Edit/Op-Ed

ये संपादकीय भूल है या अंदर तक भरी नफ़रत?

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BeyondHeadlines Editorial Desk

राजस्थान के प्रमुख अख़बार दैनिक भास्कर के दौसा संस्करण में प्रकाशित एक ख़बर न सिर्फ़ अख़बार की संपादकीय नीति को कटघरे में खड़ा करती है, बल्कि अख़बार के संपादक की घृणित मानसिकता का भी पर्दाफ़ाश करती है.

अख़बार ने बेहद सनसनीखेज़ तरीक़े से एक मुस्लिम परिवार के घर की छत पर पाकिस्तानी झंडा लगा होने की झूठी ख़बर प्रकाशित की है.

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अख़बार के अति-उत्साहित रिपोर्टर ने यह तक बता दिया है कि घर में कितने मुस्लिम परिवार रहते हैं ताक़ि यदि ग़ुस्साई भीड़ वहां हमला करने की कोशिश करे तो उसके पास पूरी जानकारी हो.

लेकिन अख़बार का रिपोर्टर या फिर संपादक, जिसपर कि प्रत्येक ख़बर की सत्यता की पुष्टि करने की ज़िम्मेदारी होती है ये भी फ़र्क़ नहीं कर सके कि जो झंडा लगा है वो इस्लामी है ना कि पाकिस्तानी.

इस ख़बर को किसी नौसिखिए पत्रकार की नासमझी कहकर टाला जा सकता था अगर उसमें प्रशासनिक संवेदनशीलता की बड़ी-बड़ी बातें न की गईं होती. लेकिन ये ख़बर लापरवाही के बजाए एक घृणित संपादकीय साज़िश ज़्यादा लगती है.

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अख़बार का संपादक ख़बर प्रकाशित करते हुए यह भूल गया कि भारत एक आज़ाद मुल्क है और यहां रहने वाले प्रत्येक धार्मिक समूह को अपनी धार्मिक पहचान के प्रदर्शन की पूरी आज़ादी है.

यदि घर पर लगा इस्लामी झंडा पाकिस्तानी है और संवेदनशील मामला है तो क्या फिर स्वास्तिक या शुभ-लाभ के चिह्न को भी प्रतिबंधित कर दिया जाए क्योंकि ये नाजियों का चिह्न भी है.

भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों में भगवा झंडा ख़ूब फहराया जाता है. तब ये अख़बार इसे हिंदू दंगाइयों का हिंदू आतंकवादियों से क्यों नहीं जोड़ते.

ये किसी से छुपा नहीं है कि भारत में कुछ कट्टर हिंदू संगठन नफ़रत और हिंसा फैलाने का काम कर रहे हैं और वो खुले तौर पर भगवा झंडे का इस्तेमाल करते हैं.

क्या दैनिक भास्कर के संपादक किसी घर पर लगे भगवा झंडे पर ऐतराज करते हुए ख़बर प्रकाशित करने की हिम्मत कर सकते हैं और इन्हें श्रीराम सेना जैसे कट्टरपंथी संगठनों से जोड़ सकते है?

वे ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि वो बहुसंख्यकों के ग़ुस्से से डरते हैं और अल्पसंख्यक उनके लिए आसान निशाना है.

दैनिक भास्कर की इस झूठी और माहौल ख़राब करने की मानसिकता से लिखी गई ख़बर का सोशल मीडिया पर कड़ा विरोध हो रहा है.

सोशल मीडिया पर विरोध से शायद बहुत कुछ हासिल न हो, सिवाए अख़बार को शर्मिंदा करने के.

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ज़रूरत अख़बार को अदालत में खड़ा करके संपादक से यह पूछने की है कि इस झूठी ख़बर के प्रकाशन को दंगा भड़काने की साज़िश क्यों ना माना जाए.

जिस परिवार का ख़बर में ज़िक्र किया गया है उसे अच्छे वकील की सेवाएं लेकर अख़बार के संपादकों और मालिकों पर अपनी सुरक्षा को ख़तरे में डालने का मुक़दमा करना चाहिए.

और बात यहीं क्यों रूके, प्रशासन या सरकार को अख़बार की इस घिनौनी करतूत का स्वत संज्ञान क्यों नहीं लेना चाहिए.

भारत के अल्पसंख्यक पहले से ही डरे हुए हैं, इस तरह की ख़बरों का बड़े अख़बार में प्रकाशित होना इस डर को और बढ़ावा ही देगा.

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