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पुनर्वास की कहानी हम पुनर्वासित युवाओं के ज़ुबानी

BeyondHeadlines News Desk

दिल्ली सरकार ने 95 झुग्गी बस्तियों को राजीव रतन आवास योजना के तहत उजाड़ कर बहुमंजिली आवास में पुनर्वासित करने का फैसला लिया है. इस योजना के तहत अलग-अलग इलाकों से झुग्गियों को उजाड़ कर बवाना, भोरगढ़, नरेला, द्वारका एवं बापरोला जैसे दूर के इलाके में बसाया जायगा. पुनर्वास की इस प्रक्रिया को सरकार चार चरणों में करने का इरादा रखती हैं. इस पुनर्वास प्रक्रिया में जो सब से बड़ा सवाल है वह यह कि इस प्रक्रिया में जितने परिवार उजाड़े जायेंगे उसको बसाने के लिए सरकार के पास 25 % भी आवास उपलब्ध नहीं हैं. फिर ऐसे में यह सवाल खडा होता है कि क्या सरकार झुग्गी वासियों को उजाड़ कर बेघर कर देना चाहती है.

Centre for Community Support and Social Development (CCSSD) द्वारा इंडिया हैबीटेट सेंटर में आयोजित “पुनर्वास की आपबीती एवं चर्चा” का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में पुनर्वास के दौरान लोगों को होने वाली बड़ी समस्यायों के अलावा पुनर्वास का असर युवाओं की शिक्षा एवं ज़िन्दगी पर पड़ने के अनुभव को बांटना था. 95 झुग्गी बस्तियों में स्कूल जाते बच्चों एवं युवाओं की संख्या एक लाख से ज्यादा होगी एवं पिछले अनुभव के आधार पर ऐसा लगता है कि अगर अभूतपूर्व पहल नहीं किए गए तो 90 % से अधिक बच्चों की पढाई ख़त्म हो जायगी. दिल्ली में पिछले 10-15 सालों में नवीनीकरण एवं कॉमनवेल्थ गेम के नाम पर लाखों परिवार को उजाड़ कर 11 पुनर्वास कालोनियां बसाई गईं. इस प्रक्रिया में युवाओं को किन-किन मुसीबतों का सामना करना पड़ा. उनकी पढाई किस प्रकार प्रभावित हुई. इन युवाओं का मक़सद ये था कि जो इन युवाओं पर बीती वो किसी और पर न बीते. उन्होंने अपनी भावना को अपनी जुबां में कुछ इस तरह रखा. पेश है पुनर्वास की कहानी हम पुनर्वासित युवाओं के ज़ुबानी…

महेश

महेश

मेरा नाम महेश है, मेरी उम्र 16 साल है. मैं बवाना में 9वीं क्लास में पढता हूँ. मेरी झुग्गी नवम्बर 2007 में अशोक विहार से तोड़ कर बवाना लाई गई एवं नहर के पास गन्दगी में लाकर छोड़ दिया गया. जब बस्ती उजाड़ी गई तब मैं 5 वीं क्लास में पढ़ता था और मेरी उम्र 10 साल थी. अगर मैं बवाना से अशोक विहार पढ़ने नहीं जाता तो मेरी पढ़ाई छूट जाती और मेरा एक साल बर्बाद हो जाता. एक साल की पढाई बचाने के लिए मैं रोज़ बवाना से अशोक विहार 25 किलोमीटर ट्रेन से आता जाता था. मेरे स्कूल का समय एक बजे से शाम के 6 बजे तक था. मुझे अशोक विहार से बवाना वापस जाने में बहुत परेशानी होती थी. इस तरह से मैं 2 साल तक स्कूल जाता रहा.

दो तीन बार ऐसा हुआ कि मेरी ट्रेन छूट गई तो मैं शाम में वापस जाकर स्कूल के पास वाले पार्क में सो गया. एक बार पैसे थे तो मैंने खा लिया और एक दो बार भूखे सोया. रात में जब हम वहां सोते तो अक्सर पुलिस वाले सबको मारते थे और वहां से भगा देते थे. एक बार उस इलाके में शादी में चोरी हुई थी तो पुलिस वाले ने एक रात मुझे चोर बोल कर ज़बरदस्ती पकड़ लिया और मुर्गा बना कर मुझे बहुत मारा और उस पार्क की सफाई भी करवाई. फिर मेरे पापा को बुलवाया गया. जब तक पापा नहीं आये तब तक मुझे मारते रहे. फिर मेरे पापा से पैसे लेकर मुझे छोड़ा. जब हमारी परीक्षा हो रही थी तब सुबह का स्कूल होता था और मुझे सुबह 5 बजे जाना होता था तब भी समय पर परीक्षा में नहीं पहुँच पाते थे, जिस जिस दिन परीक्षा थी उस उस दिन मैं पार्क में सोकर परीक्षा दिया. एक बार शाम में मेरी ट्रेन छूट गई. मेरी चाची जहाँगीर पुरी में रहती थी तो मैं उनके पास जाने लगा. रात बहुत हो गयी थी. प्राइवेट बस वाले ने रूट बदल दिया और मुझे भलस्वा गाँव के पास उतार दिया. मुझे बहुत डर लग रहा था. मैं पूछ-पूछ कर बहुत देर रात में चाची के घर पहुंचा.

एक बार की बात है मैं पिछली रात पार्क में सोया और स्कूल के बाद लौट रहा था मेरी हालत बहुत खराब थी. ट्रेन से वापस आते समय मुझे कुछ बदमाश लोग ने पकड़ लिया और मेरे बैग की ज़बरदस्ती तलाशी लेने लगे. मुझे जेबकतरा कहकर मारने लगे, मैंने कहा आगे नरेला स्टेशन है, वहां मेरे जानकार हैं पुछवा देता हूँ कि मैं जेबकतरा नहीं हूँ. वह मुझे जेबकतरा कहकर ट्रेन से बाहर फेंक रहे थे. मैं सब कुछ झेला, लेकिन मैंने अपनी पढाई बर्बाद होने नहीं दी. लेकिन मैं नहीं चाहता कि इस पुनर्वास में जो जो मेरे साथ हुआ वह किसी और के साथ हो.

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शालू

बेबी शालू

मेरा नाम बेबी शालू है मेरी उम्र 14 साल है और मैं अभी 7वीं कक्षा में पढ़ती हूँ. 2006 में मेरी झुग्गी सरस्वती विहार में तोड़ दी गई. झुग्गी परीक्षा के एक महीने पहले टूटी जिससे मैं परीक्षा भी नहीं दे पाई. हमलोगों को जानकारी मिली कि हमें नरेला में प्लाट मिलेगा तो हम लोग नरेला चले गए. वहां से सरस्वती विहार स्कूल जाना मुश्किल था क्योंकि मैं बहुत छोटी थी. वहां हम 2 साल रहे फिर हम लोगों को कहा गया कि बवाना  पुनर्वास कालोनी में प्लाट मिलेगा तो हम लोग बवाना आ गए. स्कूल में नाम लिखाने गए तो प्रिंसिपल ने प्रूफ मांगा जो हमारे पास नहीं था.  हमको प्लाट नहीं मिला था तो प्रूफ कहाँ से आता. जिस वजह से मेरा नाम नहीं लिखा और इस तरह मेरा एक साल और बर्बाद हो गया. फिर किसी तरह मैंने अपना दाखिला वहाँ के राना मॉडल स्कूल में कराया, लेकिन पैसे की कमी के कारण वहाँ से भी मेरा नाम कट गया. जब प्लाट मिल गया तब किसी तरह मेहनत कर के अपना नाम बवाना के सरकारी स्कूल में लिखवाया. जिस तरह मेरे तीन साल बर्बाद हुए मैं नहीं चाहती कि पुनर्वास के कारण दूसरे बच्चों की पढ़ाई बर्बाद हो.

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सूरज

सूरज

मेरा नाम सूरज है. मेरी झुग्गी 2007 में अशोक विहार में तोड़ दी गयी, तब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ता था. हम लोगों को बवाना में लाकर गड्ढे में रख दिया गया. बहुत जंगल था. हम लोग उसको साफ़ करके झुग्गी डाले. वहां पर बहुत मार-पीट होती थी. इसलिए डर भी बहुत लगता था. हमारी झुग्गी नवम्बर के महीने में तोड़ी गयी. अगर मैं पढ़ाई छोड़ता तो मेरा एक साल बर्बाद होता, इसलिए मैं रोज़ बवाना से अशोक विहार 25 किलीमीटर रेल गाड़ी से जाता था. ट्रेन से आने जाने में मुझे बहुत परेशानी होती. मेरी अक्सर ट्रेन में लड़ाई हो जाती थी. ट्रेन में बदमाश लोग मेरे बैगों की तलाशी लेते और हमें चोर कहकर कई बार मारे भी थे. जब मेरी ट्रेन छूट जाती तो मैं स्कूल के बगल वाले पार्क में जाकर सो जाता था. पैसे की कमी के कारण कई बार भूखा भी सोया. हम जब वहां सोते थे तो पुलिस वाले अक्सर हमें वहां से भगा देते थे. अशोक विहार में पेपर ख़त्म होने के बाद मैं दाखिला लेने बवाना के स्कूल में गया मेरा दाखिला नहीं लिया गया. वहाँ के एक टीचर ने कहा ” अरे तू तो अब बड़ा हो गया है जा कहीं काम कर ” मेरा एक साल कहीं नाम नहीं लिखा गया. फिर किसी तरह दो साल बाद वहां के प्राइवेट स्कूल में पैसा देकर नाम लिखवाया. जिसका मासिक फीस 1000  रूपये था. प्लाट मिलने के बाद मेरा नाम बवाना के सरकारी स्कूल में लिखा गया. इस तरह मेरा 2 साल बर्बाद हुआ.

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सुधा कुमारी

सुधा कुमारी

मेरा नाम सुधा कुमारी है. मैं बी. ए. फस्ट ईयर में पढ़ती हूँ. मेरी झुग्गी 2001 में जहाँगीर पुरी से टूटकर भलस्वा में पुनर्वास के लिए लाई गयी. उस वक्त मैं तीसरी क्लास में पढ़ती थी और मेरी उम्र 7 साल थी.  जहाँगीर पुरी से भलस्वा की दूरी 3 किलोमीटर होने के कारण सभी बच्चे बस से, साईकिल से या पैदल स्कूल जाते थे. मैं भी रोज़ बस से स्कूल जाती थी. एक दिन मैं बस स्टैंड पर बैठ कर खाने लगी तो मेरी बस निकल गई. मैं वहां एक घंटा बैठकर रोती रही, फिर मेरी पड़ोस वाली आंटी ने मुझे देखा तो मुझे साथ में वापस घर ले आई. एक बार मेरी बस छूट गई तो मैं पैदल आने लगी और मैं रास्ता खो गई. बड़ी मुश्किल से रोते-रोते आधा रास्ता पार की थी. मुझे नहीं मालूम था कि मैं सही जा रही हूँ या गलत… तभी हमारी कालोनी की बड़ी लड़कियों ने मुझे देखा और मुझे साथ घर ले आई. आज जब फिर पुनर्वास की बात हो रही है तो अगर आस-पास में पुनर्वास होता है तो बच्चे खुद ही स्कूल जा सकते हैं और पढाई को जारी रखा जा सकता है.

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अनुज

अनुज

मेरा नाम अनुज है. मेरी उम्र 16 वर्ष है. मैं कक्षा 9 में पढ़ता हूं एवं बवाना पुर्नवास कालोनी में रहता हूं. नवम्बर 2007 में हमारी झुग्गी बस्ती को अशोक विहार से हटा कर बवाना पुर्नवास कालोनी में पुर्नवास के लिए लाया गया. उस समय मेरी उम्र 10 साल थी और मैं 6ठी कक्षा में पढ़ता था. 2 साल तक हम लोग बवाना में सड़क के किनारे झुग्गी डाल कर प्लाट मिलने के इंतजार में रहे. हमारा नाम अशोक विहार के स्कूल में लिखा था. मेरे सामने यह सवाल था कि या तो अपनी पढ़ाई छोड़ो या 25 कि0 मी0 रोज़ आकर पढ़ो. अगर मैं पढ़ाई छोड़ता तो मेरा पूरा साल बर्बाद होता. उस एक साल को बचाने के लिए मैं रोज़ बवाना से अशोक विहार रेल गाड़ी से आता-जाता था. मेरे स्कूल का समय दोपहर एक बजे से शाम 6 बजे तक था. रोज शाम को मुझे रेल गाड़ी से घर आने में काफी दिक्कत होती थी. चार पांच बार तो मेरी ट्रेन भी छूट गई तब मैं रात में वहीं स्कूल के पास वाले पार्क में अपने दोस्तों के साथ सोया. पैसा नहीं होने के कारण कई बार मुझे भूखे पेट सोना पड़ा. एक बार ऐसा हुआ कि पुलिस वाले रात के समय मुझे वहां से भगा दिये तो मैं मार्केट में आकर सो गया. इसी तरह मैंने बड़ी मुश्किल से 2008 में 6ठी क्लास पास किया और अपना एक साल बर्बाद होने से बचा लिया. 2008 में मैं बवाना पुनर्वास कालोनी के स्कूल में नाम लिखवाने गया तो उन्होंने मुझसे रहने के पते का प्रमाण-पत्र और टीसी मांगा. टीसी तो मेरे पास थी लेकिन पुनर्वास का प्लाट अभी तक नहीं मिला था जिस कारण कोई प्रूफ नहीं था. हम तीन साल तक ऐसे ही सड़को पर पड़े रहे और इधर-उधर भटकते रहे. 2011 में जब पुनर्वास का पलाट मिला तब मेरा नाम 7 वीं क्लास में लिखा गया. अभी में 9वीं कलास में पढ़ता हूं. मुझे एक साल बचाने के लिए जिन-जिन परेशानियों का सामना करना पड़ा, मैं नहीं चाहता कि किसी और को उन परेशानियों का सामना करना पड़े. मैं नहीं चाहता कि जिस तरह मेरा 3 साल बर्बाद हुआ उस तरह किसी और की पढ़ाई बरबाद हो.

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सनी कुमार

सनी कुमार

मेरा नाम सनी कुमार है. मेरी उम्र 15 साल है और मैं बवाना पुनर्वास कालोनी में रहता हूँ. मेरी झुग्गी 2007 में अशोक विहार में तोड़ दी गयी. तब मैं तीसरी कक्षा में पढता था. जब झुग्गी तोड़ी गई तब नवम्बर का महीना था. अगर मैं तब पढाई छोड़ता तो मेरा एक साल बर्बाद हो जाता. इस एक साल को बचाने के लिए मैं रोज़ अपने दोस्तों के साथ बवाना से अशोक विहार ट्रेन से जाता था और जब कभी ट्रेन छूट जाती तो हम सब वहीं पार्क या मंदिर में सो जाते. वहां कई बार पुलिस वालों ने सोने के चक्कर में मुझे मारा भी था. रात भर पार्क में सोने के बाद जब स्कूल जाते तो वहाँ टीचर भी हमें गन्दा देख कर मारते थे. किसी तरह हमने तीसरी कक्षा पास की. जब बवाना के एक स्कूल में नाम लिखाने गये तो हमसे रहने के स्थान का सबूत माँगा. प्लाट तो मिला नहीं था तो सबूत भी नहीं था. मैं कई बार स्कूल गया लेकिन मेरा नाम नहीं लिखा गया. जब प्लाट मिल गया और नाम लिखने गए तो टीचर ने कहा अब तुम बड़े हो गए हो. घर वाले भी परेशान हो गए थे. मैं अब ट्युशन लेकर पढ़ना सीख रहा हूँ.

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गौतम

गौतम

मेरा नाम गौतम है. मैं भलस्वा पुनर्वास कालोनी में रहता हूँ. मैं 12वीं क्लास में पढता हूँ. मेरी झुग्गी 2000 में रोहिणी से टूटकर यहाँ आई, जब मैं पहली क्लास में पढता था. जब यहाँ आये तो कोई स्कूल नहीं था और आप पास कोई आबादी भी नहीं थी. हमने सोचा कि रोज़ रोहिणी जाकर पढाई करें, लेकिन तब मैं बहुत छोटा था और भलस्वा से कोई बस भी नहीं चलती थी कि अकेले चले जाएँ. एक साल बाद भलस्वा में टेंट का स्कूल शरू हुआ तो हमारा नाम भी उस स्कूल में पहली क्लास में फिर से लिखा गया. मेरा तो एक ही साल बर्बाद हुआ और हम टेंट वाले स्कूल में पढने लगे लेकिन वहां बहुत परेशानी थी. 2 साल बाद जब स्कूल बन गया तब थोड़ी परेशानी कम हुई.

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 सीता

सीता

मेरा नाम सीता है.  मेरी झुग्गी अशोक विहार से नवम्बर 2007 में हटाई गयी. तब मैं तीसरी क्लास में पढ़ती थी और मेरी उम्र 9 साल थी. हम लोगों को अशोक विहार से बवाना भेज दिया गया जहां प्लाट भी नहीं मिला था. साल के बीच में झुग्गी हटाने के कारण हमारी पढाई रुक रही थी,  लेकिन मैंने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी. सच तो यह है कि मेरे घर वाले भी चाहते थे कि मैं पढ़ाई जारी रखूं. इसलिए  मैं रोज़ 25 किलोमीटर वापस जाकर पढाई करने लगी. मेरे स्कूल का समय सुबह 8 बजे से 1 बजे तक था. मैं  लगातार एक महीना तक स्कूल गई, लेकिन जब सर्दी बढ़ने लगी और जब कोहरा बहुत होने लगा और सुबह-सुबह कोई बस भी नहीं चलती तो धीरे-धीरे मेरा स्कूल जाना बंद हो गया. और एक दिन मेरी पढ़ाई पूरी तरह से छूट गई. फिर  मैंने जब बवाना के स्कूल में नाम लिखाने की कोशिश की तो हमसे हमारे रहने के पते का प्रमाण-पत्र  माँगा गया. उस समय हमको प्लाट नहीं मिला था, इसलिए हमारे पास कोई प्रमाण-पत्र नहीं था, जिस कारण हमारा नाम स्कूल में नहीं लिखा गया. हालांकि मैं भी दूसरे बच्चों की तरह स्कूल जाना चाहती थी, पर कर भी क्या सकती थी. प्लाट मिलने के बाद हमारा नाम बवाना के स्कूल में 2009 में लिखा गया, तब तक मेरे तीन साल बर्बाद हो चूके थे.

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गुलफशा खान

गुलफशा खान

मेरा नाम गुलफशा खान है. मेरी उम्र 19 साल है. मैं बी.ए. सेकेन्ड इयर में पढ़ती हूं. भल्सवा पुर्नवास कालोनी में रहती हूं. फरवरी 2001 में हमारी झुग्गी बस्ती को निजामुदीन से हटा कर भल्सवा पुर्नवास कालोनी लाया गया. जब हमारी झुग्गी को हटाया गया उस समय मेरी उम्र 7 साल थी और मैं तीसरी कक्षा में पढ़ती थी. फरवरी में पुर्नवास होने के कारण मेरे सामने यह सवाल था कि या तो अपनी पढ़ाई छोड़ो या 35 कि0 मी0 रोज भल्सवा से निजामुदीन आकर पढ़ाई करो और परिक्षा दो. अगर मैं पढ़ाई छोड़ती तो मेरा पूरा साल बर्बाद होता. उस एक साल को बचाने के लिए मैं रोज़ सुबह 5 बजे भल्सवा से निजामुदीन बस से जाती थी. मुझे आने जाने में काफी दिक्कत होती थी. मेरे स्कूल का समय सुबह 8 बजे से दुपहर 1बजे तक था. इस तरह मैंने बड़ी मुश्किल से 2001 में तीसरी क्लास पास की और अपना एक साल बर्बाद होने से बचा लिया. लेकिन पुनर्वास की वजह से मेरे पिताजी का रोज़गार ठप हो चुका था. उनका दुकान बंद हो गया. हमें खाने के भी लाले पड़ गये थे. मजबूर होकर मेरे पिताजी ने हमें वापस गांव भेज दिया जिस कारण मेरी एक साल की पढाई बर्बाद हो गई. मैं बिलकुल नहीं चाहती कि जो मेरे साथ हुआ वह किसी और के साथ हो.

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तो यह थी कुछ पुनर्वासित युवाओं के कहानी उन्हीं के ज़ुबानी… इन सभी युवाओं की आपबीती पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए CCDDS के संयोजक सदरे आलम ने BeyondHeadlines को बताया कि यह तो सिर्फ चंद मिसाले हैं. दिल्ली के सभी पुनर्वास कालोनियों में तो ऐसे युवाओं की तादाद लाखों में है, जिसका भविष्य सरकार की इस पुनर्वास योजना ने युवाओं से छीन लिया है. अगर ज़िन्दगी को बेहतर बनाने काम नाम पुनर्वास है, तो ये कौन सा तरीका हैं जीवन को बेहतर बनाने का. उनके मुताबिक देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू है. अब सरकार को तय करना है कि वह कानून के साथ है या बाज़ार के साथ…

 

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