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BeyondHeadlines > बियॉंडहेडलाइन्स हिन्दी > हर पिता ऐसा क्यों नहीं होता ?
बियॉंडहेडलाइन्स हिन्दी

हर पिता ऐसा क्यों नहीं होता ?

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published June 22, 2016 20 Views
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4 Min Read
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Nikhat Perween for BeyondHeadlines

रमज़ान की वजह से आज कल ऑफिस से छुट्टी जल्दी मिल जाती है. इसका सबसे बड़ा फ़ायदा यह होता है कि मेट्रो में भीड़ थोड़ी कम मिलती है. बैठने के लिए भले ही जगह न मिले, लेकिन ठीक ढंग से खड़े रहने के लिए जगह आराम से मिल जाती है.

उस दिन घर जाने के लिए जैसे ही मेट्रो में दाखिल हुई, दूर तक मेट्रो के लोग दिखाई दे रहे थे, क्योंकि भीड़ काफी कम थी. मैं जिस सीट के पास जाकर खड़ी हुई, वहां सामने वाली सीट पर एक परी बैठी थी.

हाँ! 7 साल की एक छोटी सी मासूम परी… पिंक और व्हाईट रंग के फ्रॉक में अपने प्यारे और छोटे हाथों में ब्लू कलर का पर्स लिए हुए वो प्यारी परी अपने पापा के साथ बैठी थी. इतनी प्यारी कि उससे मेरी नज़र ही नहीं हट रही थी.

जितनी प्यारी वो थी उतनी ही प्यारी उसकी आवाज़ भी, जो मैंने तब सुनी जब उसने कहा –‘पापा! हमारा स्टेशन कब आएगा? बोलो न पापा… बताओ न पापा’ और उसके पापा ने प्यार से जवाब दिया –‘बस कुछ स्टेशन के बाद आएगा बेटा, आ जाएगा.’

इतने में अगले स्टेशन पर एक बुर्जुग आंटी हमारी कोच में आईं. उन्हें देखकर उस प्यारी परी के पापा ने अपनी सीट उन्हें दे दी. जैसे ही वो खड़े हुए उस छुटकी ने भी अपनी सीट छोड़ दी. अपने पापा का हाथ पकड़ कर खड़ी हो गई और मुस्कुराते हुए कहने लगी –‘मैं भी आपके साथ खड़ी रहुंगी, मुझे नहीं बैठना.’

तब उस आंटी ने कहा –‘अरे बैठ जा बीटिया! नहीं तो भीड़ में परेशान हो जाएगी.’ उसके पापा ने भी कहा –‘बैठ जाओ, वरना तुम्हारे पैर में दर्द हो जाएगा.’ लेकिन वो किसी की कहां सुनने वाली थी. पापा की लाडली खड़ी ही रही.

खैर कुछ ही देर बाद जब उसका स्टेशन आया तो उसके पापा ने कहा –‘चलो उधर चलो, अब उतरना है.’ और मुस्कुराते हुए उसने पापा का हाथ थामा और चल दी.

हाँ! वो चली गई, लेकिन उसकी मासूमीयत और उसके पिता का प्यार देख कर मुझे यक़ीन नहीं आ रहा था कि ये उसी देश में रहने वाला पिता हैं, जहां हर साल न जाने कितनी बेटियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है.

इसी सोच में मुझे संयुक्त राष्ट्र के विश्व जनसंखया कोष (World Population Fund) की वो रिपोर्ट याद आई, जो बताती है कि हमारे देश में पिछले 20 सालों में लगभग 10 करोड़ लड़कीयों को गर्भ में ही मार दिया गया. इसलिए नहीं कि उन्होंने दुनिया में आने से पहले अपने माता-पिता को कोई नुक़सान पहुंचाया था, बल्कि इसलिए कि वो सबकी सब लड़कीयां थी और मुमकिन है  कि उनके जन्म लेने के बाद माँ-बाप का बहुत बड़ा नुक़सान होता.

हालांकि उस नुक़सान की परिभाषा क्या है. ये आज तक कोई बता नहीं पाया. लेकिन इसी देश में उस प्यारी लड़की के पिता जैसे भी लोग रहते हैं, जिनके लिए बेटियां बोझ नहीं, बल्कि उनका अभिमान होती हैं. जो बेटियों संग रहने को, हंसने मुसकुराने को अपना दुर्भागय नहीं, सौभाग्य समझते हैं.

पर हर पिता ऐसा क्यों नहीं होता या हो सकता है? और अगर हो जाए तो शायद फिर कभी किसी अनाथालय, अस्पताल, नदी, नाले, तालाब, में किसी लाडली को बेसहारा और लाचार हालात में नहीं पाया जाएगा और न ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी योजनाओं की देश को ज़रुरत पड़ेगी.

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