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यूपी की तरक़्क़ी के लिए भाजपा सांसदों ने क्या किया?

BeyondHeadlines News Desk

उत्तर प्रदेश के महत्त्वपूर्ण ज़िला मेरठ में 4 फ़रवरी को एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि हमारी सरकार उत्तर प्रदेश के विकास के लिए हर संभव प्रयास कर रही है. उन्होंने यह भी कहा था कि यूपी का भाग्य बदलने के लिए आपको यूपी की सरकार को भी बदलना होगा.

भारतीय जनता पार्टी ने मई 2014 में केंद्र की सत्ता पर कब्ज़ा किया था. तब पार्टी का नारा था, ‘सबका साथ-सबका विकास’. इन दावों और नारों के साथ देखें तो भाजपा उत्तर प्रदेश के विकास के लिए तत्पर है और यदि इस साल एक विधानसभा चुनावों में वह प्रदेश की सत्ता पा लेती है, तो वह उत्तर प्रदेश के विकास के लिए हर मुमकिन प्रयास करेगी.

ऐसे में प्रश्न उठता है कि उत्तर प्रदेश के विकास को किस पैमाने पर मापा जाए? ज़ाहिर है कि उत्तर प्रदेश से केंद्र में गए सांसदों के कामों का जायज़ा लेकर ऐसा किया जा सकता है. उनकी सांसद विकास निधि के हिसाब को देखा जा सकता है कि उन्होंने अपने क्षेत्र में कैसे और कितने खर्च किए? सांसदों ने लोकसभा में कितने प्रश्न उठाए? उन्होंने संसद की कितनी बहसों में हिस्सा लिया और उनकी हाज़िरी कितनी रही? इन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन सांसदों ने भारत की सर्वोच्च संस्था का सदस्य होने के बाद अपने क्षेत्र के निवासियों की समस्याओं और ज़रूरतों का निवारण किया?

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश ने भाजपा की मौजूदा केंद्र सरकार को सबसे ज्यादा सांसद दिए हैं. उत्तर प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों में से 71 सीटें भाजपा के पास हैं. दो सीटें अपना दल के पास और बची हुई सीटों पर कांग्रेस और सपा सिमटे हुए हैं.

TwoCircles.net ने इंडियन अमेरिकन मुस्लिम कौंसिल के साथ मिलकर एक रिपोर्ट जारी किया है. इस रिपोर्ट में यूपी के सभी 80 सांसदों के सांसद विकास निधि का ब्यौरा हासिल किया गया है. ‘सबका साथ-सबका विकास’ को ध्यान में रखते हुए इस रिपोर्ट को दो हिस्सों में बांटकर देखा गया है.

हेमा मालिनी और डिम्पल यादव सबसे फिसड्डी

यदि सांसदों की हाज़िरी के आधार पर बात करें तो सौ फ़ीसदी उपस्थिति वाले तीन सांसद हैं, जिनमें बांदा के भैरों प्रसाद मिश्रा, फतेहपुर से निरंजन ज्योति और मेरठ के राजेन्द्र अग्रवाल हैं. लेकिन जब बात सबसे बुरी उपस्थिति वाले सांसदों की आती है तो भाजपा की हेमा मालिनी 35 फीसदी, सपा की डिम्पल यादव 38 फीसदी और कांग्रेस के राहुल गांधी 55 फीसदी हाज़िरी के साथ शामिल हैं. हास्यास्पद स्थिति यह है कि राहुल गांधी की उपस्थिति उनकी माँ यानी सोनिया गांधी यानी 68 फीसदी से भी कम है.

बहसों में हिस्सा लेने की बात आती है तो इसमें भी बांदा के भैरों प्रसाद मिश्रा ही अव्वल आते हैं. मात्र ढाई साल के कार्यकाल में भैरों प्रसाद मिश्रा ने 913 बहसों में हिस्सा लिया है, वहीँ हमीरपुर के सांसद कुंवर पुष्पेन्द्र सिंह 768 बहसों में हिस्सा लेकर दूसरे स्थान पर बने हुए हैं.

अम्बेडकर नगर के हरिओम पाण्डेय और मुरादाबाद के कुंवर सर्वेश कुमार ने सिर्फ एक-एक बार बहसों में हिस्सा लिया है और जौनपुर के कृष्ण प्रताप और कन्नौज की सांसद डिम्पल यादव ने महज़ दो बार बहसों में हिस्सा लिया है.

जब बात संसद में प्रश्न उठाने की आती है तो बदायूं के सांसद धर्मेन्द्र यादव का नाम सबसे ऊपर आता है और उनके पीछे नाम आता है प्रतापगढ़ के कुंवर हरिवंश सिंह का. धर्मेन्द्र यादव ने ढाई सालों में 646 प्रश्न उठाए और उनके बाद कुंवर हरिवंश सिंह ने कुल 599 प्रश्न उठाए हैं. जब एक भी प्रश्न न उठा पाने वाले सांसदों की बात आती है तो ऐसे कुल 19 सांसद सामने आते हैं, जिन्होंने आज तक संसद की कार्रवाई के दौरान एक बार भी प्रश्न नहीं उठाया. इन 19 में से 10 ऐसे सांसदों को अलग किया जा सकता है, जो केंद्र सरकार में मंत्री हैं और सरकार में होते हुए वे प्रश्न नहीं पूछ सकते हैं, तो भी ऐसे 9 नाम सामने आते हैं, जिन्होंने सदन में एक भी प्रश्न नहीं रखा. भारतीय जनता पार्टी से शुरू करें तो यशवंत सिंह, प्रियंका सिंह रावत, धर्मेन्द्र कुमार और अशोक सिंह दोहरे, कांग्रेस के आलाकमान राहुल गांधी व सोनिया गांधी और समाजवादी पार्टी के आलाकमान मुलायम सिंह यादव, डिम्पल यादव और तेजप्रताप सिंह यादव का नाम सामने आता है.

ऐसे देखें तो उत्तर प्रदेश से केंद्र में ऐसे 7 सांसद गए जो एनडीए के बाहर के थे, लेकिन इन 7 में से भी 5 ने कोई भी प्रश्न न पूछकर सरकार को कार्रवाई की खुली छूट दे दी.

आखिर में सांसद विकास निधि की बात आती है तो अलीगढ़ के सांसद सतीश कुमार ने अपने 86 फीसदी निधि का खर्च किया है और वहीँ मेनका गांधी ने अपनी सांसद निधि में से 85.9 प्रतिशत धन विकास कार्यों में खर्च किया है. सांसद निधि खर्च करने में सबसे बुरा रिकॉर्ड हमीरपुर के सांसद कुंवर पुष्पेन्द्र सिंह और कन्नौज की सांसद डिम्पल यादव का रहा है. कुंवर पुष्पेन्द्र सिंह ने जहां महज़ 17 फीसदी निधि का खर्च किया है, वहीँ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव ने 24 प्रतिशत सांसद विकास निधि का खर्च विकास कार्यों में किया है.

फौरी तौर पर देखें तो सभी मुस्लिम बहुल और अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर भाजपा का क़ब्ज़ा है. आरक्षित सीटों पर सांसद विकास निधि का औसत खर्च प्रतिशत 58.9 प्रतिशत का रहा है, वहीँ मुस्लिम बहुल सीटों पर यह प्रतिशत हैरतंगेज़ ढंग से ज्यादा यानी 67.8 प्रतिशत है. कुल मिलाकर 333.6 करोड़ रुपयों की सांसद विकास निधि का खर्च जभी भी किया जाना बाकी है, जब आरक्षित सीटों पर बात करें तो दलितों की इन 17 सीटों पर अभी भी 71 करोड़ रूपए खर्च किए जाने बचे हैं.

बताते चलें कि पूरे यूपी में 16 संसदीय सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम जनसंख्या 20 प्रतिशत से ज्यादा है. वहीं अनुसूचित जाति के लिए 17 सीटें आरक्षित हैं.

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