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काश, हमारे पीएम मोदी किसानों के साथ दग़ाबाज़ी से बाज़ आते…

अफ़रोज़ आलम साहिल, BeyondHeadlines

बुधवार को पीएम मोदी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए 600 से अधिक ज़िलों के किसानों से बातचीत करते हुए कहा कि उनकी सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को पाने के लिए कृषि क्षेत्र का बजट दोगुना कर दिया है. 2018-19 के बजट में किसानों को उनकी लागत के 150 प्रतिशत के समतुल्य क़ीमत दिलाने के लिए क़दम उठाए गए हैं.

लेकिन जब BeyondHeadlines के इस संवाददाता ने कृषि मंत्रालय के बजट संबंधी दस्तावेज़ों की पड़ताल की तो हक़ीक़त कुछ और ही नज़र आ रहा है.

किसानों से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण स्कीमों के बजट को ख़त्म कर दिया गया है, वहीं कुछ स्कीमों के बजट को काफ़ी कम किया गया, जिसका असर सीधे ग़रीब किसानों पर पड़ेगा.

बाज़ार हस्तक्षेप योजना और मूल्य सहायता योजना यानी Market Intervention Scheme and Price Support Scheme को पूर्व के यूपीए सरकार ने 2010-11 में शुरू किया गया. कृषि एवं सहयोग विभाग की इस स्कीम के तहत ऐसी कृषि एवं बाग़वानी जिंसों को खरीदने के लिए बाज़ार हस्‍तक्षेप योजना लागू किया गया, जो आमतौर पर जल्‍द ख़राब हो जाती हैं. इस स्कीम का असल मक़सद उत्‍पादन की भरमार हो जाने अथवा क़ीमतों में गिरावट की स्थिति आने पर किसानों को वाजिब मूल्‍य सुनिश्चित करना था.

वर्तमान बजट में भी सरकार ने कहा है कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलना चाहिए और इसकी व्यवस्था की जाएगी. लेकिन Market Intervention Scheme and Price Support Scheme जैसे स्कीम का बजट घटा दिया गया है. साल 2017-18 में इस स्कीम के लिए 950  करोड़ का बजट प्रस्तावित था, लेकिन साल 2018-19 के बजट में इसे 200 करोड़ कर दिया गया है.

इतना ही नहीं, अग्रीकल्चरल फाईनेंसियल इंस्टीट्यूशन के बजट में भी काफ़ी कटौती की गई है. साल 2017-18 में 14335.02 करोड़ का बजट प्रस्तावित था. इस साल 2018-19 में इसे 13589.83 करोड़ कर दिया गया है यानी 746.02 करोड़ की कटौती की गई है.

कृषि मंत्रालय के इकोनॉमिकल सर्विस के तहत आने वाले Co-operation का बजट भी 197 करोड़ से 117 करोड़ कर दिया गया है.

वहीं कृषि मंत्रालय के Debenture of State Land Development Banks और Diesel Subsidy in Drought and Deficit Rainfall Affected Areas जैसे स्कीम के लिए इस बार कोई बजट आवंटित नहीं किया गया है. बरसाती इलाक़ों के किसानों को अब डिजल सब्सिडी का लाभ नहीं मिल सकेगा.

इस बजट में ‘ऑपरेशन ग्रीन’ का काफ़ी ज़ोर-शोर से प्रचार किया गया, लेकिन हक़ीक़त यह है कि ‘ऑपरेशन ग्रीन’ के तहत आने वाली तमाम स्कीमें पहले ही मौजूद थीं.

इस ‘ऑपरेशन ग्रीन’ के तहत आने वाले ‘Sub- Mission on Seed and Planting Material’ स्कीम का बजट पिछले साल के मुक़ाबले 480 करोड़ से कम करके 332 करोड़ कर दिया गया है. वहीं Integrated Scheme on Agricultural Cooperation का भी बजट 230 करोड़ से 130 करोड़ कर दिया गया है.

इसी ‘ऑपरेशन ग्रीन’ के तहत आने वाले ‘नेशनल प्रोजेक्ट ऑन ऑर्गेनिक फार्मिंग’ की कहानी भी ऐसी ही है. पिछले साल की तुलना में इसका बजट 10.10  करोड़ से  8.10 करोड़ कर दिया गया है. जबकि अरूण जेटली ने अपने भाषण में कहा कि —‘ऑर्गनिक खेती को और बढ़ावा दिया जायेगा. महिला समूहों को जैविक खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जायेगा.’ अब आप किसानों से सरकार की धोखाधड़ी का अंदाज़ा इसी बात से लगा सकते हैं कि एक तरफ़ बयान और दूसरी तरफ़ बजट में कटौती.

धोखाधड़ी की कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती. अरूण जेटली एक तरफ़ अपने भाषण में कहते हैं कि मछली पालन और पशुपालन व्यवसाय में 10000 करोड़ रुपये देकर ग्रामीण क्षेत्रो में जनता की आय बढ़ाने की कोशिश की जाएगी. दूसरी तरफ़ नेशनल फिशरीज़ डेवलपमेंट बोर्ड का बजट पिछले साल की तुलना में 9 करोड़ से कम करके 5 करोड़ कर दिया गया है. वहीं नेशनल डेयरी प्लान का भी बजट पिछले साल के मुक़ाबले 389.98 करोड़ से कम करके 324.91 करोड़ कर दिया गया है.

अब इन आंकड़ों की बात छोड़ देते हैं. मुल्क में किसानों के जो हालात हैं, उन्हें किसानों से बेहतर कोई नहीं जानता है. क्योंकि किसानों की आवाज़ देश के अन्य जनता तक नहीं पहुंच पा रही है. मीडिया ने किसानों के आन्दोलनों को अपने चैनलों पर दिखाने की अघोषित पाबंदी लगा रखी है. देश के ये किसान एक तरफ़ सरकार के ख़राब नीतियों के शिकार हैं, तो वहीं मौसम की मार भी इन्हीं बेचारे किसानों पर पड़ रही है. काश, हमारे पीएम मोदी कम से कम किसानों के साथ दग़ाबाज़ी से बाज़ आते…

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