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माननीय भैंसे और तुच्छ इंसानी लाश…

Wajhi Khan for BeyondHeadlines

दोस्तों! यह सप्ताह तो पूरी तरह से उत्तर प्रदेश के एक मंत्री की भैंसो के नाम रहा… पूरे देश में रामपुर का नाम इन काली कलूटी भैंसो ने रौशन कर दिया! जो रामपुर कभी चाक़ू और रज़ा लाइब्रेरी की वजह से जाना जाता था, अब उसकी भैंसों की तुलना रानी विक्टोरिया तक से कर ली गयी!

कईयों ने कहा कि इस पर मानहानि का मुक़दमा होना चाहिए… लेकिन हमें यह समझ नहीं आ रहा कि मुक़दमा भैंसों को करना चाहिए या फिर रानी विक्टोरिया को? खैर छोड़िए! इस मुद्दे से बाद में निपट लिया जाएगा. और अगर आपको जल्दी है तो इस मुद्दे को अगले विधान सभा सत्र में ज़रूर लाया जायेगा…

शायद अंतर्राष्ट्रीय मीडिया हमारे जितना परिपक्व नहीं है और उन्हें इस ब्रेकिंग न्यूज़ के महत्त्व का पता नहीं था, वरना शायद रामपुर में अंग्रेजी बोलने वालों की चांदी हो जाती!

चलिए, हास परिहास तो होता ही रहेगा… यहां अब मैं आपका ध्यान एक बहुत ही संगीन मुद्दे पर लाना चाहता हूँ. इस भैंस काण्ड से दो दिन पहले स्थानीय अखबारो में एक ख़बर आई, जिसका शीर्षक था. ‘पुलिस जीप से फेंकी लाश, सनसनी’

इस ख़बर पर विस्तार से बात करते हैं. रामपुर के पटवाई थाना क्षेत्र में कुछ लोगों ने एक पुलिस जीप को एक अज्ञात लाश फेंकते हुए देखा और इसकी सूचना प्रशासन को दे दी गयी. उन लोगों ने उक्त जीप का नंबर भी नोट कर लिया था, जो कि मुरादाबाद ज़िले के मूंडा पांडे थाने से सम्बद्ध पाई गई.

उस अज्ञात लाश की पहचान मुरादाबाद के एक सुनार श्री सतेन्द्र कुमार रस्तोगी जी के रूप में हुई. जिनसे कथित तौर पर लगभग 12 लाख रूपए मूल्य का सोना चांदी लूट लिया गया.

यही रामपुर पुलिस जिसने कि भैंसों की रखवाली न कर सकने के कारण तीन पुलिस कर्मियों को निलम्बित कर दिया, मामले को दबाने में लग गई. अधिकारीयों ने भी आनन-फ़ानन में मामला मुरादाबाद को स्थान्तरित कर दिया, क्योंकि वहां पर गुमशुदगी कि प्राथमिकी दर्ज हो चुकी थी.

पुलिस द्वारा लाश फेंकने वाली कड़ी को इस बीच में कही गुम हो गयी. लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि किसी इंसान कि लाश के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार करने वाले पुलिस वालों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही होनी चाहिए? क्यों हमारे किसी राजनेता या मंत्री ने ऐसी घटना पर संज्ञान नहीं लिया? क्या डीएम और पुलिस अधीक्षक की ज़िम्मेदारी नहीं थी कि वो इस घटना कि पूरी जानकारी लेते और दोषियों के खिलाफ कार्यवाही करते?

हमारे राजकीय मानवाधिकार आयोग को क्या इस घटना पर संज्ञान लेने के लिए निमंत्रण चाहिए? क्या वीआईपी भैंसों की गुमशुदगी से एक इंसान के मरने और उसके मृत शरीर के साथ अमानवीय व्यवहार का मामला छोटा है? क्या हमारा मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी को अच्छे तरीके से निभा रहा है? क्यों ऐसी घटनाएं सिर्फ स्थानीय समाचारो में सिमट कर रह जाती हैं और राष्ट्रीय पटल पर भैसें सुर्खियां बटोरती हैं?

सच तो यह है कि हम ऐसे भ्रष्ट तंत्र मैं जी रहे हैं जिसकी कल्पना अगर हमारे स्वतंत्रता सेनानी कर लेते तो शायद वो जोखिम नहीं उठाते!

हमारी मांग है कि घटना की जांच एक उच्चाधिकारी समिति से करानी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए.

जय हिन्द!

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