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दवा कम्पनियों से एमआरपी का भूत उतारने की ज़रूरत

BeyondHeadlines News Desk

नई दिल्ली. देश में हर साल 3 फीसदी लोग महंगी दवाओं के कारण गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं. चिकित्सीय सेवाओं पर होने वाले कुल खर्च का 72 फीसदी सिर्फ दवाओं पर खर्च होता है. दवाई के कारोबार में ज़बरदस्त मुनाफाखोरी और इसे रोकने के उपायों पर आज अपोलो अस्पताल के सामने स्थित सेवा सदन में आयोजित एक विचार गोष्ठी में चर्चा की गई.

मुम्बई से प्रतिभा जननी सेवा संस्थान के राष्ट्रीय संयोजक आशुतोष कुमार सिंह ने कहा कि जब तक राष्ट्र को स्वस्थ्य नहीं बनाया जाएगा तब तक देश का विकास संभव नहीं है. इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए प्रतिभा जननी सेवा संस्था न ‘स्वस्थ्य भारत विकसित भारत’ अभियान चला रही है. आगे उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि दवाईयों में एमआरपी का जो भूत है, उस भूत की ओझैती करने की ज़रूरत है और इसके लिए ऐसा लगता है कि अब आम आदमी को ही ओझा बनना पड़ेगा.

केयर प्रोमिस वेल्फेयर सोसायटी के महा-सचिव राजेश कुमार ने कहा कि दवा हर आदमी ज़रूरत है, इसलिए अब यह ज़रूरी हो गया है कि इसे एक आंदोलन के रूप में लिया जाए. वहीं ‘सिम्पैथी’ के निदेशक डॉ. आर.कान्त ने दवाईयों की कीमतों के बारे में जागरूकता फैलाने पर ज़ोर देते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि अब आम आदमी दवा खरीदते समय सचेत रहे और क़ीमत ज़रूर पूछे. उन्होंने देश के डॉक्टरों से अपील करते हुए कहा कि वो मरीज़ की आर्थिक परिस्थियों को ध्यान में रखकर दवाईयां लिखें.

दैनिक भास्कर डॉट कॉम से आए युवा पत्रकार दिलनवाज़ पाशा ने कहा कि जब तक कोई गोली खाकर सनी लिओन को ब्रेस्ट कैंसर या किसी क्रिकेटर को रिएक्शन नहीं होगा, तब तक शायद दवा मेनस्ट्रीम मीडिया का मुद्दा नहीं बन पाएगा. यश चोपड़ा को मच्छर काटने पर देश में डेंगू पर चर्चा होती है, लेकिन महंगी दवा के कारण लाखों लोगों का गरीब हो जाना सिंगल कॉलम का भी खबर नहीं बन पाती.

दिल्ली सरकार के लिए काम कर रहे डॉ. देशराज ने भ्रष्ट व्यवस्था पर खीज ज़ाहिर करते हुए कहा कि यदि कोई ईमानदार डॉक्टर काम भी करना चाहे तो व्यवस्था उसके रास्ते का रोड़ा बन जाती है.

डायलॉग इंडिया के सम्पादक अनुज अग्रवाल ने कहा कि चिकित्सीय सेवाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने के लिए एक जन निगरानी तंत्र के निर्माण की आवश्यकता है. उन्होंने आगे सुझाव देते हुए कहा कि देश को  विदेशी दवा कम्पनियों पर निर्भरता कम करने की ज़रूरत है.

स्वतंत्र पत्रकार अवधेश मौर्य ने स्वास्थ्य एवं शिक्षा के व्यवसायीकरण का पूरज़ोर विरोध करते हुए कहा कि यह हमारी मूलभूत ज़रूरतें हैं, जिन्हें बाज़ार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. वहीं स्तंभकार शिवानंद द्विवेदी, मुकेश कुमार, के.के.तिवारी सहित कई बुद्धिजीवियों ने भी अपनी बात रखी व प्रतिभा-जननी सेवा संस्थान द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान को समर्थन देने की बात कही.

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