Edit/Op-Ed

पैग़म्बर की तौहीन पर हिंसा करने का हक़ आपको किसने दिया?

Afroz Alam Sahil for BeyondHeadlines

पेरिस की आंतकी घटना के बाद पूरी दुनिया में उथल-पुथल मची हुई है. सोशल मीडिया पर लोग इस्लाम को अलग-अलग तरीकों से परिभाषित व इसकी चर्चा कर रहे हैं…

यह चर्चा फ्रांस के एक साप्ताहिक पत्रिका ‘शार्ली एब्दो’ में हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) की कार्टून छपने के बाद उस अखबार के दफ्तर पर हुए आतंकी हमले से हो रही है. इस हमले में अखबार के संपादक समेत 12 लोगों की जान गई. दूसरे दिन फ्रांस के लियॉन शहर में एक मस्जिद के पास विस्फोट की भी खबर आई. हालांकि इस हमले में किसी के हताहत होने की कोई खबर नहीं थी. प्रशासन द्वारा यह भी जांच की जा रही है कि यह एक आतंकी हमला था या कुछ और.

बताया जा रहा है कि हमलावर मैगजीन में छपे पैगम्बर मुहम्मद के कार्टून से नाराज़ थे. पुलिस का दावा है कि घटनास्थल पर हमलावरों ने ‘हमने पैगम्बर का बदला ले लिया’ जैसे नारे लगाए.

हम आपको बताते चलें कि ‘शार्ली एब्दो’ एक व्यंग्यात्मक मैगजीन है. और साल 2012 में भी यह मैगजीन पैगम्बर मुहम्मद का कार्टून बनाने की वजह से चर्चा में रही थी. हाल ही में मैगजीन ने आतंकी संगठन आईएस के चीफ अबु बकर अल-बगदादी का भी कार्टून छापा था. इससे पूर्व यह मैगज़ीन ईसा मसीह, ईसाइयत और फ्रांस के नेताओं पर भी व्यंग्य कर चुकी है.

दरअसल, इस घटना को समझने के लिए पूर्व की घटनाओं पर भी नज़र डालनी होगी. हमें उस दिन को भी याद करना होगा, जब सलमान रश्दी ने 1989 में अपने उपन्यास The Satanic Verses में इस्लामी पवित्रता को चिढ़ाया था तो अयातुल्लाह खुमैनी ने रश्दी सहित इस पुस्तक के प्रकाशन से जुडे सभी लोगों के विरुद्ध मृत्यदंड का फतवा जारी किया था. साथ ही पश्चिम को भी चेताया कि हम पैगम्बर का अपमान नहीं करते और आप भी ऐसा नहीं कर सकते. इसके साथ ही एक रुझान आरम्भ हो गया कि पश्चिम में जो भी इस्लाम विरोधी दिखे, उसकी निंदा की जानी चाहिये और यह आज तक चल रहा है.

दूसरी तरफ पश्चिम ने भी मुसलमानों को चिढ़ाने का काम किया. एक समाचार पत्र सम्पादक फ्लेमिंग रोज ने द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात डेनमार्क के लिये सबसे बड़ा संकट खडा करते हुए मुहम्मद के बारह कार्टून प्रकाशित किये. फ्लोरिडा के पादरी टेरी जोंस ने अफगानिस्तान में अमेरिकी कमांडरों में भय उत्पन्न करते हुए कुरान को जलाने की धमकी दे डाली. नकोला बासेले नकोला और उनके मित्रों ने Innocence of Muslims के वीडियो द्वारा मिस्र के साथ अमेरिका के कूटनीतिक सम्बन्धों के लिये संकट खडा कर दिया.  और अब Charlie Hebdo ने पैग़म्बर मुहम्मद के भोंडे चित्र प्रकाशित कर फ्रांस की सरकार को विवश कर दिया कि वह बीस देशों में अपने दूतावास अस्थाई रूप से बन्द कर दे. इसी प्रकार जर्मनी की व्यंग्य पत्रिका Titanic ने भी मुहम्मद पर इसी प्रकार आक्रमण की योजना बनाकर जर्मनी के दूतावासों को भी बंद करने को विवश कर दिया था.

यानी ऐसी कोशिशें लगातार होती रहीं और हम अपने सारे मसले-मसायल भूलकर इनका विरोध करते रहें. हमने कभी भी यह समझने की कोशिश नहीं की कि आखिर ये सब क्यों हो रहा है? किसने यह आग धधकाई है, जो मासूम जिंदगियों को जाया कर रही है? कौन है वो लोग जो इन घटनाओं की कीमत चुका रहे हैं और वो कौन है जो इनसे भी फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं?

इन तमाम सवालों के जवाब तलाशने से पहले एक नज़र उन घटनाओं व बयानों पर भी डालते है, जो Innocence of Muslims फिल्म के विरोध के समय आई थी…

उस समय काहिरा की अल-अजहर यूनीवर्सिटी के ईमाम शैख अहमद-अल-तय्यब ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून को लिखे पत्र में कहा था, ‘दुनिया की शांति व्यवस्था को भंग करने का प्रयास करने वाले लोगों के खिलाफ हुई हिंसा के बाद अब संयुक्त राष्ट्र को मुसलमानों के धार्मिक प्रतीकों पर हमलों के खिलाफ़ प्रस्ताव लाना चाहिए. इस्लाम या किसी भी धर्म के प्रतीकों पर होने वाले हमलों को अपराध घोषित किया जाना चाहिए.’ लेकिन ज़रा सोचिए कि अब तक ऐसा कुछ हुआ क्या?

इस्लाम की जन्मभूमी सऊदी अरब के सर्वोच्च मुफ्ती शैख अब्दुल अजीज बिन अब्दुल्लाह अल शैख ने अमेरिकी राजनयिकों और दूतावासों पर हुए हमलों की आलोचना करते हुए शनिवार को सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से पैगंबरों के अपमान को अपराध क़रार देने की मांग की थी. शैख अब्दुल अजीज ने कहा था, ‘गुनाहगारों के गुनाहों की सजा बेगुनाहों को देना, उन पर हमला करना जिन्हें जान-माल की सुरक्षा दी गई हो, सार्वजनिक इमारतों को आग लगाना या हिंसा करना भी जुर्म है. अगर बेहूदा फिल्म बनाना और पैगम्बर का अपमान करना अपराध है तो बेगुनाह राजनयिकों पर हमला करना भी इस्लाम का बिगड़ा हुआ रूप है, अल्लाह को ऐसी हरकतें पसंद नहीं.’ पर ज़रा सोचिए! क्या हमने इस पर अमल किया. शायद नहीं, अगर करते तो पेरिस में  दर्जनों ‘बेगुनाहों’ की जान नहीं गई होती.

और एक नज़र इस ख़बर पर भी – यमन की राजधानी साना स्थित अमेरिकी दूतावास के बाहर हुए प्रदर्शन के दौरान सुरक्षाबलों की गोली का शिकार हुए 19 वर्षीय नौजवान मुहम्मद अल तुवैती को शनिवार को दूतावास के ही नजदीक सुपुर्दे खाक किया गया. जनाजें के साथ चल रही भीड़ ने नारे लगाए, ‘अल्लाह के सिवा कोई खुदा नहीं, शहीद अल्लाह को प्यारे हैं.’ जनाजे के साथ तुवैती की एक बड़ी फोटो भी ले जाई जा रही थी जिस पर लिखा था- ‘शहीद मुहम्मद-अल-तुवैती’…

ये घटनाएं एक यूट्यूब क्लिप की प्रतिक्रियाएं थी. अमेरिका में बनी एक फिल्म में पैगंबर-ए-इस्लाम के बारे में वो बातें कही गईं, जिन्हें शायद ही दुनिया का कोई भी मुसलमान बर्दाश्त कर पाए.

मैंने भी यह वीडियो देखा था. जब आप पहली बार इस वीडियो को देखते हैं तो आपका खून खौलता है, सवाल उठता है कि कोई पैगंबर-ए-इस्लाम के बारे में ऐसा दिखाने या सोचने की हिम्मत कैसे कर सकता है? लेकिन जब आप वीडियो को दोबारा देखते हैं तो साफ़ जाहिर हो जाता है कि इस वीडियो का उद्देश्य ही लोगों की भावनाएं भड़काना था. जैसा इस बार कार्टून का उद्देश्य था.

आगे बढ़ने से पहले एक सवाल मैं आपसे पूछता हूं कि उस समय करोड़ों की संख्या में पैगम्बर की तौहीन वाली वीडियो देखने वाले किस धर्म के थे? या इस समय एक मामूली कार्टूनिस्ट को किसने पूरी दुनिया में प्रसिद्ध कर दिया? और ज़रा सोचिए! वीडियो बनाने वाला ज्यादा बड़ा गुनाहगार है या फिर उसे लोगों को पहुंचाने वाले? कार्टून बनाने वाला ज्यादा बड़ा गुनाहगार है या फिर उसे वाट्सअप के ज़रिए लोगों को पहुंचाने वाले? यदि यह वीडियो या कार्टून अब से दस साल पहले बना होता तो शायद ही लोगों तो पहुंच पाता या उसका यह असर हुआ होता. लेकिन यह वीडियो या कार्टून उस युग में बना है जब अलास्का के बर्फीले इलाके की सर्दी को दिल्ली की गर्मी में महसूस किया जा सकता है. ये इंटरनेट का युग है. यहां सूचनाएं भूकंप से भी तेज़ दौड़ती हैं.

ऐसे में इस युग में अब यह बहस होना चाहिए कि ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर जब जान-बूझ कर नफ़रत फैलाई जाए तो उस पर प्रतिक्रियाएं कैसे दी जाएं? लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह उठता है कि ऐसी चीज़ों पर प्रतिक्रिया ही क्यों दी जाए? जिम्मेदारी से जवाब क्यों न दिया जाए?

पैगम्बर पर बनी इस कार्टून पर हुई हिंसक प्रतिक्रियाओं में जिंदगियों के जाया होने पर मुझे अपने बचपन की याद आ रही है. सर्दियों की रात में सोने से पहले अम्मी पैगम्बर साहब की जिंदगी के कुछ किस्से सुनाती थी. एक किस्सा आज भी ज़ेहन में ताजा है. अम्मी बताती थी कि आप (ज्यादातर मुसलमान पैगम्बर मुहम्मद साबह को आप कहकर संबोधित करते हैं…) जिस रास्ते से गुजरते थे उस रास्ते पर एक बुढ़िया रोज़ कांटे बिछा देती या फिर ऊपर से गंदगी फेंक देती. आप कांटे हटाते, अपने कपड़े साफ करते और गुज़र जाते. यह सिलसिला महीनों तक चलता रहा. एक दिन उस बुढ़िया ने न कांटे ही बिछाए और न गंदगी ही फेंकी. आप यह देखकर हैरान हुए और उस बुढ़िया का हाल-चाल पूछने उसके घर पहुंचे. देखा तो वो बीमार थी. आप ने हाल-चाल पूछा और उसकी तबियत ठीक होने की दुआ की. इस घटना का उस बुढ़िया पर ऐसा प्रभाव हुआ कि वो भी पैगंबर की सच्चे दिल से सम्मान करने लगी.

अम्मी द्वारा बचपन में कई बार सुनाई गए इस वाक्ये का इस्लाम की हदीसों में भी जिक्र होगा. हदीस जब कहानी का हिस्सा बनती हैं तो जाहिर से उसमें कुछ तब्दीली भी हो जाती है. जो अम्मी ने बताया असल वाक्या उससे कुछ अलग हो. वाक्या अलग हो सकता है, लेकिन उसका सार यही है कि पैगम्बर ने खुद पर कीचड़ फेंकने वाली बुढ़िया पर गुस्सा जाहिर करने के बजाए अपने व्यावहार से उसका भी दिल जीत लिया. न कीचड़ फेंके जाने से उन्होंने रास्ता बदला और न ही कभी कोई प्रतिक्रिया दी. बस खामोशी से गुज़रते रहे.

जब पैगंबर-ए-इस्लाम ने खुद अपने ऊपर कीचड़ उछलने वाली बुढ़िया को जवाब नहीं दिया, उसके प्रति हिंसा या गर्म शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया, तो फिर अब उनकी तौहीन किए जाने पर हिंसक प्रतिक्रिया करने का अधिकार मुसलमानों को किसने दे दिया? वो प्रतिक्रियाएं अपने तौर-तरीके से क्यों दे रहे हैं. जब पूरी घटना के साथ पैगंबर-ए इस्लाम का नाम जुड़ा है तो फिर इसका जवाब उनके लहजे में क्यों नहीं दिया जा रहा है?

अगर आप यह लेख पढ़ रहे हैं या फिर पैगम्बर के अपमान या कुरान के अपमान की कोई भी ख़बर पढ़ रहे हैं तो कुछ भी सोचने से पहले यह ज़रूर सोच लीजिएगा कि यदि पैगम्बर के सामने ऐसे हालात आए होते तो उन्होंने क्या किया होता? अगर आपने एक बार भी ऐसा सोच लिया तो तमाम बातों का जवाब मिल जाएगा.

चलते-चलते एक काम और आपके ज़िम्मे करता चलूं… ज़रा मेरठ के लोगों को मालूम किजिएगा कि हाजी याकूब कुरैशी ने मंत्री रहते हुए उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के लिए क्या किया? काश! उन्होंने 51 करोड़ मेरठ के मुसलमानों की बदहाली दूर करने में खर्च किया होता…

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