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वरना तो न जाने क्या हो जाता…

Anita Gautam for BeyondHeadlines

नेटवर्किंट साइट्स का आज हमारे दैनिक जीवन में बहुत ही बड़ा योगदान है. जिस प्रकार मोबाइल आज हर घर, हर व्यक्ति की ज़रूरत बन गया है, ठीक उसी प्रकार फेसबुक जैसे अनेक सामाजिक नेटवर्किंग वेबसाइट हमारी ज़रूरत बन गये हैं.

बात सिर्फ युवाओं की नहीं वरन् सभी आयु वर्ग के लोग चाहे पुरूष हों अथवा महिला सब इसका बखुबी प्रयोग कर अपने विचारों का आदान प्रदान कर रहे हैं. इतना ही नहीं लोग इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से दूर बैठे अनजाने व्यक्ति को अपना मित्र बनाते हैं. बातों का दौर ऐसा चलता है कि शीघ्र ही उनकी मुलाकात हो जाती है और परिणाम शादी…

वह दौर गया जब हमारे अपने माता-पिता अपने माता-पिता द्वारा तय की गयी अपनी ही बिरादरी और बिना किसी की मर्जी के अपनी झुठी शान को दिखाने के लिए जात-पात व धर्म की बात किया करते थे. आज लोग समझ गये हैं कि मात्र जाति एक होने से ही आपको अपना जीवन साथी आपके अनुकूल नहीं मिलेगा. दूसरी शब्दों में बात की जाए तो अगर अच्छी क्वालिटी का सामान चाहिए तो ब्रांड अच्छा होना ही चाहिए वह चाहे किसी भी दुकान से मिले.

लेकिन इन सब बातों में सोशल नेटवर्किंग साइट्स का लोगों पर साइड इफैक्ट भी पड़ रहा है. कुछ असामाजिक तत्व वहां भी सेंधमारी से नहीं चुकते और कुछ न कुछ ऐसी आपत्तिजनक हरकरत करके आपको परेशान करने का लुफ्त तो उठा ही लेते हैं.

हर आए दिन हम सामाचार पत्रों में पढ़ते हैं कि फेसबुक के माध्यम से आज एक लड़की को उसके मित्रों द्वारा उसकी फोटो पर आपत्तिजनक टिप्पणी की या अशलील वीडियो क्लिप भेजी. तो हाल ही की चौंकाने वाली एक घटना ‘‘महिला ने अपने पति के साथ मिलकर फेसबुक के माध्यम से अनेक लोगों को दोस्त बनाया और फिर मिल कर झूठी बातें कर, उन लोग की जेब ढिली की’’…

यह सब तो आम हो गया है. लोग तो फेसबुक के माध्यम से पहले मित्रता करते हैं फिर नम्बर का आदान प्रदान और फिर मिलने के लिए बुला कर सामने वाले के साथ न जाने क्या क्या…. कुछेक मानसिक पीढि़त भी इस श्रेणी में आते हैं, वह बिना जाने पहचाने किसी को भी मित्रता का प्रस्ताव रखते हैं, फिर तुरंत अपने दिल की बात और शादी तो शादी, सीधा बच्चे तक पहुंच जाते हैं और ज़बरदस्ती अपनी बात सामने वाले पर थोपने की पूर्णरूपेण कोशिश करते हैं.

शुक्र है, फेसबुक का इजाद करने वाले का कि उसमें हमारा घर या वह स्थान, जहां हम हैं वह दिखाई नहीं देता, वरना तो न जाने क्या हो जाए.

इतनी उन्नति और सामाजिक बदलाव के बाद भी आज समाज में ऐसे लोग हैं जिनके कारण हम अपने घर में भी असुरक्षित हैं. हर लड़की कहीं न कहीं डरी हुई सी रहती है, वो चाह कर भी सामाजिक नहीं हो पाती और अपनी बात दुनिया तक नहीं ला पाती.

वैसे भी आज के दौर में क्रांति लाने का एक मात्र साधन तो सिर्फ सामाजिक नेटवर्किंग साइट्स ही है. विषय चाहे कुछ भी हो, हम घर बैठे-बैठे या दफ्तर में काम करते हुए सामाजिक अभियानों में बढ़-चढ़ कर भाग ले पाते हैं. ऐसे आसामाजिक बीमार व्यक्तियों के कारण ही हम अन्य लोगों को भी शक की नज़रों से देखते हैं और सोशल साइट्स प्रयोग करने वालों को भी लोग उसी नज़रों से देखते हैं.

ज़रूरत सिर्फ ऐसी घटनाओं से मात्र बचना नहीं है, बल्कि हमें ऐसे ठोस क़दम उठाने होंगे जिसके फलस्वरूप हम ऐसे लोगों में व्याप्त बुराई या बीमार व्यक्ति की बीमारी को समाप्त कर सकें.

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