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Reading: मुस्लिम अल्पसंख्यक राजनीति: समाधान ही समस्या?
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BeyondHeadlines > Edit/Op-Ed > मुस्लिम अल्पसंख्यक राजनीति: समाधान ही समस्या?
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मुस्लिम अल्पसंख्यक राजनीति: समाधान ही समस्या?

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published March 1, 2014 31 Views
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9 Min Read
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मुस्लिम समाज, सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ापन और प्रतिक्रिया

Meraj Ahmad for BeyondHeadlines

मुस्लिम समाज का सामाजिक-शैक्षणिक आधार पर पिछड़ापन आज किसी से छिपा नहीं है. धार्मिक और सांस्कृतिक आधार पर एकरूप समझा जाने वाला साम्प्रदाय आज मुख्यधारा में न के बराबर है. हालाकिं बहुतेरे लोग ‘मुख्यधारा’ के सिद्धांत से अधिक सहमत नहीं है- वे मानते हैं कि मुख्यधारा जैसी अवधारणा नहीं है, और मुख्यधारा में मौजूद संस्थाओं जैसी संस्थाएं- सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक- बना कर ‘मुख्यधारा-विशेष संस्कृति’ का निर्माण किया जा सकता है जिसमें विशेष भाषा, संस्कृति और परिधान पहचान विशेष का अंग हो सकेगा.

इन तर्कों में सबसे बड़ी समस्या ये है कि कोई भी साम्प्रदाय समाज में एकांत या अलगाव में नहीं रह सकता है. इसलिए, विशेषकर भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में साम्प्रदाय-विशेष-मुख्यधारा की परिकल्पना आधारहीन प्रतीत होती है. सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ापन दूर करने के प्रयासों पर एक नज़र डालता हुआ अगला लेख प्रस्तुत है.

सेक्युलर और आधुनिक शिक्षा का सवाल एक बड़ा सवाल है. ‘मदरसा-शिक्षा’ के नाम पर खूब सियासत हुई है. जहां एक तरफ मदरसा शिक्षा केन्द्रों में सरकार के हस्तक्षेप को पूरी तरह से रोकने की कोशिश हुई, वहीं दूसरी तरफ मदरसा ‘दीन’ को बचाए रखने का महकमा भी बताया गया. भगवा गिरोह ने जहां इसे ‘आतंकवाद का अड्डा’ बताया वहीं ‘माइनॉरिटी पॉलिटिक्स’ करने वाले हमदर्द नेताओं ने इसकी स्वायत्ता बचाकर ‘सेक्युलर’ होने का सबूत भी दे दिया.

इन दोनों ही स्थितियों ने मुस्लिम समाज को अनावश्यक ‘कम्युनल-आइडेंटिटी-पॉलिटिक्स’ की अनसुलझी राजनीति में उलझाने का काम किया. अंत में कुछ ‘माइनॉरिटी-ग्रांट’ ग्रांट देकर अपनी चुनावी वादे भी पूरे कर लिए गए. मुस्लिम समाज के पास आज लाखों छोटे-बड़े मदरसों के रूप में इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है. क्या इनका दीनी तालीम के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा के लिए इस्तेमाल करके तालीमी पिछड़ापन दूर नहीं किया जा सकता है? ये सवाल अब कौम को खुद से पूछना होगा.

भाषाई आधार पर मुस्लिम समाज के लिए भाषा-विशेष एक माध्यम हो सकती है, लेकिन पूरे सिस्टम में यदि देखा जाये तो विशेषकर उर्दू भाषा का कितना सामाजिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक तथा आर्थिक प्रभाव है? आज रोज़गार के अवसर सबसे ज्यादा किस भाषा में मिल सकते हैं? भाषा-विशेष पर सरकारी और गैर-सरकारी व्यय की ‘सोशल ऑडिटिंग’ संभवतः अब तक हमारे देश में नहीं हुई है. मुस्लिम समाज के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन को देखते हुए ये समझना होगा कि आखिर अब तक उर्दू भाषा, जो चुनाव के कुछ बड़े मुद्दों में से एक है, ने ‘कुल मुस्लिम’ समाज को कितना फ़ायदा पहुंचाया है.

साथ ही साथ ये भी समझना होगा कि आखिर मुस्लिम समाज का कौन सा तबका इसके कारण पिछड़ गया है. अनुभव के आधार पर देखा जाये तो अधिका-अधिक स्कूल और कालेजों में अब उर्दू के डिपार्टमेंट ख़त्म हो रहे हैं. भाषा की स्वतंत्रता एक अलग मुद्दा है, लेकिन भाषा-विशेष का धार्मिकी-करण कर किसी समुदाय-विशेष पर थोपना कहां तक उचित है? ऐसे में भाषा का वोटों के लिए राजनीतिकरण के पीछे की मंशा को भी देख जाना चाहिए.

तमाम हदों के बावजूद मुस्लिम समाज की लीडरशिप का सवाल एक जेन्युइन सवाल है. समावेशी सामाजिक प्रगति के लिए आवश्यक है कि लीडरशिप समुदाय के सारे वर्गों से निकल कर आये. सवाल धार्मिक नेताओं की लीडरशिप का भी है. मशहूर सहाफी ज़फर आगा की माने तो ‘मुस्लिम धार्मिक गुरु लीडरशिप नहीं दे सकते हैं… अब समय आ गया कि मुस्लिम समाज का आधुनिक और दूरगामी सोच वाला पढ़ा लिखा वर्ग लीडरशिप की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले’.

फिरकों में विभाजित धार्मिक लीडरशिप का राजनीति में दखल दो आधार होना मुनासिब नहीं है- पहला, राजनीतिक समझ के लिये आवश्यक है कि अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, कानून, समाजशास्त्र इत्यादि की गहन समझ हो ताकि सरकारों से मुख्यधारा के मुद्दों पर सीधी चर्चा संभव हो सके; और दूसरा, धर्म का राजनीति में हस्तक्षेप को पूरी तरह से रोका जा सके.

जहां तक सरकारी सेवाओं के प्रतिनिधित्त्व का सवाल है, कई राज्यों में आरक्षण की व्यवस्था पहले से रही है (उदहारण के तौर से केरला, तमिलनाडु इत्यादि). मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू हो जाने के बाद ओ.बी.सी. मुस्लिम समाज को केंद्र की शिक्षण संस्थानों और सेवाओं में आरक्षण के प्रावधान रखे गए लेकिन कुल प्रतिशत आज भी बहुत कम है (सच्चर कमिटी के अनुसार).

चूंकि सामाजिक न्याय का मुद्दा राजनीतिक भी है, इसलिए 2012 के चुनावों से ठीक पहले आरक्षण की घोषणा वोट बैंक को मज़बूत करने के लिए हुई लेकिन आधार धार्मिक ही रहा. उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में जहां केंद्र सरकार ने 4.5% रिजर्वेशन की घोषणा की वही उत्तर प्रदेश में 18% मुस्लिम रिजर्वेशन देने की घोषणा हुई. अंत में इन दोनों घोषणाओं का पालन नहीं हो सका.

यह समझना होगा कि 4.5% रिजर्वेशन संविधान सम्मत साबित नहीं हुआ है. 4.5% रिजर्वेशन 27% ओ.बी.सी. कोटा के अन्दर ‘माइनॉरिटी-रिजर्वेशन’ था, जिसे आन्ध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया, और बाद में सर्वोच्च न्यायलय ने इस निर्णय पर अपनी मुहर लगा दी. “4.5% माइनॉरिटी-रिजर्वेशन” की संकल्पना के विषय में कोर्ट ने कहा कि ओ.बी.सी. कोटा के तहत माइनॉरिटी कोटा “intelligble differentia” पर आधारित नहीं है. इसके अतिरिक्त, बेंच के समक्ष ‘माइनॉरिटी को एक समावेशी समाज के रूप वर्गीकरण’ करने का साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया, और इस विषय में तार्किकता तथा डाटा का भी अभाव रहा.

दरअसल समस्या ‘4.5% माइनॉरिटी रिजर्वेशन’ की संकल्पना में ही है. यहां माइनॉरिटी शब्द का अर्थ वही है जो सेक्शन 2 (c), National Commission for Minority Act, 1992 में उल्लिखित है, जिसका अर्थ है धर्म के आधार पर कुछ अल्पसंख्यक समुदाय…

मुस्लिम आरक्षण के विषय में सबसे अधिक बहस का कारण यही शब्द है. जहां एक तरफ यह शब्द अंतर्विरोध को सामने नहीं लाता वहीं दूसरी तरफ साम्प्रदायिकता के चारे के रूप में भी इस्तेमाल होता है. दूसरी अहम बात ये भी है कि ‘माइनॉरिटी’ शब्द सामाजिक न्याय की संकल्पना के खिलाफ उठ खड़ा होता है. मुस्लिम समाज एक एकांगी समाज नहीं है, और वर्ग अंतर स्पष्ट है. इसलिए ‘माइनॉरिटी शब्द सारे मुस्लिम साम्प्रदाय के लिए उचित नहीं है.

अब सवाल यही है कि इतने सारे अंतर-विरोधों के बावजूद ‘4.5% माइनॉरिटी-रिजर्वेशन’ का खेल क्यों खेला गया? और यदि ये प्रावधान लागू नहीं हो पाया तो इसके लिए मुस्लिम लीडरशिप की तरफ से अब तक क्या ठोस पहल की गयी? उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले 18% रिजर्वेशन की घोषणा की गयी जिसका आज तक पालन नहीं हो सका है. कारण वही हैं- धर्म के आधार पर रिजर्वेशन संभव नहीं है. यदि वास्तव में ऐसा है तो चुनावी वादे किस आधार पर किये गए?

अल्पसंख्यक राजनीति का चरित्र साबित करता है कि पहले असमानता, असुरक्षा की भावना तथा आर्थिक पिछड़ापन पनपाया भी गया और पनपने भी दिया गया. अंत में इसे दूर करने का खोखला प्रयास कर वोट बटोरा गया. अब ऐसा लगने लगा है कि मुख्यधारा और समावेशी विकास के मुद्दे कहीं न कहीं छूट से गए हैं. वर्तमान समय और स्थिति को देखते हुए कहा जा सकता है कि समाधान और समस्या में कोई पारस्परिक तारतम्यता नहीं है जिसका प्रमुख कारण खोखली अल्पसंख्यक राजनीति.

(लेखक जे.एन.यू. में शोध छात्र हैं. इनसे  merajahmad1984@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.)

पहली किस्त :   मुस्लिम बस्तिकरण:  एक समस्या?

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