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आरएसएस के सामने मोदी की उठक-बैठक के मायने

BeyondHeadlines Editorial Desk

शिक्षक दिवस पर बच्चों की क्लास लेने के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सीधे अपने गुरुओं के पास पहुँचे.

एक आस्थावान छात्र की तरह उन्होंने अपना रिपोर्ट कार्ड पेश किया.

गुरुओं ने भी अपनी प्रसन्नता ज़ाहिर की. मीडिया ने वाह-वाह करने का धर्म निभाया.

लेकिन इस पूरे कर्मकांड में संविधान की जो धज्जियां उड़ी उनकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया.

अपने आप को सिर्फ़ संविधान के प्रति ज़िम्मेदार बताने वाले और धर्म-निर्पेक्षता के सिद्धांत के लिए काम करने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कट्टर हिंदुत्ववादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अपने गुरुओं के सामने उठक-बैठक की और कहा कि मुझे स्वयंसेवक होने पर गर्व है.

मोदी के स्वयंसेवक होने और भारत का प्रधानमंत्री होने के बीच जो हितों का टकराव है वह भारत की दूसरी सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी यानी मुसलमानों के लिए घातक है.

एक स्वयंसेवक के तौर पर वे आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित हैं जो खुले तौर पर मुस्लिम विरोधी है.

Indian-muslim

भारत के मुसलमानों के सरकार के भेदभावपूर्ण रवैये के बावजूद भारत के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करते रहना होगा.

आरएसएस मुस्लिम विरोधी है ये साबित करने के लिए आरएसएस के स्वयंसेवकों के डीएनए टेस्ट की ज़रूरत नहीं है बल्कि सार्वजनिक रूप से दिए गए उनके बयान ही काफ़ी हैं.

भारत के निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की ज़िम्मेदारी भारत के मुसलमानों के प्रति भी उतनी ही है जितनी की हिंदुओं या किसी और धार्मिक समूह के प्रति है.

और भारत के अल्पसंख्यकों का विकास भी सरकार की नीतियों पर निर्भर है.

ऐसे में यदि भारत का प्रधानमंत्री एक गौरवान्वित स्वयंसेवक के तौर पर फ़ैसले लेगा तो वो देश के सभी धार्मिक समूहों के प्रति न्याय नहीं कर पाएगा.

यानी वो अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी का निर्वाह नहीं कर पाएगा.

नरेंद्र मोदी की पेशी के बाद आरएसएस की ओर से कहा गया कि स्वयंसेवक भारत के नागरिक हैं और वो सरकार से हिसाब ले सकते हैं.

उनके इस तर्क़ को जायज़ मानते हुए यह कहा जा सकता है कि भारत के मुसलमान और सिख तथा ईसाई भी भारत के नागरिक हैं और अब नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के मंत्रियों को  इन धार्मिक समूहों के प्रतिनिधियों के सामने भी पेश होना चाहिए.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नीतियां खुले तौर पर मुस्लिम विरोधी हैं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नीतियां खुले तौर पर मुस्लिम विरोधी हैं.

लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे. ऐसा करके भारत में ग़हरी होती धार्मिक मतभेदों की खाई में थोड़ी मिट्टी पड़ जाएगी जो धार्मिक विद्वेष को बढ़ाने के लिए काम कर रहे संगठनों को कभी गवारा नहीं होगी.

नरेंद्र मोदी सरकार के आरएसएस के सामने पेश होना धार्मिक भेदभाव का स्पष्ट प्रमाण है.

यही वजह है कि मोदी सरकार में भारत की 14.2 प्रतिशत आबादी यानी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व ना के बराबर है. ना मुसलमान सरकार में हैं और न ही प्रशासन में.

मोदी सरकार का भविष्य में कामकाज कैसा होगा इसके लिए आरएसएस ने इनपुट भी दिए हैं.

जिसका साफ़ मतलब यही है कि आने वाले समय में मुसलमानों के लिए हालात और ख़राब होंगे.

तो मुसलमान क्या करें. सीधा सा जवाब यह है कि उन्हें अपने व्यक्तिगत और सामाजिक प्रयासों के ज़रिए ही शिक्षा, नौकरियों और सरकारी संस्थानों में अपनी पहुँच और पकड़ बनानी होगी.

यानी अब मुसलमानों को पहले से बेहतर प्रयास करने की ज़रूरत है.

वरना हिंदू जातिवादी व्यवस्था के सबसे निचले क्रम यानी दलितों से भी बदतर जीवन जी रहे भारतीय मुसमलानों के लिए हालात बेहद मुश्किल हो जाएंगे.

भारतीय मुसलमानों को ये भी समझना होगा कि उनके हित भारत के हितों में ही निहित हैं. इसलिए सरकार के भेदभावपूर्व रवैये के बावजूद उन्हें अपनी जन्मभूमि के प्रति अपनी तमाम ज़िम्मेदारियों को पूरा करते रहना होगा. बिना ये सोचे कि उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है.

शोषण और भेदभाव जहां अवसाद और निराशा की वजह होता है वहीं ये एक क़ौम की कमज़ोरियों को उजागर उसके लिए सुधार का एक बेहतरीन मौक़ा भी होता है.

ये मुसलमानों को तय करना है कि वे इससे निराश होते हैं या इसे अपने हालातों में सुधार के मौक़े में तब्दील करते हैं.

और वक़्त की ज़रूरत सुधार ही हैं. प्रधानमंत्री मुसलमानों के पास नहीं आएंगे. मुसलमानों को ही उनके पास जाना होगा.

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