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कश्मीर…

सेब के पेड़

खुली हथेलियों और झुर्राई उंगलियों से

देख रहे हैं अपलक

आकाश की ओर

किसी बदलाव की बयार की आस में

नंगे, उधड़े, कंपकंपाते

 

दूर तक पसरी है कटीली बाड़

बंधी जुड़वा बोतलों में

ज़रा सी हलचल का

जवाब देती है गाली, गोली

मैदानों में खेलते बच्चे सहम जाते हैं

रुक जाते हैं राह पर बढ़ते पैर

बूढ़े सांस रोक लेते हैं

 

कब्रिस्तानों में

फड़फड़ा रहे हैं फ़िरन

फ़ातेहा पढ़ते हाथ

कांप रहे हैं

सर्द हवाओं से ज़्यादा तकलीफदेह है

ठंडा खून

अभी गीली ही होती है आसपास की कब्रें

नम होती है ज़मीन, आंखें

एक और कोई आकर सो जाता है

बेवक्त, बेवजह

बेकार ही शिकार होकर

 

अखरोट की लकड़ी का फोटो फ्रेम

जो बहुत पसंद है तुम्हें

उसको उकेरने वाले हाथों की बेवा

उसकी बच्ची और मां

सड़कों पर तस्वीर लिए तड़प रहे हैं

खौलती सांसों में

खामोश आंखों में

जो सवाल इनके पास हैं

न तुम दे सकते हो उसका जवाब

न ये पुलिस, न हुकूमत

सेना तो हरगिज़ नहीं

 

मौत जब शहर का सिलसिला बन जाए

तो रूहें खुद कांपकर छिप जाती हैं

भूत हो चुके भविष्य

चीड़ के पेड़ों से बूंद-बूंद रोते हैं

उठती है वजन की कराह

चरचराहट सन्नाटा चीर देती है

अपने गांव के मरे नौजवानों का बोझ

नहीं संभाल पाते हैं

पाइन के पेड़.

भीतर कोयला भी चटकता है तो

चौंक जाता है सारा घर

चाय की प्याली छलक जाती है

 

रोज़ सवेरे

घर से निकलते को ऐसे देखती हैं आंखें

जैसे न जाने फिर कब मुलाक़ात हो

और हो भी तो न जाने कहां

अस्पताल के कोने में,

जहां लिपटे लावारिस जिस्म पड़े होते हैं

पुलिस के थाने में,

जहां किसी को कुछ मालूम नहीं होता

सियासी गलियारों में,

जहाँ जाने से पहले या लौटने के बाद

सिर्फ बेहूदा, बेशर्म हंसी सुनाई देती है

स्कूल के रजिस्टरों से निकलकर

नाम, न जाने कब

लापता हो जाते हैं

न जाने कहां जाते हैं

न पुलिस बताती है

न सेना बताती है

न सरकार बताती है

अख़बार बताते हैं कि अभी मिला नहीं

तारीख़ बताती है

अब कभी मिलेंगे नहीं

 

न सेब के बाग में

न कहवाखाने के पास

न नमाज़ के बाद

न शाम को सिकारे पर

गलियों, दरिया, मैदानों में,

नहीं,

कहीं भी नहीं

सिर्फ फड़फड़ाते फ़िरन नज़र आएंगे

और सेब के सूखे ठूंठ

आसमान की ओर उंगलियां उठाए हुए

आंखें फिर भी

रास्ता देखती रहेंगी

 

अजीब सा मज़र है यहां

जहां दूर तक

या तो पसरी पड़ी हैं लाशें

या बिखरे पड़े हैं पत्थर

 

इस घुटन में,

जहाँ सांस लेने को सबसे अच्छी हवा हो

लेकिन बंद कर दिए जाएं मुंह, नाक, आंखें

अब कलम नहीं,

पत्थर उठाने का दिल करता है.

 

पाणिनि आनंद

श्रीनगर-सोपोर

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