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BeyondHeadlines > Lead > दाल में ज़रूर कुछ काला है…
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दाल में ज़रूर कुछ काला है…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published September 25, 2013 10 Views
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6 Min Read
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Anurag Bakshi for BeyondHeadlines

पिछले दिनों पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल वीके सिंह के खिलाफ बेहद गंभीर आरोप लगे कि उन्होंने गोपनीय खुफिया राशि का इस्तेमाल श्रीनगर  में उमर अब्दुल्ला सरकार को अस्थिर करने के लिए किया था. इसके अलावा उन्होंने एक एनजीओ को इसलिए भुगतान किया ताकि वह उनके उत्तराधिकारी के चयन को प्रभावित कर सके.

आरोप यह भी है कि नई दिल्ली में वरिष्ठ अधिकारियों के अवैध रूप से फोन टैप करने के लिए उन्होंने आधुनिक संचार उपकरण खरीदे और उनका इस्तेमाल किया. इस संबंध में एक जनरल रैंक के अधिकारी द्वारा गोपनीय बोर्ड ऑफ इंक्वायरी के तहत वीके सिंह और टेक्निकल सर्विसेज डिविजन (टीएसडी) के खिलाफ आरोपों की जांच की और संस्तुति की कि पूरे मामले की जांच सीबीआइ जैसी वाह्य एजेंसी से कराई जानी चाहिए.

genral v k singh and modiथल सेनाध्यक्ष वीके सिंह के कार्यकाल में गठित की गई कथित खुफिया इकाई को लेकर सेना की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद जिस तरह आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया है, उस पर यदि विराम नहीं लगा तो सेना की भी प्रतिष्ठा प्रभावित होगी और भारत सरकार की भी…

यह समझना कठिन है कि जब यह कथित खुफिया इकाई सरकार की सहमति से गठित की गई थी तो फिर उसके कामकाज के मामले में केवल तत्कालीन सेनाध्यक्ष जवाबदेह कैसे हो सकते हैं? और वह भी तब जब यह माना जाता है कि सेनाध्यक्ष चाहे भी तो अपने मन मुताबिक सब कुछ नहीं कर सकता… पता नहीं सच क्या है? लेकिन जिस तरह वीके सिंह के खिलाफ जांच रिपोर्ट सामने आई और जैसे समय आई उससे दाल में कुछ काला नज़र आता है.

सबसे पहला सवाल तो यही है कि जिस रिपोर्ट में सेनाध्यक्ष पर इतने गंभीर आरोप लगाए गए हों, उस पर सरकार ने कोई कार्रवाई करने की ज़रूरत क्यों नहीं समझी? क्या यह विचित्र नहीं कि इस सनसनीखेज रिपोर्ट पर भारत सरकार छह महीने तक मौन बनी रही? यह रिपोर्ट तो इतनी सनसनीखेज है कि उस पर पहले दिन से सक्रियता बरती जानी चाहिए थी. क्या भारत सरकार बताएगी कि वह इस रिपोर्ट पर मौन क्यों बनी रही? उसे यह भी बताना होगा कि यह रिपोर्ट सार्वजनिक कैसे हो गई? यदि इस तरह की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हो सकती है तो इसका मतलब है कि भारत सरकार कुछ भी संभाल सकने की स्थिति में नहीं.

लेकिन तात्कालिक ज़रूरत तो इस बात की है कि इस बात का पता लगाया जाए कि यह रिपोर्ट सार्वजनिक कैसे हो गई? यह रिपोर्ट जिस समय सार्वजनिक हुई उससे तो यह लगता है कि इसे जान बूझकर सार्वजनिक किया गया है. यदि आम जनता को यह संदेश जा रहा है कि यह रिपोर्ट इसलिए सार्वजनिक की गई है, क्योंकि वीके सिंह नरेंद्र मोदी का समर्थन करने के लिए तैयार हो गए तो इसके लिए सरकार ही दोषी है.

वीके सिंह के खिलाफ सामने आई इस रिपोर्ट में जो कुछ कहा गया है वह कितना सच है और कितना नहीं? इसका पता किसी जांच से ही चल सकता है, लेकिन यदि एक क्षण के लिए मान लिया जाए कि इन आरोपों में कुछ सत्यता है तो इससे अधिक गंभीर बात और कोई नहीं हो सकती.

इसमें संदेह नहीं कि भारत सरकार और वीके सिंह के बीच तनातनी व्याप्त हुई, लेकिन इसका कोई औचित्य नहीं कि यह तनातनी इस हद तक बढ़ जाएगी कि सेना की प्रतिष्ठा पर भी आंच आ जाए. वीके सिंह के खिलाफ जो रिपोर्ट सामने आई उसकी सच्चाई किसी निष्पक्ष जांच से ही स्पष्ट होगी. देखना यह है कि भारत सरकार इस अप्रिय प्रसंग की सच्चाई सामने लाने का कोई जतन करती है या नहीं?

मार्च 2012 में वीके सिंह ने प्रधानमंत्री को गोपनीय पत्र लिखा था, जो सार्वजनिक हो गया था. इसमें उन्होंने सेना में भ्रष्टाचार और सैन्य उपकरणों और हथियारों की कमी पर चिंता प्रकट की थी. साउथ ब्लॉक ने एक बयान में कहा कि सरकार को सेना मुख्यालय से रिपोर्ट मिली है. यह रिपोर्ट राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए संवेदनशील है और इस रिपोर्ट का सावधानी से अध्ययन करने के बाद सरकार आगे कार्रवाई पर फैसला लेगी.

एक गंभीर सवाल यह उठता है कि अगर आरोप इतने संगीन हैं तो संप्रग सरकार छह महीनों तक इस रिपोर्ट को दबाए क्यों बैठी रही? विश्लेषकों का दावे के साथ कहना है कि जनरल वीके सिंह के खिलाफ इस रिपोर्ट में कोई सार नहीं है और रेवाड़ी में चुनावी रैली के कारण ही यह रिपोर्ट सामने आई है. अगर इस विवेचना को तार्किक परिणति तक पहुंचाया जाए तो यह बात स्पष्ट हो जाएगी कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े एक अति गोपनीय दस्तावेज को राजनीतिक लाभ उठाने के लिए सार्वजनिक किया गया है.

यह सवाल बार-बार पूछा जा रहा है कि संप्रग सरकार ने विपक्षी दलों के साथ अप्रैल-मई में यह रिपोर्ट क्यों साझा नहीं की? जिस तरीके से राजनीतिक प्रतिष्ठान और उच्च नौकरशाही ने इस मुद्दे को उठाया है उससे पता चलता है कि मामला केवल वीके सिंह तक सीमित नहीं है. ऐसे समय जब आतंकवाद, अलगाववाद और दंगे-फसादों की जकड़ में फंसा देश लहुलुहान है, तब इन आरोपों के देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर निहितार्थ हैं. मुजफ्फरनगर एक चेतावनी है कि किस तरह अल्पकालिक राजनीतिक लाभ दीर्घकाल में विनाशकारी साबित हो सकते हैं.

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