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Reading: नर्मदा बांध विवाद : यहां पढ़िए इसकी पूरी कहानी
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नर्मदा बांध विवाद : यहां पढ़िए इसकी पूरी कहानी

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published June 15, 2014 58 Views
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13 Min Read
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Amit Bhaskar for BeyondHeadlines

नर्मदा भारत की पांचवीं सबसे बड़ी नदी है. जिसकी कुल लम्बाई 1315 किलोमीटर है. इस नदी का 87% हिस्सा मध्य्प्रदेश से होकर बहता है. इसके अलावा गुजरात और महाराष्ट्र भी इस नदी का लाभ उठाते हैं.

गौरतलब है कि भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री ने बांधों को “आधुनिक भारत का मंदिर क़रार दिया था” क्योंकि उन्हें लगता था कि बड़े-बड़े बांध विकास के परिचायक हैं, पर बहुत जल्द उन्हें जब हकीकत का एहसास हुआ, तब उन्होंने ही बांधों को “महाकयता की बीमारी” यानी ” A Diesese Of Gigantism” बताया और कहा कि भारत को बड़े बांधों के निर्माण से बचना चाहिए.

जानिए! नर्मदा वैली प्रोजेक्ट (NVP) के बारे में:

1946 में भारत के सेंट्रल वाटरवेज़, सिंचाई विभाग ने एक कमिटी बनाई. इस तरह के प्रोजेक्ट के बारे मे स्टडी करने के लिए और ये जानने के लिए की ऐसे प्रोजेक्ट भारत में कितने कारगर साबित होंगे.15 साल बाद प्रधानमन्त्री नेहरु ने नर्मदा वैली प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी.

दरअसल ये भारत सरकार की महत्वकांक्षी योजना है, जिसके तहत भारत में 3000 लघु,136 मध्यम और 30 बड़े स्तर के बांध बनाने का प्लान है. इन योजनाओं के लिए भारत सरकार ने वर्ल्ड बैंक से भी सहायता ली है. इन योजनाओं के तहत बांध बनाने का काम मुख्यतः मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में पहले होना है.

गुजरात में इस प्रोजेक्ट को सरदार सरोवर प्रोजेक्ट (SSP) के नाम से जाना गया. वहीं मध्यप्रदेश में इसे नर्मदा सागर प्रोजेक्ट (NSP) के नाम से जाना गया. गुजरात सरकार का दावा है कि इन प्रोजेक्ट्स से गुजरात में करीब 2 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन की सिंचाई की जा सकेगी. वहीं मध्यप्रदेश सरकार का दावा है कि इस प्रोजेक्ट से मध्यप्रदेश में करीब 15 लाख हेक्टेयर ज़मीन की सिंचाई संभव हो पाएगी.

इसके अलावा गुजरात में करीब 1500 मेगावाट और मध्यप्रदेश में करीब 1000 मेगावाट बिजली का उत्पादन भी किया जा सकेगा. भारत सरकार ने दावा किया कि इन सभी प्रोजेक्ट के पुरे हो जाने पर देश के करीब 4 करोड़ लोगों को पीने का स्वच्छ पानी भी मिलेगा.

गुजरात में जहां इसी प्रोजेक्ट को सरदार सरोवर प्रोजेक्ट नाम दिया गया था, वहां सबसे बड़े बांध का निर्माण होना था. गुजरात सरकार के मुताबिक इससे पड़ोसी राज्य राजस्थान के सूखे इलाकों में 73000 हेक्टेयर ज़मीन को सिंचाई के लिए पानी मिलेगा. साथ ही 8000 गुजराती गांवों को और 135 शहरों को पीने का पानी मिलने का दावा किया गया.

लेकिन ये सब सुविधाएं एक बहुत बड़ी क़ीमत चुका कर ही मिलती.और ये कीमत थी पर्यावरण का बर्बाद हो जाना और लाखों लोगों की ज़मीन और घर बार छीन जाना.

बांध के बनने से बहुत सारा बहता पानी एक जगह रुक कर इकठ्ठा होना शुरू हो जाता है, जिससे आस पास की ज़मीन पानी में डूब जाती है. जिससे वहां के रहने वाले लोग अपनी ज़मीन, घर और रोजगार से हाथ धो बैठते हैं. साथ ही बहुत बड़ा इलाका उपजाऊ ज़मीन से हाथ धो बैठता है.

अकेले गुजरात के सरदार सरोवर बांध की बात करें तो ये बांध करीब 455 फुट ऊंचा है. इतने ऊंचे बांध में जब पानी भरना शुरू होगा तो गुजरात, महाराष्ट्र समेत मध्यप्रदेश के करीब 37000 हेक्टेयर कृषि के उपजाऊ ज़मीन पानी में डूब जाएंगे. सिर्फ एक सरदार सरोवर बांध से 320,000 लोगों को विस्थापित होना पड़ा है. इसके अलावा जंगली जीव और पेड़ पौधों का नुक़सान अलग…

आगे जाकर नर्मदा नदी के पानी को लेकर गुजरात, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में विवाद हो गया, जिसको सुलझाने के लिए 1969 में “Narmada Disputes Tribunal” (NDT) का गठन किया गया.

जल विवाद को सुलझाने के अलावा NDT का मुख्य उद्देश्य बांध के वजह से विस्थापित लोगों के पुनर्वास के बारे में हल निकलना था. तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश वी.रामास्वामी खुद इसकी अध्यक्षता कर रहे थे. लेकिन इस NDT में ना कोई सामाजिक विज्ञानी था ना ही मानव विज्ञानी ना पर्यावरण वैज्ञानिक. इन सब कमियों के बावजूद जांच चली और 1978 में इस NDT ने नर्मदा प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी और काम शुरू हो गया.

विस्थापित लोगों के लिए NDT ने गुजरात सरकार को “लैंड फॉर लैंड” पॉलिसी पर काम करने की सख्त हिदायत दी. अर्थात विस्थापित हुए लोगों को उतनी ही ज़मीन कहीं और दी जाए जितनी उनसे बांध बनने के कारण छीन गयी है. पर इसके लिए ज़मीन के कागजात होने ज़रुरी थे.

विस्थापित लोगों में से 95 फीसदी लोग अनपढ़ हैं और गांव में रहते हैं. ये लोग वहां आजादी से भी पहले से रह रहे हैं. ये उनकी पुश्तैनी ज़मीन है. ऐसे में उनके पास कागजात कहां से आते ज़मीन के. इस बात का फ़ायदा सीधे तौर पर गुजरात सरकार ने उठाया और लोगों को ज़मीन नहीं दी.

इस प्रोजेक्ट को फिर से हरी झंडी मिलते ही वर्ल्ड बैंक ने सरदार सरोवर प्रोजेक्ट के कुल खर्च का 10% करीब 250 मिलियन डॉलर (करीब 14 अरब 92 करोड़) देना मंजूर कर लिया. अक्सर जब वर्ल्ड बैंक किसी देश या किसी प्रोजेक्ट को पैसे देता है तो वो पूरी जांच करता है और कहीं कोई अनियमितता ना होने और लोगों को नुक़सान ना होने शर्त पर ही पैसे देता है.

पर इस मामले में ऐसा नहीं हुआ. इस मामले में NDT की रिपोर्ट पर भरोसा किया गया. इससे ये पता लगता है कि ना सिर्फ भारत सरकार वल्कि विदेशी संस्थाएं भी इन प्रोजेक्ट को जल्द से जल्द पूरा करवाना चाहती थी.

1980 के शुरुआती दौर में नर्मदा प्रोजेक्ट को समाज के हर हिस्से से विरोध झेलना पड़ा. तीनों राज्यों में विस्थापित हुए लोगों ने विद्यार्थियों ने सोशल एक्टिविस्ट ने कई राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी विरोध के स्वर तेज़ कर दिए.

गुजरात के 19 गांव जो बांध का काम पूरा होने पर पानी में डूब जाते, उन्होंने “छात्र युवा संघर्ष वाहिनी” नाम का संगठन बनाया और कोर्ट गए, जिसका नतीजा ये हुआ कि गुजरात सरकार को विस्थापित लोगों को स्पेशल पैकेज देने का वादा करना पड़ा.

वहीं इन प्रोजेक्ट का मध्यप्रदेश में विरोध कर रही संस्था “नर्मदा घाटी नवनिर्माण समिति” और महाराष्ट्र में इन प्रोजेक्ट का विरोध कर रही संस्था “नर्मदा घाटी धरंग्रस्था समिति” 1989 में एक दुसरे से मिल गए और एक नयी संस्था का निर्माण हुआ जिसे आज हम “नर्मदा बचाओ अंदोलन” (NBA) के नाम से जानते हैं.

मेधा पाटेकर ने नर्मदा बचाओ आन्दोलन का नेतृत्व किया. NBA ने सरकार और वर्ल्ड बैंक के बीच आदान प्रदान किये जाने वाले कागजातों पर नज़र रखना शुरू कर दिया. शुरुआत में मेधा पाटेकर ने गांधीगिरी का रास्ता चुना, शांतिपूर्वक मार्च किया, धरने दिए. पर जब इससे बात नहीं बनी, तो 1991 में ज़बरदस्त भूख हड़ताल की. पर वो असफल रही जिसका नतीजा ये हुआ कि NBA ने असहयोग आन्दोलन की शुरुआत कर दी.

इस असहयोग आन्दोलन के तहत लोगों से टैक्स न भरने की अपील की गयी. गांवों में सरकारी अधिकारियों की एंट्री बंद कर दी गयी. केवल शिक्षकों और डॉक्टर्स को गांवों में जाने की इज़ाज़त दी गयी.

नर्मदा बचाओ आन्दोलन की सफलता के पीछे उत्तम नेतृत्व का हाथ था, जो कि देश के सर्वमानित लोगों के हाथ में था. मेधा पाटेकर जिन्हें प्यार से अब मेधा ताई कहा जाने लगा है, उन्होंने करीब 2 दशकों तक इस आन्दोलन का सफल नेतृत्व किया. कई भूख हड़ताल और असहयोग आन्दोलन कर चुकी मेधा ताई ने नर्मदा नदी की खातिर लाठियां भी खाई, जेल भी गयी और पुलिस की बर्बरता का शिकार भी हुईं. इस आन्दोलन के दुसरे हीरो थे बाबा आमटे जो लेप्रोसी के खिलाफ लड़ते रहे फिर 1980 में वो नर्मदा नदी से जुड़ गए.

फिर वो दौर शुरू हुआ जिसकी कल्पना इमरजेंसी के बाद किसी ने कभी नहीं की होगी. मेधा पाटेकर और बाबा आमटे ने प्रदर्शन की एक सीरीज चला दी.1989 में आमटे ने 60000 लोगों के साथ धरना प्रदर्शन किया.1990 में NBA ने 5 दिन तक दिल्ली में प्रधानमन्त्री आवास के बाहर ज़बरदस्त धरना प्रदर्शन किया, जिसने तत्कालीन प्रधानमन्त्री वी.पी.सिंह को इस प्रोजेक्ट के बारे में फिर सोचने पर मजबूर कर दिया. इस महान्दोलन का सबसे चर्चित नारा था “विकास चाहिए विनाश नहीं” और “कोई नहीं हटेगा बांध नहीं बनेगा”

आन्दोलन रोज तेज़ होते जा रहे थे. इसने वर्ल्ड बैंक को अपनी पॉलिसी पर पुनर्विचार करने पर विवश कर दिया. जून 1991 में वर्ल्ड बैंक ने घोषणा कर दी कि वो एक स्वतंत्र कमीशन भारत भेजेगा, जो गुजरात के सरदार सरोवर प्रोजेक्ट की समीक्षा करेगा. इस कमीशन का नाम था ‘मोर्स कमीशन’

कमीशन ने अपना काम पूरा करके 357 पेज की एक रिपोर्ट तैयार की, जिसमें भारत सरकार को लोन देने की पालिसी में पुनर्विचार करने को कहा गया. इस रिपोर्ट में मानवाधिकार उल्लंघन की बात भी पहली बार सामने आई. पर्यावरण के साथ किये जा रहे खिलवाड़ को भी सबके सामने रख दिया गया.

इस रिपोर्ट के बाद वर्ल्ड बैंक की अन्तराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना होने लगी, जिसके वजह से वर्ल्ड बैंक ने सरदार सरोवर बांध को दिए 250 मिलियन डॉलर की सहायता को वापस ले लिया. पर इसके बावजूद भारत सरकार ने बांध निर्माण का काम जारी रखा.

मेधा पाटेकर 2014 का लोकसभा चुनाव आम आदमी पार्टी के टिकट पर लड़ीं, लेकिन हार गयीं. ये इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि आज की युवा शक्ति किसी के निस्वार्थ संघर्ष और जीवनपर्यंत देशसेवा के भाव को कितना तवज्जो देता हैं.

आज सरदार सरोवर बांध की अगर बात करें तो 31 दिसंबर 2006 में बांध बनकर तैयार हो गया, जिसका उदघाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया. तब बांध करीब 125.92 मीटर उंचा बना था. उसके बाद के काम को रोक दिया गया. इस बाँध से करीब 3 लाख 20 हज़ार लोग विस्थापित हो गए और बेघर हो गए.

अब मोदी साहब के प्रधानमन्त्री बनने के बाद इसी बांध को 17 मीटर और ऊँचा करने का आदेश दे दिया गया है. अब ये बताने की ज़रुरत नहीं है कि इससे आसपास के दूकान, घर, खेत, खलिहान, लोगों की रोजी रोटी सब छीन जाएंगे. लेकिन सरकार एक बार फिर लोगों के दर्द को अनसुना करने की कोशिश कर रही है.

मेधा पाटेकर ने नरेन्द्र मोदी को चिट्ठी लिखकर मामले की गंभीरता को समझाने की कोशिश भी की है. लेकिन बहुमत में आई सरकार या तो बहुत अच्छे काम कर सकती है या बहुत बुरे. अब तक की मोदी सरकार कुछ ख़ास छाप नहीं छोड़ पा रही है. ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि इस बांध की ऊंचाई और लोगों के भविष्य का क्या होता है.

विकास करना अच्छी बात है, पर देश के भविष्य, नौजवानों की रोजी और पर्यावरण के बारे में हमें पहले सोचना चाहिए और किसी भी कीमत में कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए, जिससे इनमें से किसी को भी नुक़सान हो.

(लेखक पत्रकारिता के छात्र हैं. और उनसे https://www.facebook.com/Amit.Bhaskar.Official.Fan.Page पर सम्पर्क किया जा सकता है.)

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