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Reading: दंगेः अफ़वाहें, राजनीतिक बयान और ज़मीनी सच्चाई
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BeyondHeadlines > Edit/Op-Ed > दंगेः अफ़वाहें, राजनीतिक बयान और ज़मीनी सच्चाई
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दंगेः अफ़वाहें, राजनीतिक बयान और ज़मीनी सच्चाई

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published November 7, 2013 4 Views
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6 Min Read
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Afroz Alam Sahil for BeyondHeadlines

Contents
पढ़े : FACTS: कांग्रेस शासन में हुए ज्यादा दंगे, गईं सबसे ज्यादा जानें…पढ़े : दंगो के नाम पर सिर्फ दिल्ली में ही एक अरब से अधिक खर्च…

24 अक्टूबर को मध्य प्रदेश के इंदौर में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने अपने भाषण में मुज़फ़्फ़रनगर के दंगा पीड़ितों को पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई से जोड़ दिया.

देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के सबसे बड़े नेता के इस बयान ने उस ‘रिवेंज थ्योरी’ को साबित करने की कोशिश की थी जो अक्सर दंगा-फसादात और आतंकी घटनाओं की वारदात के बाद दी जाती रही है.

राहुल गाँधी के बयान के चार दिन बाद ही पटना में नरेंद्र मोदी की रैली के दौरान सिलसिलेवार धमाके हुए और मीडिया ने पुलिस सूत्रों के हवाले से अपनी रिपोर्टों में इन हल्के बम धमाकों को ‘मुज़फ़्फ़रनगर के बदले’ की कार्रवाई की संज्ञा दी.

राहुल गाँधी के बयान पर भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव आयोग से शिकायत भी की थी. चुनाव आयोग ने राहुल गाँधी से जवाब भी मांगा था, लेकिन राहुल ने और वक्त माँग लिया जो चुनाव आयोग ने उन्हें दे भी दिया. चुनाव आयोग ने राहुल से पूछा है कि उनके बयान को आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन क्यों न माना जाए?

लेकिन क्या यह सिर्फ़ चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन या एक बड़े नेता की ज़ुबान फ़िसलने भर का मामला है? असल में राहुल गाँधी का बयान उस कड़वी सच्चाई का प्रतिबिंब है जिसे स्वीकार करने से हम हमेशा हिचकिचाते रहे हैं.

पढ़े : FACTS: कांग्रेस शासन में हुए ज्यादा दंगे, गईं सबसे ज्यादा जानें…

नफ़रत की राजनीति

राजनीतिक दल लंबे अर्से से नफ़रत पैदा करके वोटों का ध्रुवीकरण करते रहे हैं. धर्म से जुड़ी एक घटना नेताओं के तमाम किस्म की नाकामियों और भ्रष्टाचार को छुपा देती है और लोग अपना मन मारकर धर्म के आधार पर वोट देने के लिए मजबूर हो जाते हैं.

ऐसे हालात बनाए जाते हैं कि लोगों के पास अपने धर्म या धर्म का हित करने (इस मामले में हित करता हुए दिखने) वालों के सिवा किसी और को चुनने के बारे में विचार करने तक का विकल्प नहीं रह जाता.

राहुल गाँधी का बयान इस कृत्रिम नफ़रत पर वास्तविकता का मलट चढ़ाने की एक कोशिश से ज़्यादा कुछ नहीं है.

मुज़फ़्फ़रनगर दंगे के पहले और बाद में अख़बारों, इंटरनेट माध्यमों और संचार-प्रचार के अन्य साधनों के ज़रिए कई किस्म की अफ़वाहों (एवं जनमानस की आम धारणाओं) को ख़बरों की तरह पेश किया गया. नतीज़ा यह हुआ कि दो संप्रदाय एक दूसरे के आमने सामने आ गए. नफ़रत की राजनीति का नतीज़ा यह रहा कि दशकों से साथ रहते आ रहे परिवार एक दूसरे की जान के दुश्मन हो गए.

पढ़े : दंगो के नाम पर सिर्फ दिल्ली में ही एक अरब से अधिक खर्च…

अफ़वाहें

मुज़फ़्फ़रनगर दंगा मामले में कई अफ़वाहें बेहद शातिराना ढंग से फ़ैलाई गईं (मीडिया माध्यमों की भी इन्हें बढ़ावा देने में अहम भूमिका रही) और मामले को शांत करने के बजाए उस पर राजनीति की जाती रही.

मुज़फ़्फ़रनगर के जाट बहुल इलाक़ों के लोग यह मान रहे हैं कि हज़ारों की तादाद में हथियारबंद विदेशी (बांग्लादेशी और पाकिस्तानी) क्षेत्र में घुस आए हैं और जाटों पर हमला कर सकते हैं.

मदरसों और मस्जिदों से एके-47 जैसे हथियारों का ज़ख़ीरा बरामद होने की ख़बरें तो बक़ायदा प्रमुख अख़बारों में छपी. हालाँकि बाद में पुलिस ने इनका खंडन ज़रूर किया लेकिन तब तक आम लोगों में यह धारणा मज़बूत हो गई थी कि हथियारों से लैस आतंकी इलाक़े में घूम रहे हैं.

सच्चाई

दंगा पीड़ित नौजवानों के आईएसआई से संपर्क में होने के बयान, पटना बम धमाकों को मुज़फ़्फ़रनगर दंगों का बदला बताने वाली रिपोर्टों या मदरसों एवं मस्जिदों से हथियार बरामद होने की अफ़वाहों से क्या यह सच्चाई बदल जाएगी कि मुज़फ़्फ़रनगर दंगें में 63 बेगुनाह लोग मारे गए जिनमें अधिकतर मुसलमान हैं. दंगों के करीब दो माह बाद भी चालीस हज़ार से ज़्यादा मुसलमान बेघर हैं. सैंकड़ों लड़कियों के साथ बलात्कार हुए (हालाँकि सभी पीड़िताओं ने एफ़आईआर दर्ज नहीं करवाई है) और सभी बलात्कार पीड़ित मुस्लिम ही हैं.

और अभी चंद दिन पहले ही एक राहत कैंप में अपने परिवार से मिलने आई एक युवती के साथ फिर बलात्कार हुआ. ऐसा क्यों हैं कि आईएसआई के संपर्क में होने, धमाकों करने में सक्षम होने, हज़ारों एक-47 होने के बावजूद भी मुसलमान अपनी बेटियों की इज़्ज़त तक की हिफ़ाज़त नहीं कर पा रहे हैं?

दंगों की बुनियाद में हमेशा अफ़वाहें या शातिर साजिशें रही हैं. कभी मूर्ति खंडित किए जाने की अफ़वाह तो कभी मस्जिद में सुअर घुस आने की. लेकिन आज के हिंदुस्तान में दंगा करवाने के लिए किसी मूर्ति को खंडित करने या मस्जिद में सूअर भेजने की ज़रूरत नहीं है. आज के हिंदुस्तान में तो दो नौजवानों की मोटरसाइकिल आपस में टकराना या फ़िर लड़की छेड़ने के आरोप ही दो ज़िलों में दंगा करवाने, 63 बेगुनाहों की जान लेने और लाखों लोगों को घर से बेघर करने के लिए काफ़ी हैं.

तो फिर हालात ऐसे क्यों हो गए. हिंदुस्तान का सामाजिक ताना बाना इतना कमज़ोर कैसे हो गया? राहुल गाँधी के बयान में इसका जवाब छुपा है. संभवतः चुनाव आयोग के समक्ष दिए जाने वाले राहुल गाँधी के जवाब में आपको यह नज़र न आए!

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