने लगी. जब फर्जी विडियों हमारे गांव में आया तो विडियों को देखकर दंगाई लोग एक तरफ हो गई और बाकी के लोग एक तरफ… गांव का माहौल खराब होने लगा.’

गुलबहार और दंगाईयों के बीच हुई कहासुनी के बारे में गुलबहार हमें आगे बताते हैं ‘दंगाईयों ने मुझे रास्ते में रोककर फर्जी विडियों दिखाई और कहा… तुम्हारें मुस्लिम भाईयों ने ये सब किया है.’

आपको विडियो देखकर असली लगा या नकली..? हमारे इस सवाल पर गुलबहार से हमें सिर्फ इतना ही जबाव मिला. ‘हमारे गांव में उन लोगों के सामने हम लोग ऊंची आवाज़ में बात नहीं कर सकते, तो उनके सामने विडियो के बारे में मैं क्या कहता?’

अपनी बात को पूरा करते हुए गुलबहार कहते है  ’दंगाईयों के बीच गांव में फंसे आखिरी परिवार, गांव के ही तीन हिंदू बुजुर्गों की मदद से जान बचाकर भागने में सफल रहे.’ इन परिवारों में एक परिवार गुलबहार का भी था. गुलबहार बताते हैं उनके गांव में दंगे में किसी की जान तो नहीं गई लेकिन आर्थिक नुक़सान काफी हुआ है. उनके घरों में लूटपाट करके आग लगा दी गई.

अल्पसंख्यकों को बनाया निशाना

ज़िला मुज़फ्फरनगर के गांव महम्मदपुर निवासी खातून (40) अपने गांव में हुए दंगे को याद करते हुए गंभीर हो जाती है. वो दबी आवाज़ में हमें बताती हैं ‘हम लोग 6 सितंबर को गांव से जान बचाकर भागे… घर छोड़ने से एक दिन पहले दंगाईयों ने उनके घेर (भैंसों को बांधनें वाली जगह) को गिरा दिया… हमने अपनी ईटें बटोरी (उठाई) और हम शांत रहे… फिर कहीं से पता लगा कि दंगाईयों का रात को हम लोगों पर मिट्टी का तेल छिड़कर आग लगाने का प्लान है… तो हम लोगों ने रात होने से पहले ही गांव छोड़ दिया और पास के गांव कुरवाली आ गए… वहां पहुंचकर हमें पता लगा कि हमारे घरों से सारा सामान लूटकर घरों में आग लगा दी गई है.’

हमने खातून से उनके गांव की आबादी की संख्या के बारे में पूछा तो खातून गांव की आबादी के बारे में तो कुछ बता न सकीं, लेकिन अपने समुदाय के लोगों के बारे में बताया कि उनके गांव में उनके समुदाय के मुश्किल से 20-22 घर ही थे.

आपके परिवार में कौन-कौन थे..?  अब कहां हैं वो सब..?, हमारे सवालों का जबाव देते हुए खातून के चेहरे पर परिवार की चिंता साफ झलकने लगती है. खातून बताती हैं ‘परिवार में हम 4 लोग हैं… 2 मेरे लड़के हैं और 2 हम मियां-बीबी… वो तीनों मुझसे रास्ते में बिछड़ गए… उनसे अभी तक कोई भी संपर्क नहीं हो पाया है’

जिन पर था बचपन से विश्वास, उन्होंनें ही किया विश्वासघात

ज़िला शामली के अंतर्गत थाना फुगाना क्षेत्र के गांव लाख निवासी इकबाल (64) 8 तारीख को कोसते हुए नहीं थकते. अपने तीन भाई और करीब 30 सदस्यों के साथ बचपन से ही गांव लाख में रहते आए इक़बाल अपनी भारी आवाज़ में हमें बताते है ‘मुजफ्फरनगर में झगड़े के बाद से ही गांव में तनाव का माहौल था… जब 8 सितंबर को हमें अपनी जान का ख़तरा हुआ तो हम सभी लोग सुबह लगभग 7 बजे अपना-अपना घर छोड़ने लगें… इसी बीच गांव के एक विशेष समुदाय के लोग हमारे पास आएं और कहने लगे कि हमें उनपर विश्वास रखना चाहिए. हमारे होते हुए तुम्हें कुछ नहीं होगा. बचपन से साथ रहते आए थे, इसलिए हमें उन लोगों पर भरोसा तो था, लेकिन गांव का माहौल कुछ और ही कह रहा था… इसलिए हम सभी तो गांव से निकल आएं लेकिन मेरे पिताजी, छोटा भाई और बड़ी भाभी को विश्वास में लेकर उन लोगों ने गांव में ही रोक लिया और बाद में पिताजी की नाड़ (गर्दन) काट दी… भाभी को गोली मारने के बाद सिर में गंडासा (पशुओं के लिए चारा काटने का औजार) मार दिया और भाई को सरियों से पीट-पीटकर खत्म कर दिया.’

मदरसे के एक कोने में बैठे इक़बाल का बोलते-बोलते गला भर आता है. थोड़ा पानी पीने और चंद सेकेंड आराम के बाद वो फिर से हमसें बात करता है. ‘घर में 4 लड़कियां जवान है… अगले महीने बकरीद के पांच दिन बाद, बारात आनी थी… लड़कियों की शादी के लिए हमने दहेज का सारा सामान फर्नीचर, सोने-चांदी के गहने सबकुछ इकट्ठा कर रखा था. लेकिन जिन पर हमें विश्वास था, उन्होंनें ही हमारे साथ विश्वासघात किया.’

इक़बाल के छोटे भाई की 35 वर्षीय विधवा गोद में लेटे अपने 10 दिन के नवजात शिशु को चुप कराते हुए हमें अपनी आपबीती सुनाती है. ‘8 तारीख की सुबह हम सभी अपनी-अपनी जान बचाकर शामली पहुंचे. वहां करीब 10 बजे मैंने अपने पति से फोन पर बात की. पति ने बताया कि जिन लोगों ने उन्हें गांव में रोका था, उन्होंनें हमारे घरों में लूटपाट करने के बाद आग लगा दी है, और अब हमें गांव से निकलने नहीं दे रहे हैं…’ इतना कहने के बाद वो अपने नवजात शिशु को देखकर फफक-फफक कर रोने लगती है.

मदरसे में एक और शरणार्थी नसीमा (37) निवासी गांव सिल्वर नगर धनौरा की आपबीती भी विश्वासघात की ही है. नसीमा और उनका परिवार तो गांव के दंगाईयों से जान बचाने में सफल रहा, लेकिन कई परिवार ऐसे भी थे, जिन्होंनें विश्वास करने की कीमत अपनी जान देकर चुकाई.

उस दिन को याद करते हुए नसीमा हमें बताती है ‘6 तारीख से गांव में गंडासे, तलवार, बुगदा आदि हथियार बनाए जा रहे थे. एक विशेष समुदाय के लोगों की शह पर बैरागी, जाटव और वाल्मिकी जाति के लोग हथियार बनाने में व्यस्त थे. विशेष समुदाय के लोग एक तरफ हमें कुछ न होने देने का विश्वास दिला रहे थे, तो दूसरी तरफ उनकी शह पर हथियार तैयार किये जा रहे थे. 8 तारीख को हमारे मोहल्ले के घरों पर जब चढ़ाई की गई तो हमने पुलिस को फोन किया, लेकिन दो-ढाई घंटे इंतजार करने के बाद भी पुलिस नहीं आई. इस दौरान दंगाई हाथों में हथियार लेकर गलियों में घूमने लगे. हमारे दरवाजों में धक्के मारने लगे. बच्चे हमारे चीखने-चिल्लाने लगे. उसके बाद हमने शोर मचा दिया.’ इतना कहते हुए नसीमा की आंखों में पानी आ जाता है.

नसीमा आगे बताती है ‘जैसे-तैसे हम तो गांव से भागने में कामयाब रहे, लेकिन विश्वास में आकर कई परिवारों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.’

उसके परिवार के और लोग कहां पर है..? पूछने पर नसीमा बताती है ‘गांव से जब भागे थे तो सभी साथ ही थे, लेकिन रास्ते में सभी बिछड़ गए. अब पता नहीं कौन… कहां… किस हालात में हैं…’

सियासत की मिलीभगत और पुलिस की लापरवाही की देन है दंगे

इक़बाल से जब हमनें पूछा कि.. वो दंगों के लिए किसे कसूरवार मानते हैं..?  तो इक़बाल पुलिस पर उखड़ते हुए अपनी आवाज़ में जोश भर लेते हैं. इक़बाल रुंधे गले से धीमी आवाज़ में हमें बताते हैं ‘गांव में दंगाई आतंक मचा रहे थे. मेरे भाई ने पुलिस को फोन किया, लेकिन पुलिस नहीं आई… और उन्होंनें (दंगाईयों ने) मेरे भाई को मार डाला… उन्होंने (दंगाईयों ने) नहीं… पुलिस ने मारा है मेरे भाई को’ पुलिस की लापरवाही पर सवाल उठाते हुए इक़बाल थोड़ी देर के लिए ख़ामोश हो जाते हैं.

थोड़ी देर बाद हमारे दूसरे सवाल… आपके गांव में, इससे पहले कभी कुछ ऐसा हुआ था..? जबाव देने से पहले इक़बाल कुछ पल के लिए अपनी दिमाग़ पर जोर देते है और फिर अखिलेश सरकार की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कहते हैं  ‘कभी कुछ नहीं हुआ सर… बचपन से रह रहे है गांव में… मायावती की पार्टी में तो झगड़ा कभी नहीं हुआ सर… सरकार ने दंगो को लेकर कोई सख़्त क़दम नहीं उठाए… सरकार ने प्रशासन को शांत रखा… सरकार की मिलीभगत से हुए हैं दंगे’

सर जी! सड़क पर सोयेंगे पर वापस घर नहीं जायेंगे

दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और पुणे में फेरी लगाकर कपड़ा बेचने वाले गुलबहार हमसे बात करते हुए, अचानक तेज़ आवाज़ में बोल पड़ते हैं ‘सर जी.. सड़क पर सोयेंगें पर वापिस घर नहीं जायेंगें’ जब हमने इस बारे में पूछा तो गुलबहार हमें बताते हैं ‘हमारे गांव में एक विशेष समुदाय के लोगों को दबदबा है. वो हमारे समुदाय के लोगों के साथ कभी भी मारपीट कर देते है. हम गांव में नए कपड़े नहीं पहन सकते… अच्छा खाना खा नहीं सकतें… अच्छा पी नहीं सकतें… उन लोगों से ऊंची आवाज़ में बात नहीं कर सकतें… न ही उन्हें कोई जबाव दे सकतें… अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा नहीं सकतें’ इतने कहते हुए गुलबहार की आंखें भर आती हैं.

गुलबहाल आगे जोड़ते हैं  ’अगर हम लोगों में से कोई उनकों जबाव देता भी हैं तो उसकी बहन-बेटियों के साथ बदसलूकी की जाती है… हम लोग तो खाने-कमाने बाहर चले जाते हैं… हमारे जाने के बाद घर में बहन-बेटियां ही रहती हैं…’ गुलबहार हमसे बातचीत के दौरान गांव में अप्रत्यक्ष गुलामी की तरफ इशारा करते हैं.

लोनी इलाके के लोग कर रहे है हर संभव मदद

दंगा प्रभावित लोगों से बात करने के बाद जब हम आगे बढ़े तो हमारी नज़र मदरसे में लगे कपड़ों के स्टॉल पर गई. शरणार्थियों के लिए इलाके के लोगों की सहायता से खाने और कपड़ों का इंतजाम किया जा रहा है. इलाके के लोग अपने घरों से कपड़े और राशन मदरसे में पहुंचा रहे हैं. लेकिन 10 हजार गज़ में बने मदरसे में शरणार्थियों की संख्या बढ़ती जा रही हैं. जिससे इलाके के लोगों की मदद नाकाफी साबित हो रही हैं.

मदरसे के कारी शौकीन बताते है  ‘मदरसे में शरणार्थियों की मदद करते हुए हमें 3 दिन हो गए है. क्षेत्र के लोग दंगा प्रभावितों की हर संभव मदद कर रहे हैं. लेकिन अब संख्या 700 से ज्यादा होने के कारण, इलाके के लोगों की मदद नाकाफी साबित हो रही है. शुरुआत में ये संख्या 500 के आसपास थी.’

कारी शौकीन आगे कहते है ‘सरकार या प्रशासन की तरफ से शरणार्थियों को अभी किसी भी प्रकार की कोई सहायता नहीं मिली हैं. हम चाहते है कि सरकार वोट बैंक की राजनीति को बंद करें और शरणर्थियों को तत्काल मदद देने के साथ ही उनके पुर्नवास के इंतजाम जल्द करें.’

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