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Reading: ‘लड़की के लिये लड़की का ससुराल ही उसका कब्रगाह होता है’
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BeyondHeadlines > Mango Man > ‘लड़की के लिये लड़की का ससुराल ही उसका कब्रगाह होता है’
Mango Man

‘लड़की के लिये लड़की का ससुराल ही उसका कब्रगाह होता है’

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published August 9, 2015 13 Views
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10 Min Read
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Sonika Krantiveer for BeyondHeadlines

कहते हैं समाज जाग चुका है, देश जाग चुका है, हम लोग पुरानी हर समजिक कुरीतियों को दूर कर चुके हैं. हम सब जहाँ देखो वहाँ आवाज़ लगाते  दिखाई देंगे कि भ्रुण हत्या अपराध है… नारी देवी के समान है… नारी के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती… मगर क्या यही हकीकत है?

नहीं! हमें तो नज़र नहीं आ रही है. हमें तो यही महसूस हो रहा है कि बेटी को जन्म देना सबसे बड़ा अपराध है और ‘किसी भी हालत में बेटी को जन्म मत दो’ यही संदेश जहाँ देखो वहाँ सुनाई दे रहा है.

हमारे देश में मौजूद अग्रवाल समाज भी यही संदेश पूरे देश में देता नज़र आ रहा है कि बेटी को जन्म मत दो. यह वह समाज है जिसे व्यापारिक समाज कहा जाता है. यह समाज देश के हर क्षेत्र में फैला हुआ है.

समाज की रचना की जाती है एक दूसरे की भलाई व सहयोग के लिये, लेकिन इसी प्रकार से बने एक समाज ‘अग्रवाल समाज’ के कुछ बाशिंदे विधवा माँ की बेबस बेटी को केवल इसलिये दर-दर की ठोकरें खाने को विवश किये हुये हैं, क्योंकि वह बेटी को जन्म देने वाली थी या उसने बेटी को जन्म दिया.

समाज की रचना ऐसे ही बेबस, मजबूर इन्सानों को इन्साफ़ दिलवाने के लिये होती है ना कि किनारे पर खड़े होकर उनका मज़ाक उड़ाने व उन्हें जलील करने के लिये. अगर समाज चाहे तो एकजूट होकर ऐसी गंदी सोच रखने वाले मानसिकता के परिवारों व उनके सदस्यों को दंडित करके रास्ते पर ला सकता है. मगर यह अग्रवाल समाज अपने ही समाज के बेबस, कमजोर व सताये हुये परिवारों या महिलाओं के साथ कभी भी खड़ा नहीं होता है, बल्कि मज़बूत व बाहुबलियों के साथ हमेशा खड़ा दिखाई देता है.

क्या इस अग्रवाल समाज को ख़बर नहीं है कि हमारी समाज की किसी कन्या को बेटी जन्म दिये जाने के नाम पर दर-दर की ठोकरें खाने के लिये विवश किया जा रहा है?

इस अग्रवाल समाज के बुजुर्गों व बुद्धिजीवियों को चाहिये कि वे उनके ही समाज के ऐसे ‘दोषी व्यक्तियों या परिवारों के खिलाफ़’ एकजूट होकर उन्हें इन्सानियत की परिभाषा समझाते हुये सही राह पर लायें और अगर ऐसे परिवार फिर भी अपनी रईसी के घमंड में समाज के बड़े-बुजुर्गों व बुद्धिजीवियों की भावनाओं को ठोकर पर रखे तो उसके साथ सारे व्यापारिक व सामाजिक रिश्ते तोड़ दें. एक समाज और वह भी अग्रवाल समाज जैसा व्यापारिक समाज, क्य़ूँ नहीं एकजूट होकर एक बेबस व विधवा महिला की बेटी को इन्साफ़ दिला सकते हैं.

संगठन के पास ऐसा ही एक मामला मारवाड़ी समाज की एक विधवा की बेबस बेटी का आया है, जिसमें बेटी को जन्म दिये जाने की वजह से ससुराल से पति, जेठ व देवर द्वारा इस तरह मजबूर करके लगभग धक्के देकर बाहर निकाला गया.

मामला कुछ ऐसा है कि एक विधवा, जो मुंबई में रहती है, के मौहल्ले में ही एक अग्रवाल परिवार भी रहता था. जिनके एक ही मोहल्ले में रहने की वजह से आपस में अच्छे पारिवारिक रिश्ते हो चुके थे. कुछ वर्ष पूर्व में यह परिवार अपना निवास स्थान को बदल कर ठाणे जाकर रहने लगा था.

कुछ समय बाद विधवा माँ की बेटी का इस अग्रवाल समाज के परिवार के बेटे से शादी का रिश्ता तय किया गया. रिश्ते से पहले किसी भी प्रकार के लेन-देन की मांग लड़के वालों की तरफ़ से नहीं की गई थी. मगर सगाई के फौरन बाद ही दहेज की लंबी-चौड़ी सूची विधवा माँ के हाथों में सौंप दी गई, जिसकी वजह से रिश्ता टूटने की कगार पर पहुँच गया. मगर कुछ मोहल्ले-वासियों के बीच में पड़ने की वजह से रिश्ता आपसी सहमति से कुछ लेन-देन के साथ शादी के अन्जाम तक पहुँचा.

शादी के तुरन्त बाद से ही दहेज कम लाने के नाम पर विधवा माँ की बेबस बेटी को प्रताड़ित किया जाना शुरू हो गया. पुराने ज़माने की वह सीख कि ‘लड़की के लिये लड़की का ससुराल ही उसका कब्रगाह होता है’ और ‘विधवा माँ पर बोझ न बन जाऊँ’ की सोच रखने की वजह से यह विधवा माँ की बेबस बेटी जुल्मों-सितम को अपनी जिन्दगी का हिस्सा समझ कर सहन करती चली गई.

हद तो तब हो गई जब इस अग्रवाल समाज के इस परिवार ने अंधविश्वास भरी कुरीतियों का सहारा लेकर इस बेबस गर्भवती बेटी को एक अंधविश्वासी लल्लन पंडित जी के द्वारा दिखवाकर यह सोच बनाई कि “ये बेबस बेटी जिसे जन्म देगी वह भी बेटी ही होगी.”

यह पंडित अंधविश्वास का मायाजाल पूरे समाज में विस्तारित करते हुये अपनी रोटियां सेंकने का कार्य करता है, साथ ही परिवार के परिवार भी तबाह करता रहता है, जिसकी वजह से ऐसी बेबस बेटियां भी इस अंधविश्वास भरी तांत्रिक क्रियाओं में बर्बाद हो जाती हैं. (सबूत के तौर पर इस पंडित की कारगुजारियों की ऑडियो/वीडियो रिकॉर्डिंग भी लेखक के पास मौजूद है.)

परिणाम यह रहा कि केवल इस पंडित के कहने का सहारा लेकर इस बेबस बेटी को अस्पताल ले जाकर गर्भपात करवाने का षड़यंत्र किया गया, मगर बेबस बेटी द्वारा अंधविश्वास का विरोध तो किया ही गया, साथ-साथ उसकी यह सोच भी उसे हिम्मत देती रही कि ‘भले ही मेरे गर्भ में बेटी ही क्यूँ ना हो मगर मैं उसे मरने नहीं दूँगी.’ “जिसके कारण कई डॉक्टरों द्वारा गर्भपात से मना कर देना”, जैसे कई षड़यंत्रों को नाकाम करता चला गया. ऐसे गर्भपात केन्द्र में पति व सास के साथ-साथ देवर और जेठ द्वारा भी अस्पताल में ही विधवा माँ की बेबस बेटी के साथ मारपीट व उसे धमकियां भी दी गईं.

आखिर जब यह दहेज लोभी लालची अग्रवाल परिवार ऐसे षड़यंत्रों में नाकाम रहा तो इस परिवार ने अपना पूरा गुस्सा इस बेबस बेटी पर उतारना शुरू कर दिया. यहां तक कि यह बेबस बेटी कहीं घर से बाहर ना निकल जाये इसलिये हमेशा पूरा परिवार जब कहीं बाहर जाता था तो इस बेबस बेटी को ताले में बंद करके जाता था.

आखिरकार एक दिन इस बेबस बेटी को इस अग्रवाल समाज से जुड़े दहेज लोभी परिवार ने घर से बाहर निकाल ही दिया. और फिर वापस घर के अन्दर नहीं लिया. इसी बीच बस इतना अवश्य हुआ कि महिला मंडल व पुलिस के दबाव में बेबस बेटी के प्रसव के समय ससुराल वालों द्वारा अस्पताल का खर्चा दिया गया, मगर नवजात बेटी को अभिशाप मानते हुये उन्होंने उसे देखना तक गवारा नहीं किया, जबकि मायके पक्ष द्वारा ससुराल में नवजात बेटी के जन्म की ख़बर भी दे दी गई थी.

ससुराल वालों की मानसिक सोच देखिये कि वे आज दो वर्ष होने वाले हैं मगर अब तक इस बेबस बेटी की बेटी को देखने तक की कोशिश नहीं की.

विधवा माँ की इस बेबस बेटी की कहानी देश के अग्रवाल समाज की अंधविश्वासी कुरीति पर एक तमाचे से कम नहीं है. संगठन संबंधित मामले में अग्रवाल समाज के बुद्धिजीवी वर्ग से आशा रखता है कि वे संबंधित मामले में आगे बढ़े और ऐसी सामाजिक कुरीतियों से भरे परिवार को दंडित करते हुये उन्हें राह पर लाने का काम करें और यह निश्चित करें कि कभी भी उनके समाज में इस तरह का अंधविश्वास व बेटी के नाम पर भ्रुण-हत्या करने की सोच रखने वाले परिवार पनपने ना पायें.

हमारा संगठन संबंधित मामले में सारे सबूतों के साथ अग्रवाल समाज के मुखियाओं, प्रभावशाली लोगों, जेठ व देवर की कर्मस्थली जैसे देवर फिल्म इंडस्ट्री  से जुड़ा है, के प्रबंधकों के साथ-साथ महिला आयोग, बाल आयोग, मानवाधिकार आयोग में पत्र भेज रहा है और आशा करता है कि वे विधवा माँ कि इस बेबस बेटी को जिसने न्यायाधीश के सामने लिख कर दिया है कि अगर मुझे मेरे पति अपने साथ रखता है तो मैं अपने ऊपर होने वाले जुल्मों-सितम की कभी किसी से भी शिकायत नहीं करूंगी. अगर मेरे पति मेरे अंगों को काट-काट कर यातनायें भी देगा तो भी मैं उफ़्फ़ तक नहीं करूंगी. मेरे पति की यातनाओं की वजह से मैं मर भी गई तो भी मैं यही कहूंगी कि इसमें मेरी ही ग़लती है. पति की कोई गलती नहीं है. मैं अपनी बेटी के लिये हर यातना सहने के लिये तैयार हूँ.

(ये लेखिका के अपने विचार हैं. BeyondHeadlines ने इस संबंध में सारी शिकायतों को देखने के बाद ही इस कहानी को प्रकाशित है.)

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