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इंसानियत को झकझोर देने वाली हृदय-विदारक तस्वीर : सरकार की खोखली व्यवस्था और रणनीति की खोल रही है पोल…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published March 31, 2020 39 Views
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6 Min Read
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Istikhar Ali for BeyondHeadlines

ख़राब स्वास्थ्य व्यवस्था और ग़लत रणनीति किसी भी देश को अक्षम बना देता है. भारत में बढ़ते कोरोना वायरस मामले और अव्यवस्था की वजह से महामारी का प्रकोप तीव्र गति से पैर पसार रहा है. जिसका दुष्परिणाम प्रत्येक डॉक्टर, व्यक्ति और घरों पर पड़ रहा है. वहीं प्रधानमंत्री ने देश को संबोधित करते हुआ कहा कि ‘देश में जो जहां भी है, वहीं रहे’ लेकिन ये नहीं बताया जिनके पास घर नहीं है वो कहां ठहरे? जो सड़कों पर रहते हैं, क्या वो सड़क पर ही रहे? जिनके बूढ़े माँ-बाप या बीमार सदस्य अकेले घर पर रहते है, उनका देखभाल कौन रखेगा? डॉक्टरों में संक्रमण क्यों बढ़ रहा है? ऐसे कितने मनविचलित करने वाले सवाल हैं, जो देश के वर्तमान हालात को समझने में मदद करता है.

महामारी के क़हर के अलावा भी रोज़ाना कितने लोग बीमारी, ख़राब स्वास्थ्य व्यवस्था, ग़रीबी, अक्षमता के वजह से मर रहे हैं. लेकिन कोरोना के आपदा की वजह से लोग पीड़ितों की मदद नहीं कर पा रहे हैं. देशव्यापी लॉकडाउन ने लोगों के गतिशीलता को थाम दिया है. कितने लोग अपने घरों तक नहीं पहुंच पाए और एक तमाशबीन बन गए. यहां तक कि लोग अपने घर वालों और रिश्तेदारों को ज़िंदगी के लिए संघर्ष करते हुए देख रहे है. कितने मामले ऐसे भी है कि लोग अपने घर वालों और क़रीबी रिश्तेदारों के मौत में भी शामिल नहीं हो पा रहे हैं. जैसे- माँ-बाप, भाई-बहन, बेटी-बेटा. दूर-दराज फंसे लोग अपने घर वालों के मौत की ख़बर सुनके ही मातम माना रहे हैं.

इसके अलावा, बढ़ती आर्थिक तंगी के कारण परिवार के सदस्यों के बीच आपसी संबंध और स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है. कोरोना कुछ वक़्त में चला जाएगा, अगर उचित निर्देशों का पालन किया जाए, लेकिन कितने ज़ख्म दे जाएगा. जैसे —अविश्वास, मन-मुटाव, अलगाव, आदि.

एक बार फिर सरकार की असुनियोजित रणनीति ने भारत की आबादी के एक बड़े हिस्से को अलग-थलग कर दिया. मुख्यत: निम्न वर्ग, दिहाड़ी मज़दूर, बीमार, अपंग, बुज़ुर्ग, नवजात शिशु समुदाय आदि. वहीं अपर्याप्त सुविधा के वजह से ऐसे वर्गों स्थिति दयनीय हो गई है. शहरों में रैन-बसेरा बनाया गया, जहां पर्याप्त सुविधा और व्यवस्था का अभाव है. फिर भी लोग अपने परिवार के साथ अप्रतिष्ठित जीवन व्यतीत कर रहे हैं. सुविधाओं के अभाव में लोग सड़कों पर रह रहे हैं या चलते हुए अपने जीवन का सबसे संघर्षपूर्ण वक़्त काट रहे हैं.

इसी दौरान निम्न वर्गों के ख़िलाफ़ बढ़ते पुलिस की गुंडागर्दी ने दहशत पैदा कर दिया. मुख्यत: हिन्दी भाषीय राज्यों में, पुलिस के अमानवीय व्यवहार ने सभ्य समाज को शर्मसार कर दिया. ऐसे प्रतीत होता है कि जनता क़ैदी, पूरा देश जेल और पुलिस प्रशासन जेलर बन गया. हाल ही में, कितने सारे हृदय-विदारक तस्वीर सामने आई है. जिसने इंसानियत को झकझोर दिया और सरकार की खोखली व्यवस्था और रणनीति की पोल खोल दी.

दूसरी तरफ़, इलाज करने के दौरान डॉक्टरों में बढ़ते संक्रमण ने भी स्वास्थ व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए. बेहतर व्यवस्था और उपकरणों के अभावे में काम कर रहे हैं. सरकार द्वारा संसाधन और सेवाए उपलब्ध नहीं कराई जा रही है. जैसे—बेहतर उपकरण, वेंटीलेटर, सुरक्षित मास्क और सेनीटाइज़र. राज्य सरकार द्वारा अतार्किक नोटिस जारी किए जा रहे हैं और कहा जा रहा कि साधारण मास्क का इस्तेमाल किया जा सकता है. जबकि ये अनुचित है.

वहीं, डॉक्टर अपना और अपने पूरे परिवार की ज़िंदगी दावं पर लगाकर संसाधनों के अभाव में भी दिन-रात सेवा कर रहे हैं, लेकिन सरकार कि ग़लत रणनीति के वजह से डॉक्टर अपने पूरे परिवार से अलग-थलग हो रहा है. उसके बाद भी, डॉक्टरों के साथ मारपीट के भी कितने मामले सामने आए.

WHO के निर्देशन के बाद भी डॉक्टरों को उचित संसाधन और सेवाएं प्रदान करने में सरकार नाकाम रही. सरकार की लापरवाही से स्वास्थ व्यवस्था और जनता का जान-माल दोनों दावं पर लगा है. डॉक्टरों के पास अपर्याप्त साधनों की वजह से देश का एक बड़ा हिस्सा मरने के कगार पर फिसलता जा रहा है. पिछले कुछ सालों में, स्वास्थ्य व्यवस्था ने किसी भी आपदा व महामारी को सफलतापूर्वक नियंत्रित नहीं कर पाया है, चाहे वो उत्तर प्रदेश का ऑक्सिजन की कमी से बच्चों की जान जाना या बिहार में चमकी-बुखार का क़हर हो. ग़लत रणनीति और न्यूनतम निवेश ने स्वस्थ व्यवस्था को अक्षम बना रहा है, जिसका दुष्परिणाम डॉक्टर और जनता पर पड़ रहा है.

विशेषज्ञों और रिपोर्टों के अनुसार, आने वाले वक़्तों में संसाधनों और सुविधाओं के अभाव रहा तो स्थिति और ख़तरनाक हो जाएगी. सरकार की अव्यवस्थित रणनीति और कमज़ोर स्वास्थ्य व्यवस्था के वजह से कोरोना की स्थिति और भयवाह हो जाएगी. बीमारी अच्छे स्वास्थ्य व्यवस्था के बिना महामारी बन जाती है, जिसका सामना ना सिर्फ़ पीड़ित करता है बल्कि डॉक्टर, जनता और देश भी करता है. अल्प-सुविधाओं के अभाव में पूरा सामाजिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाता है. जिसका नुक़सान देश की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक स्थिति पर पड़ता है.

(लेखक इस्तिखार अली जेएनयू के सेंटर ऑफ़ सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ में पीएचडी स्कॉलर हैं, जो इन दिनों ‘Marginalization and Health related events of Muslims’ विषय पर काम कर रहे हैं. इनसे ISTIKHARALI88@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.)

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