महात्मा गांधी ने मौलाना मज़हरूल हक़ को कुछ इस तरह दी थी ऋद्धांजलि…

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‘स्वर्गीय मज़हरूल हक़ एक महान देशभक्त, अच्छे मुसलमान और दार्शनिक थे. स्वभाव से आराम-पसन्द होते हुए भी, जब असहयोग शुरू हुआ, उन्होंने उसे उसी तरह छोड़ दिया जैसे हम ग़ैर-ज़रूरी मैल को अपने शरीर से छुड़ा देते हैं. बाद में तो वे साधु जीवन के उतने ही शौक़ीन बन गए, जितने कि वे शाही जीवन के थे. हमारे आपसी मतभेदों से आजिज आकर वे सबसे अलग रहने लगे थे और चुपचाप उस तरह की सेवा करते रहते थे जिसे लोग देख न सकें और अच्छी स्थिति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते रहते थे. वह निडर होकर बोलते और निर्भिक होकर काम करते थे. पटना के समीप जो सदाक़त आश्रम है, वह उन्हीं के रचनात्मक पुरूषार्थ का फल है. यद्यपि वह अपनी इच्छानुसार उस आश्रम में बहुत समय तक नहीं रह सके, तथापि उनके आश्रम संबंधी विचारों की बदौलत बिहार विद्यापीठ को आश्रम के रूप में एक स्थायी भवन मिल सका. यही कारण है कि आज भी वह दोनों क़ौमों को एक बनाने का ज़रिया हो सकता है. ऐसे पुरूष का अभाव सदा खटकता रहता है. ख़ासकर देश के इतिहास की वर्तमान स्थिति में उनका अभाव और भी खटकेगा. मैं बेगम मज़हरूल हक़ और उनके कुटुम्बियों के प्रति अपनी हार्दिक सहानुभूति व्यक्त करता हूं.’

महात्मा गांधी ने मज़हरूल हक़ के लिए ये बातें उनके देहांत पर संवेदना के रूप में 9 जनवरी 1930 को यंग इन्डिया में लिखी थीं.

वहीं पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी आत्मकथा में लिखा है — ‘मज़हरूल हक़ के चले जाने से हिन्दू-मुस्लिम एकता और समझौते का एक बड़ा स्तंभ टूट गया. इस विषय में हम निराधार हो गए.’

बता दें कि आज से ठीक 89 साल पहले आज ही के दिन मौलाना मज़हरूल हक़ इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कहकर चले गए. उन्हें बिहार के सारण ज़िला के सीवान में फ़रीदपुर गांव स्थित उनके पैतृक निवास ‘आशियाना’ के अहाते में दफ़न कर दिया गया.

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