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जो हमारे बीच नफ़रत पैदा कर रहे हैं, वही असली रावण हैं.

अफ़रोज़ आलम साहिल, BeyondHeadlines

मेरा पूरा बचपन बेतिया शहर में दुर्गा पूजा के पंडालों को देखकर गुज़रा है. जबसे होश संभाला है धर्म के विजय के नारों को हमने खूब सूना है. ‘अधर्म का नाश हो’ वाले नारे भी याद हैं. वो रामलीलाएं भी याद हैं, जो मैं अक्सर घर से भाग कर देखा करता था. वो सांस्कृतिक कार्यक्रम भी याद हैं. असत्य पर सत्य की जीत को भी देखा है. राक्षस को जलते हुए भी देखा है. और इन सबके बीच साम्प्रदायिक सौहार्द की अद्भूत मिसालों को भी देखा है.

दरअसल बेतिया शहर की सबसे मशहूर दुर्गा पूजा मेरे ही घर के पास होती है. सुबह आंख खुलने से लेकर आंख बंद होने तक मां दुर्गा के भक्ति भरे गाने सुनता आया हूं. बचपन से वो सारे गाने याद थे, और काफ़ी हद तक आज भी याद हैं. मैं यक़ीन से कह सकता हूं कि ऐसी दुर्गा पूजा शायद कहीं नहीं होती है. क्योंकि दिल्ली या अन्य शहरों का ‘नवरात्रि सेलिब्रेशन’ इससे बिल्कुल अलग है. हालांकि अब तो वहां का सारा मामला इलेक्ट्रॉनिक हो गया है. लोग दर्शन करने के बजाए शोज़ देखते हैं.

ये सेलिब्रेशन पिछले 43 साल से लगातार जारी है. यक़ीनन ये बिहार के लिए एक मिसाल है. हर साल इस दुर्गा पूजा समिति में हिन्दू-मुस्लिम दोनों शामिल रहते हैं. ये परम्परा नफ़रत के इस माहौल में आज भी क़ायम है. और मुझे ये भी यक़ीन है कि आगे भी क़ायम रहेगी.

मुझे याद है हमारे मुहल्ले की दुर्गा पूजा समिति में जितनी संख्या में हमारे हिन्दू भाई होते हैं, उतनी ही संख्या में हमारे मुस्लिम भाई भी होते हैं. हां! संख्या में कुछ कमी ज़रूर आई है. लेकिन आज भी समिति के महत्वपूर्ण पदों पर हमारे मुस्लिम भाई भी हैं. शोभा यात्रा और मां की डोली उठाने वालों में यहां के मुसलमान भी शामिल रहते हैं. विसर्जन में खुशी में इनके भी कपड़े आज भी फटते हैं. अबीर व गुलाल से सब आज भी सराबोर होते हैं.

लेकिन पता नहीं क्यों… जो मज़ा हमें पहले आता था, वो शायद आज नहीं मिल पा रहा है. वो रामलीलाएं आज नहीं होती. अब राक्षस भी नहीं जलाए जाते. वो सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पता नहीं अब क्यों नहीं होते? पता नहीं, ‘मां’ की भक्ति वाले वो गाने कहां खो गए हैं?

वो सब कुछ देशी था. अब तो दुर्गा मां भी शायद विदेशी गानों की धुन पर ही खुश होती हैं, इसलिए उन्हें खुश करने के लिए ब्राज़ील और रोबोट डांस वाले भक्ति गाने सुनाए जाते हैं. पहले ‘मां’ बड़े ही आराम से मंडप में पड़ी रहती थी. लोग आते थे और भक्ति भावना से दर्शन करते थे और चले जाते थे. पर अब ‘शोज़’ को देखने के लिए लोगों को आपस में लड़ते हुए भी देखा है.

‘मां’ के दर्शन के तरीक़े बदल गए. शायद लोगों की नज़र में ‘मां’ अब जीवंत हो गई हैं, पर सच तो यह है कि पहले ‘मां’ को बिजली की अधिक ज़रूरत नहीं थी, पर अब वो बिजली के बग़ैर कुछ भी नहीं हैं.

हद तो ये है कि ‘मां’ के दर्शन के बीच ‘मां की बेटियों’ को छेड़ने से भी बाज़ नहीं आ रहे हैं. ‘मां’ के नाम पर बजने वाले गानों में भक्ति से ज़्यादा फूहड़पन है, और लोगों के डांस को देखने के बाद ऐसा लगता है कि भक्ति अब तेल लेने चली गई है. शायद धर्म अब दिखावा हो चुका है.

ख़ैर, नवरात्रि की ‘नौ रातें’ अब ख़त्म हो चुकी हैं… आज शाम रावण जलेगा… आईए, कोशिश करें कि इस बार इस मुल्क से नफ़रत के रावण को हमेशा के लिए ही जला दिया जाए… सच जानिए, जो हमारे बीच नफ़रत पैदा कर रहे हैं, वही असली रावण हैं. आज उनकी सोच और कर्म में पनप रहे रावण का जलना बहुत ज़रूरी है…

हमारे मित्रों को दशहरे की बधाई… उम्मीद है कि आज हम अपने दिल से नफ़रत फैलाने वाले हर रावण को हमेशा के लिए जला देंगे और हम हमेशा सच के रास्ते पर बने रहेंगे…

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