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Reading: थर्मल पावर से क़हर, अब है अक्षय ऊर्जा की बारी…
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BeyondHeadlines > India > थर्मल पावर से क़हर, अब है अक्षय ऊर्जा की बारी…
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थर्मल पावर से क़हर, अब है अक्षय ऊर्जा की बारी…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published July 13, 2014 16 Views
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11 Min Read
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Abhishek Kumar Chanchal for BeyondHeadlines

कोयला विद्युत संयंत्रों से निकलने वाला फ्लाई ऐश मुज़फ्फरपुर के निवासियों के लिए एक बारहमासी समस्या हो गई है. अपने सूती वस्त्र उद्योग तथा आम और लीची  जैसे फलों के उम्दा उत्पादन के लिये यह जिला पूरे विश्व में जाना जाता है. आज इसकी इसी पहचान पर ही खतरा मंडरा रहा है. यहां के कांटी र्थमल पावर से निकलने वाले फ्लाई ऐश में भारी धातु जैसे आर्सेनिक, पारा होते हैं, जिससे लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को सीधा नुकसान पहुंच रहा है.

लीची का रंग हुआ काला

अब्दुल मन्नान का घर कांटी र्थमल पावर (मुज़फ्फरपुर) से एक किलोमीटर पश्चिम में स्थित है. इस इलाके मे सबसे ज्यादा लीची का बगान इन्हीं के पास है. इनके घर का अर्थव्यवस्था इसी बगानी कृषि पर निर्भर करता है. लेकिन मन्नान की आर्थिक हालत दिन-प्रतिदिन खस्ताहाल होती जा रही है.

कारण पूछे जाने पर मन्नान बताते हैं कि “र्थमल पावर के शुरु होने के बाद खेती के साथ- साथ आम लीची के फसल खासकर स्वदेशी फसल को काफी नुक़सान हुआ है. पानी का स्तर दिनों-दिन गिरता जा रहा है. यहां के निवासी अस्थमा, तपेदिक, क्रोनिक ब्रोंकाइटिस जैसी बिमारियों से ग्रसित होते जा रहे है.”

मन्नान कहते हैं कि ‘जब पछिया हवा चलता है तब हमारे गांव का पेड़-पौधा काला पड़ जाता है. घर के दरवाजे पर काले रंग का छाई जम जाता है.’ मन्नान आगे बताते हैं कि ‘अब तो वे दिन चले गये जब लीची देखने के बाद तबीयत खुश हो जाता था.’

लेकिन जैसे-जैसे आप र्थमल पावर से दूर जाऐंगे वैसे-वैसे आपको फर्क नज़र आने लगेगा.

कोयला बिजली की हकीक़त यह मामला केवल कांटी र्थमल पावर के आस-पास के इलाका का नहीं है, बल्कि ऐसा मामला उन सभी जगहों का है, जहां पर इस तरह की परियोजनाएं चलाई जा रही हैं.

बिजली के उत्पादन में सामान्यतः डेपरीसियेशन, ब्याज, वेतन एवं कोयले के खर्च को जोड़कर उत्पादन लागत की गणना की जाती है, लेकिन पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को अनदेखा कर दिया जाता है, जिसके कारण लोगों का स्वास्थ बिगड़ा है.

साथ ही खेती को भारी नुकसान पहुंचा है. र्थमल पावर प्लान्ट से निकलने वाले गर्म पानी बिना रिफाइन किये नदियों में छोड़ दिये जाते हैं, जिसके चलते मछलियों की संख्या मे कमी आ रही है.

हाल ही में आयी एक रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र में ज़हरीले पारा के बढ़ने के संकेत मिल चुके हैं. आदमी और मछली दोनों के खून जांच में उच्च स्तर का पारा पाया गया था. पारा नियुरोओक्सिसिटी के साथ जुड़ा एक भारी धातु है और यह फ्लाई ऐश के गठन की प्रमुख घटकों में से एक है.

इस तरह की घटना से बचने के लिए फ्लाई एश पॉण्ड को लेकर दिशा-निर्देश बनाये गए हैं, लेकिन दुर्भाग्य से शायद ही पावर प्लांट्स इस नियम का पालन करते हैं.

 

विकल्प की तलाशः अक्षय ऊर्जा

एक तरफ तेल और बिजली की किल्लत, तो दूसरी तरफ ग्लोबल वार्मिग का खतरा…. ऐसे में अक्षय ऊर्जा की तरफ मुड़ना एक मात्र सुरक्षित विकल्प है. भारत में सौर ऊर्जा के जनक कहे जाने वाले प्रोपी गर्ग ने ही प्राकृतिक ऊर्जा को ‘अक्षय ऊर्जा’ नाम दिया.

अक्षय ऊर्जा यानी ऊर्जा का वो प्राकृतिक स्रोत जिनका कभी भी क्षय नहीं होता और न ही प्रदूषणकारी होता है. जैसे जल, सौर ऊर्जा, ज्वार-भाटा, भूताप, पवन ऊर्जा आदि.

पर्यावरण पर काम करने वाली अन्तर्राष्ट्रीय संस्था ग्रीनपीस की हालिया रिपोर्ट ‘ऊर्जा क्रांति’ के अनुसार भारत वर्ष 2020 तक करीब 34 गिगावाट का सौर उर्जा क्षमता जोड़ेगा, जो भारी तादाद में सोलर पीवी और छत पर लगनेवाले सौर उपकरणों के बूते संभव होगा. इससे कुल संस्थापित क्षमता में सौर उर्जा की हिस्सेदारी 8 प्रतिशत तक होने का अनुमान है.

दरअसल केवल सौर ऊर्जा बाजार में सरकार ने फायदा घटित होते देखा है. जवाहरलाल नेहरू नेशनल सोलर मिशन (जेएनएनएसएम) ने देश में सौर ऊर्जा के विकास का मंच तैयार करने के लिए वर्ष 2022 तक 20 गिगावाट का लक्ष्य रखा है. साथ ही वैश्विक स्तर पर सौर तकनीक से जुड़ी विनिर्माण क्षमता और उपकरणों के विकास के लिए समुचित माहौल की दिशा में क़दम उठाया है.

मोटे अनुमान के मुताबिक वर्ष 2020 तक लघु पनबिजली ऊर्जा से 5 गिगावाट तथा बायोमास आधारित बिजली से 24 गिगावाट विद्युत आपूर्ति की संभावना है. वर्तमान समय में भारत में ‘अक्षय ऊर्जा’ से 31,000 मेगावाट बिजली पैदा की जा रही है. जो 2030 तक बढ़कर लगभग 5 लाख मेगावाट तक हो सकती है.

कई देश एक बेहतर ऊर्जा विकल्प की तरफ अब केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के देशों ने अनुभव कर लिया है कि अक्षय ऊर्जा ही हमारा भविष्य है. आइसलैंड में 85 फीसदी बिजली उत्पादन अक्षय स्रोतों से होता है.

न्यूजीलैंड और नार्वे में यह आंकड़ा क्रमशः 38 प्रतिशत और 37 प्रतिशत बैठता है. जर्मनी पवन ऊर्जाशक्ति इस्तेमाल करने वाला दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है. इसके आगे चीन और अमेरिका हैं, जिनकी वर्ष 2010 तक कुल संस्थापित क्षमता 27,215 मेगावाट थी.

ऊर्जा दृष्टिकोण से इतर अक्षय ऊर्जा तकनीक एक स्वस्थ आबादी के लिए जीवन-यापन और काम-काज के लिए एक स्वस्थ वातावरण प्रदान करने का वायदा भी करता है.

वर्तमान में भारत का ऊर्जा क्षेत्र करीब 24 लाख रोजगार प्रदान करता है, जिसमें अक्षय उर्जा उद्योग की हिस्सेदारी 44 प्रतिशत है. लेकिन अक्षय ऊर्जा को बड़े पैमाने पर स्थापित किया जाये तो वर्ष 2015 तक 14 लाख नौकरियां सृजित की जा सकती है, जो कोयला उद्योग के 5 लाख के रोजगार से कहीं ज्यादा है.

भारतवर्ष का यह सौभाग्य है कि यहां साल के 365 दिन में से 300-320 दिन धूप मिलती है, जो पूरे साल में 5,000 खरब किलोवाट घंटा ऊर्जा के बराबर है.

एक अनुमान के अनुसार बिहार जो देश में ऊर्जा के मामलें में अतिपिछड़ा है, यहां के 19,000 ऐसे गांव है, जहां पर अभी तक बिजली नहीं पहुंची. जिसके चलते इन गांवो का भविष्य अंधकारमय बना हुआ है. भारत के अधिकतर पिछड़े गांवों की स्थिति कमोबेश बिहार की ही तरह है, जिसके कारण गांव का एक बड़ा हिस्सा शहरों की तरफ पलायन कर रहा है, जिसके फलस्वरुप शहरों में मलिन बस्तीयों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है. इससे शहरों का वातावरण इतना प्रदूषित हो गया है कि वहां के लोग नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं.

एक रिर्पोट के अनुसार ऊर्जा आपूर्ति करने के लिए प्रकृति के सीमित संसाधन जैसे कोयला, कच्चा तेल इत्यादि का धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है, जिसके चलते अगले 40 वर्षों में इन संसाधनों के खत्म हो जाने की संभावना है.

इन संसाधनों को बचाने के लिए और ऊर्जा प्राप्ती के लिए ये ज़रुरी है कि अक्षय ऊर्जा के स्रोतों से बिजली प्राप्त किया जाये. अक्षय ऊर्जा नवीकरणीय होने के साथ-साथ पर्यावरण के अनुकूल भी है.

वर्तमान में देश की 80 प्रतिशत विद्युत आपूर्ति गैर नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों से पूरी हो रही है. जिसमें कोयला द्वारा बनाई जाने वाली तापीय ऊर्जा का योगदान 64 फीसदी है. जिसके लिए भारी मात्रा में कोयला का आयात किया जाता है. जिसके कारण सकल घरेलू उत्पाद का एक बड़ा हिस्सा ऊर्जा पर खर्च कर दिया जाता है.

अगर कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के कुल सकल आयात के आंकड़ों पर नज़र दौड़ाया जाए तो हम पाते है कि वर्ष 2009-10, 2008-09 में क्रमशः 4,18,475 करोड़, 4,22,105 करोड़ था जबकि इसकी तुलना में निर्यात क्रमशः 1,44,037 करोड़, 1,21,086 करोड़ था.

आकड़ों से पता चलता है कि आयात और निर्यात के बीच का इतना बड़ा अंतर भारतीय अर्थव्यवस्था को खोखला करने वाले हैं.

अत: इसे कम करने की ज़रुरत है, जिसे केवल अक्षय ऊर्जा के उपयोग से ही किया जा सकता है. अक्सर समझा जाता है कि अक्षय ऊर्जा तकनीक अपरिपक्व व अविश्वसनीय हैं और बड़े पैमाने पर प्रयोग किये जाने पर लागत संबंधी लाभ प्रदान करने में ये पीछे रहती हैं. जबकि इसे पूरी तरह से गलत तरीके से पेश किया गया है.

अक्षय ऊर्जा में वे संभावनाएं हैं, जिससे पूरी दुनिया के साथ-साथ खासकर भारत के ऊर्जा बाजार को बदला जा सकता है. वैश्विक हलकों में क्लीन टेक्नोलॉजी उद्योग को अगला हाइटेक रिवोल्यूशन माना जा रहा है. अभी भारतीय ऊर्जा क्षेत्र करीब 24 लाख नौकरियां प्रदान कर रहा है, जिसमें अक्षय ऊर्जा उद्योग की हिस्सेदारी 44 फीसदी है.

हालांकि साल 2020 तक नौकरियों की संख्या कमोबेश यही रहे, लेकिन एक बड़ा बदलाव यह होगा कि अक्षय ऊर्जा इसमें प्रभावकारी भूमिका निभायेगा और रोजगार में उसकी भागीदारी 74 फीसदी तक हो जायेगी. इसके साथ-साथ कोयला व जीवाश्म ईंधनों से पैदा सामाजिक संघर्ष, विस्थापन व वातारणीय दुष्प्रभाव आदि संकटों को रोकने की दिशा में भी अक्षय ऊर्जा से ही मदद मिलेगा.

स्पष्ट है कि  भारतवर्ष में अक्षय ऊर्जा के कई फायदे हैं. जरुरत है सुदृढ़ नीतियों द्वारा इनको अपना कर ऊर्जा प्राप्त करने की, जिससे देश का आर्थिक, सामाजिक, एंव पर्यावरणीय विकास संभव हो सके.

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