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BeyondHeadlines > बियॉंडहेडलाइन्स हिन्दी > कितना सस्ता हो गया है लहू…
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कितना सस्ता हो गया है लहू…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published February 21, 2015 6 Views
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10 Min Read
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Afaque Haider for BeyondHeadlines

‘गांव ने मुआवज़े के तौर पर पैसे जमा किये. हर मरने वाले को 1.5 लाख रूपये और घायलों को 50 हजार रूपये बतौर मुआवज़ा दिया गया. ये सब कुछ किया गया ताकि दो समुदायों के बीच अमन कायम किया जा सके. (इंडियन एक्सप्रेस, 17 फरवरी, 2015)

बानसकंठा की अदालत ने क़त्ल के 70 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया. अधिकतर चश्मदीद गवाह अपने बयानों से पलट गयें. वो क्यों पलटे? ये समझने के लिए बचाव पक्ष के वकील बी.के. जोशी को उपरोक्त बयान काफी है कि मरने वाले के रिश्तेदारों को 1.5 लाख और घायलों को 50 हजार बतौर मुआवज़ा दिया गया ताकि दोनों दलों के बीच सुलह हो सके. दोनों समुदाय के बीच अमन कायम किया जा सके.

इस ख़बर से और अदालत के इस फैसले से ये बात तो साफ है कि इस महंगाई के दौर में सबसे सस्ता इंसानी लहू है. वह भी मुल्क के सबसे ज्यादा तरक्की याफता और खुशहाल रियासत में… अधिकतर गवाह जो खुद इस नरसंहार में पीडि़त थें या तो उन्हें खरीदने की कोशिश की गई या फिर उन्हें डराया धमकाया गया. यही वजह रही अदालत में अहम चश्मदीद गवाह अपने बयान से ही पलट गयें.

अदालत ने सभी 70 आरोपियों को सबूत के अभाव में बरी कर दिया. लेकिन सवाल ये पैदा होता है कि ये बेकसूर हैं तो इस कत्लेआम का कसूरवार कौन है? लेकिन इससे भी बड़ा सवाल है कि इंसाफ कौन करेगा?

न्याय के दो पक्ष होतें हैं. अदालत और स्टेट… अदालत आरोपी के साथ खड़ा होता है. वो ये देखता है कि जिस पर आरोप लगा उसके खिलाफ सबूत संतोषजनक है कि नहीं? और स्टेट पीडि़त के साथ खड़ा होता है. वह पीडि़त की ओर से एफआईआर दर्ज करता है. सबूत जुटाकर अदालत के समक्ष रखता है. कोर्ट में अपील करता है. अगर स्टेट चाहे तो दिन दहाड़े जेसिका लाल का मर्डर करने वाला मनु शर्मा बरी हो सकता है और अगर स्टेट चाहे तो दोबारा जेल भी जा सकता है. ये सब कुछ स्टेट के चाहने पर निर्भर है. लेकिन जब स्टेट ही कठघरे में खड़ी हो. स्टेट ही सवालों के घेरे में हो. स्टेट के ही मंत्री मुजरिम हो. स्टेट के ही बड़े-बड़े पुलिस अधिकारी जेलों में हों. स्टेट पर ही पक्षपात को आरोप हो तो ऐसे में न्याय मज़ाक बन जाता है. जो मज़ाक इन मज़लूमों के साथ हुआ है. ऐसे में इंसाफ बेमानी हो जाता हैं.

इन 13 सालों में इस केस की जांच का नेतृत्व आठ बार बदला गया. जिससे केस कमज़ोर जांच के अभाव में पहले ही कमज़ोर हो गया. बाकी की रही सही कसर इनकी गरीबी ने पूरी कर दी. बानसकंठा में पुलिस का दंगों के दौरान रोल भी पहले ही विवादों में रहा. बानसकन्ठा के एस.पी हिमांशु भट ने वहां के सब इंस्पेक्टर जिसका ताल्लुक वीएचपी और बीजेपी के नताओं से था, दंगों में कथित भूमिका के लिए निलंबित कर दिया था. लेकिन तुरंत ही एसपी की पोस्टिंग फील्ड से हटाकर डेस्क जॉब पर कर दी गयी. (गुजरात द मेकिंग ऑफ ट्रेजेडी, वर्दराजन, 2002, पेजः 197).

इस घटना से स्टेट का किरदार बखूबी समझा जा सकता है. दंगों में अधिकतर आरोपी और दोषी का संबंध आरएसएस और उससे संबंधित संगठनों से था. सरकार का संबंध भी आरएसएस और उससे संबंधित राजनीतिक और सामाजिक संगठनों से था. लेकिन सबसे विचित्र बात यह है कि सरकारी वकील भी इन्हीं संगठनों के नियुक्त किये गये, जो पीडि़तों की ओर से मुक़दमा लड़ रहे थें. मतलब कि सरकारी वकील पीडि़तों के लिए नहीं आरोपियों के लिए मुक़दमा लड़ रहे थें.

वह सारी जगह जहां बदतरीन फसाद हुआ, वहां संघ परिवार से जुड़े लोगों को सरकारी वकील नियुक्त किया गया. मेहसाना में दिलिप त्रिवेदी जो गुजरात वीएचपी का महासचिव हैं, जिले का पब्लिक प्रोसेक्युटर (अप्रेल 2000 से दिसंबर 2007) था. उसने सरदारपुरा और दिपता दरवाजे केस की पैरवी कि जिसमें 44 लोगों की नृशंष हत्या कर दी गयी थी.

2002 में इस केस में 3000 लोग गिरफ्तार किये गये थें, लेकिन 2007 आते-आते केवल 100-150 लोग ही आरोपी रह गयें. उनमें से भी अधिकतर को जेल से बेल मिल गयी. नरोदा पाटिया और गुलमर्ग सोसाईटी जहां 141 लोगों को जि़न्दा जला दिया गया था, जैसे अतिसंवेदनशील केसों में भी सरकारी वकील संघ परिवार से ताल्लुक रखने वाले लोगों को बनाया गया. चेतन शाह जिसने नरोदा पाटिया में सराकरी वकील की भूमिका निभाई वह भी वीएचपी के एडवोकेट पैनल का दो दशक से सदस्य था. पंचमहल में दंगों के केसों की पैरवी करने वाला सरकारी वकील पीयूष गांधी जो 121 केसों की पैरवी कर रहा था. वीएचपी का जिला अध्यक्ष था. आनन्द और कैरा जिले में दंगों के मुकदमों की पैरवी करने वाली भी सरकारी वकील संघ परिवार और वीएचपी के हमदर्द थे. इसी तरह बेस्ट बैकरी केस में पैरवी करने वाला पब्लिक परोसेक्यूटर पीएस धोरा वडोदरा जिले के वीएपी अध्यक्ष अजय जोशी का रिश्तेदार था. (दा हिन्दू, मानस दास गुप्ता, 21 सितम्बर 2003)

सरकारी वकील तकनीकी रूप से तो पीडि़तों के लिए स्टेट नियुक्त करती है, लेकिन दरहकीकत यहां सरकारी वकील आरोपी के लिए स्टेट ने नियुक्त किया था. वरना ये कैसे मुमकिन था कि आरोपी जिस संगठन से ताल्लुक रखतें हैं, अभियोजन पक्ष का वकील भी उसी संगठन से ताल्लुक रखे. पीडि़तों में अधिकतर का ताल्लुक मुस्लिम समुदाय से था. लेकिन एक भी मुस्लिम सरकारी वकील नहीं था. यही वजह रही कि अधिकतर सरकारी वकील गवाहों को खरीदने में और सुलह कराने में लगे रहें, जिसका पर्दाफाश खोजी पत्रिका तहलका ने भी किया था.

आपराधिक न्याय में जांच और अभियोजन दो महत्वपूर्ण अंग हैं, जिसके बिना न्याय की कल्पना भी नहीं कि जा सकती. यहां पुलिस ही पर दंगा करने का आरोप है और अभियोजन पक्ष का वकील ही आरोपियों से ताल्लुक रखने वाला संगठन से जुड़ा है, तो न्याय की अवधारणा ही काल्पनिक हो जाती है. जो गुजरात में हो गया.

न्याय कुछ हद तक अगर मुमकिन हुआ तो सुप्रीम कोर्ट और सिविल सोसाईटी के संघर्षों से जिन छः मामलों में जांच एसआईटी ने कि थी उसी में कुछ हद तक न्याय हो पाया. वरर्ना जयदीप पटेल और माया कोडनानी के खिलाफ तो शुरू से ही चश्मदीद गवाह मौजूद थें और उनके खिलाफ शिकायत दर्ज थी. लेकिन फिर भी पुलिस ने उन्हें गिरफतार करने में पूरे 7 साल लगा दिये. गुजरात में केवल पुलिस और सरकारी वकील ही राजनीति से प्रभावित नहीं थें, बल्कि गुजरात में नाइंसाफी की सारी हदें टूट गयीं थीं.

यहां अदालते भी राजनीतिक रूप से प्रभावित हो गयी थी. आर.के. राघवन (2010) ने अपनी रिपोर्ट में इसका जि़क्र करते हुए कहा है कि ‘गुजरात में कुछ न्यायिक नियुक्तियां राजनीतिक रूप से प्रभावित हैं या तो इन लोगों का सम्बंध सत्ताधारी पार्टी से है या उनसे हमदर्दी रखने वाले संगठन से है’ (वाट जस्टिस फार दा राईट विक्टिम, क्रिस्टोफर जफरलेट).

न्याययिक प्रक्रिया और कार्यकारिणी लोकतंत्र के बेहद महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, जिसका स्वतंत्र होना अनिवार्य है. तभी एक स्वतंत्र लोकतंत्र की कामना की जा सकती है. लेकिन ये राजनीतिक रूप से प्रभावित होती रही है. केंद्र में सत्ता परिवर्तन होते ही सत्ता पक्ष से ताल्लुक रखने वाले कई अपराधियों को बेल और क्लीन चिट मिल गया, जो पूरे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ही एक सवालिया निशान है. वहीं दूसरी तरफ तिस्ता सितलवाड जो शुरू से ही सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाती रही. उसे निचली अदालत से बेल तक नहीं मिल पाया, बल्कि पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने भी चली गई.

सबसे मज़े की बात ये है कि पुलिस क़त्ल के मुलजिम अमित शाह के क्लीन चिट के खिलाफ अपील नहीं करना चाहती, लेकिन वह तिस्ता सीतलवाड को गिरफ्तार करने के लिए उत्सुक है, जिस पर केवल पैसे के गमन का मुक़दमा है.

बानसकंठा में 14 लोगों के नृशंष हत्या में सारे आरोपी का छूट जाना केवल पीडि़तों की हार नहीं है बल्कि एक लोंकतांत्रिक व्यवस्था की हार है. जो पूरे न्यायिक व्यवस्था पर एक प्रश्न चिन्ह लगा जाता है.

(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में रिसर्च स्कालर हैं.)

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