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हां, मैंने अपने हाथों से मिटाये पुलिस वालों के जुर्म के सबूत

Dilnawaz Pasha for BeyondHeadlines

मेरा दफ्तर नोयडा के सेक्टर 63 में है. पूरे सेक्टर में प्राइवेट कंपनियों के दफ्तर हैं और कई हजारों छोटी-बड़ी फेक्ट्रियां भी हैं. इस सेक्टर में काम करने आने वालों की तादाद का सही आंकड़ा तो मेरे पास नहीं है, लेकिन यह ज़रूर कह सकता हूं कि सुबह और शाम के वक्त रास्ते जाम हो जाते हैं. हजारों लोग काम करने आते हैं तो सैंकड़ों की तादाद में छोटी-बड़ी दुकानें, फल-सब्जी के ठेले, गोलगप्पे, छोले-कूलचे, भटूरे-पराठे आदि के ठेले भी सड़कों के किनारे लगते हैं. मेरे दफ्तर के अगल-बगल में कम से 6 ठेले लगते हैं और कई चाय की दुकानें भी हैं.

मैंने अपनी आंखों से कई बार नोयडा पुलिस की पीसीआर गाड़ियों को इन ठेले वालों से वसूली करते देखकर अनदेखा किया है. हां! ठेले वालों से यह ज़रूर पूछा कि महीने का कितना देते हैं तो लोकेशन के हिसाब से वसूली की अलग-अलग दरों का पता ज़रूर चला. कहीं 200 रुपये महीना तो कहीं की वसूली 3000 रुपये तक थी. हालांकि मैंने इस आंकड़े का इस्तेमाल अपनी स्टोरी में कभी नहीं किया, यह सिर्फ मेरे सामान्य ज्ञान तक ही सिमट कर रह गया.

शनिवार शाम को मैं 6 बजे के करीब दफ्तर से निकला. अक्सर रात को दस बजे के बाद निकलता हूं और ऑफिस की गाड़ी से घर जाता हूं. चूंकि आज जल्दी निकला था, इसलिए ऑफिस से मेन रोड तक आने के लिए रिक्शा कर लिया. मेरा दफ्तर सैक्टर 62 से फोर्टिस अस्पताल होकर ममूरा जाने वाले मेन रोड से एक किलोमीटर से अधिक दूर अंदर सेक्टर में है. रिक्शा अभी कोई आधा किलोमीटर चला था कि बीच रोड पर पुलिस की पीसीआर गाड़ी खड़ी दिखी. गाड़ी के पास एक युवक आया और कुछ पैसे ड्राइवर को देकर वापस चला गया.

मैंने रिक्शा रुकवाया, पैसे दिये और वहीं उतर गया. पुलिस की पीसीआर गाड़ी से हो रही वसूली के कई वीडियो मोबाइल में बनाए. गाड़ी थोड़ा आगे बढ़ती, हूटर बजता, ठेले वाला सलाम ठोकते हुए सिर झुकाए आता पैसे देता और बिना कुछ बोले ही चला जाता. कई जगह पुलिस को पैसा देने वालों ने गाड़ी के ड्राइवर से हाथ मिलाया और दुआ सलाम भी की. यह सब सैंकड़ों लोगों की आंखों के सामने ऐसे हो रहा था जैसे हो ही नहीं रहा हो. सबने अपनी सहमति पुलिस की इस वसूली को दे रखी थी. गाड़ी करीब 200 मीटर आगे जाकर एक बार फिर रुकी. इस बार ड्राइवर गाड़ी से उतरा और पास ही लगे एक फड़ पर गया. वहां बैठे व्यक्ति ने कमाई न होने की दुहाई दी तो ड्राइवर सख्त हो गया, हालांकि सिर्फ बातें सुनाकर ही रुक गया, न बल प्रयोग किया और न ही ज़बरदस्ती पैसे छीने. वहीं एक महिला रोज़मर्रा का सामान बेच रही थी. महिला ड्राइवर को पैसे दे रही थी. इस बार मैं कैमरा लेकर बिलकुल पास तक गया और जो हो रहा था उसे रिकॉर्ड करते हुए पीसीआर के पास तक आ गया.

कंधे पर दो सितारे लगाए एक पुलिसवाला आगे बैठा था और एक पिछली सीट पर. गाड़ी की खिड़की खोलकर वो पानी पी रहे थे. मेरा मोबाइल देखते ही सिपाही उतरा और बोला- ऐ, क्या कर रहा है? मैंने भी जवाब दे दिया- आपका वीडियो बना रहा हूं.

‘तुम यहां वीडियो किसकी परमीशन से बना रहे हो?, पता नहीं वीडियो बनाने के लिए एसपी साहब से परमीशन लेनी पड़ती है…’

‘यह सार्वजनिक स्थान हैं और मुझे नहीं लगता कि वीडियो रिकॉर्ड करने के लिए मुझे किसी की परमीशन की जरूरत है…’

‘बहुत तेज़ बोल रहे हो, तुम हो कौन?’

‘मैं भारत का एक सामान्य नागरिक हूं और यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि हमारी पुलिस कैसे काम कर रही है, वैसे क्या आप कुछ ऐसा कर रहे थे जिसका वीडियो मुझे नहीं बनाना चाहिए था.’

‘अच्छा नाम क्या है तुम्हारा और क्या करते हो और कहां रहते हो?’

‘जी मेरा नाम दिलनवाज पाशा है और मैं यहीं सेक्टर 63 में ही नौकरी करता हूं, यहीं सामने टी-पाइंट के पास मेरा दफ्तर है…’

‘काम क्या करते हो?’

‘जी पत्रकार हूं…’

‘अरे सर पहले बताया होता तो हम आपसे इतने सवाल ही नहीं करते, आइये गाड़ी में बैठिये, कहीं छोड़ना हो तो बता दीजिए…’

‘वैसे मैं यहां आपसे एक पत्रकार की हैसियत से नहीं एक आम नागरिक की हैसियत से बात कर रहा था और मेरे पत्रकार होने से आपको कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि पत्रकारों के पास ऐसा कोई भी विशेषाधिकार नहीं है जो कि आम नागरिकों के पास न हो, अगर आप मुझे एक सामान्य नागरिक समझकर बात करेंगे तो ज्यादा बेहतर लगेगा. खैर, मुझे पास ही जाना है मैं चला जाता हूं…’

मैं यह कहकर आगे बढ़ ही रहा था कि सिपाही गिड़गिड़ाने की मुद्रा में आ गया, बोला- बेटा मैं तुम्हारे पिता की उम्र का हूं, इस तरह सड़क पर खड़े होकर बात करना अच्छा नहीं लग रहा, गाड़ी में बैठ जाओ, हम तुम्हें सड़क तक छोड़ देते हैं. उन्होंने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया और गुजारिश करते हुए गाड़ी में बिठा लिया. सिपाही और वर्दी पर दो स्टार लगाकर बैठे दूसरे पुलिसवाले के लहजे में ज़रा भी गरमी नहीं थी. वो गिड़गिड़ाने की मुद्रा में बात कर रहे थे. ये वही पुलिस वाले थे जिनके गाड़ी का हूटर मात्र बजाने से ही ठेले वाले पैसे पहुंचा रहे थे, बल्कि सिर्फ पैसे ही नहीं पहुंचा रहे थे बल्कि 90 डिग्री की मुद्रा में झुककर सलाम भी कर रहे थे.

खैर मैं गाड़ी में बैठ गया. गाड़ी अभी कोई दस मीटर ही चली होगी कि सिपाही बोला, ‘तो आप हमें ब्लैकमेल करना चाहते हैं, अगर ब्लैकमेल करना चाहते हैं तो बता दीजिए कितना पैसा चाहिए…’ न मेरे लिए सिपाही का यह रवैया नया था और नहीं उसका यह सवाल. कई बार ऐसा हो चुका है कि पुलिस को पत्रकार के रूप में परिचय देने पर पैसे लेकर मामला रफा-दफा करने की पेशकश हुई है. इसलिए मैंने बस यही कहा कि महोदय, मेरा उद्देश्य आपको ब्लैकमेल करना बिल्कुल नहीं था, मैं तो बस आपको ये बताना चाह रहा था कि हमारे आज के नये ज़माने का सामान्य नागरिक भी सशक्त है तो ज़रा थोड़ा सा नागरिकों का भी ख्याल कीजिए.

पीछे बैठा सिपाही बुजुर्ग दिख रहा था… बोला, ‘तुम मेरे बेटे की उम्र के हो, और पत्रकार भी, हमारे हालात को तुम भली भांति समझते हो, कुछ ऐसा न करना की हमारी नौकरी पर बन आए.’ मैंने कहा, ‘मेरा इरादा न आपको ठेस पहुंचाना था और न ही आपकी नौकरी या काम करने पर सवाल खड़े करना, मैं तो बस एक सामान्य नागरिक के तौर पर गुज़र रहा था, आपको लोगों से पैसे वसूलते देखा तो अच्छा नहीं लगा, इसलिए वीडियो बना लिए.’

गाड़ी में मौजूद दोनों पुलिसकर्मी और ड्राइवर वीडियो देखने की गुजारिश करने लगे, मैंने वीडियो दिखा दिया. वीडियो देखकर आगे बैठे पुलिसकर्मी का पसीना छूट गया. मुझे कई तरह के लालच दिए, हालांक किसी भी प्रकार की धमकी देने की या ऊंची आवाज़ में बोलने की कोशिश उन्होंने नहीं की. मैंने कई बार कहा कि मैं इस वीडियो का इस्तेमाल आपके खिलाफ़ नहीं करूंगा… और सच भी यही था, मैं उस वीडियो का इस्तेमाल करना भी नहीं चाहता था. खैर, जब कई बार आग्रह करने पर भी मैंने वीडियो डिलीट नहीं किया तो बुजुर्ग सिपाही तुरुप का इक्का फेंकते हुए बोला, ‘सर तो कई दिनों में आज ही आए थे और फंस गये, बेचारे दिल की बीमारी की मरीज़ हैं, बेटा अगर तुमने यह वीडियो डिलीट नहीं किया और उन्हें रात में कुछ हो गया तो तुम खुद को कैसे माफ़ करोगे…’

मुझे देर हो रही थी और वीडियो रिकॉर्ड करने का मेरा मक़सद भी पूरा हो गया था. वीडियो रिकॉर्ड करने का मेरा एक ही मकसद था. मैं पुलिसवालों को एक आम आदमी की ताक़त का अहसास कराना चाहता था. वीडियो मैंने प्रसारित करने के उद्देश्य से नहीं बनाये थे, बनाये होते तो शायद उनके सामने कैमरा लेकर न गया होता.

मुझे उनकी गाड़ी में बैठे करीब आधा घंटा हो गया था और वो हर संभव प्रयास कर रहे थे कि मैं वीडियो डिलीट कर दूं. वो अपने उस गुनाह का सबूत मिटाने की गुजारिश कर रहे थे, जिसे वो लोग हजारों लोगों के सामने बेखौफ अंजाम देते हैं. मुझे मन ही मन पुलिसवालों पर हंसी आ रही थी. मैंने कई बार उन्हें भरोसा दिया कि मैं वीडियो का इस्तेमाल नहीं करूंगा और अगर भविष्य में कभी किया भी तो इस तरह से करूंगा कि उन्हें किसी भी प्रकार का नुक़सान न हो. लेकिन मेरे दिलासे के शब्दों पर उनका डर हावी हो रहा था. अंत में मैंने अपने मोबाइल से वीडियो डिलीट करने में ही भलाई समझी. उन्हें यह भरोसा देकर मैं आ गया कि बात यहीं खत्म हो गई है और मैं इस बारे में किसी से बात नहीं करूंगा…

अभी मैं घर पहुंचा ही था कि एक अनजान नंबर से मेरे पास फोन आया और पूछा कि क्या नाम है और कहां काम करते हो वगैरह-वगैरह… मैं समझ गया कि सिपाहियों के दिल को अभी तक तसल्ली नहीं हुई है. मैंने भी सब सही-सही बता दिया. कोई स्थानीय क्राइम रिपोर्टर था और मेरे पत्रकार होने की तस्दीक करना चाह रहा था या शायद पुलिसवालों से अपने संबंध निभाने की कोशिश कर रहा था. खैर, मैंने उसे भी तसल्ली दे दी की मैं वीडियो डिलीट कर चुका हूं और अगर मेरे पास होते भी तो मैं शायद उन्हें इस्तेमाल नहीं करता. हो सकता है अपने प्रिय क्राइम रिपोर्टर से वीडियो डिलीट होने की पुख्ता ख़बर मिलने के बाद सिपाहियों के मन को तसल्ली हो गई हो.

लेकिन आपके मन में एक सवाल उठ रहा होगा कि मैंने भ्रष्टाचार के सबूत को क्यों मिटा दिया?

तो चलते-चलते आपके सवाल का जवाब भी दे देता हूं. दरअसल वीडियो रिकॉर्ड करने का मेरा इरादा सिर्फ पुलिसवालों को यह दिखाना था कि नये ज़माने में एक आम आदमी कितना सशक्त हो चुका है. पुलिसवालों का वीडियो रिकॉर्ड करने के लिए गिड़गिड़ाने और कई तरह के प्रलोभन देना इस बात का प्रमाण है कि अगर आम आदमी चाहे तो वसूली रुक सकती है बशर्ते सभी लोग सामने आए. इस वीडियो को डिलीट करने का दूसरा कारण यह भी था कि इसमें कोई ऐसा विलक्षण घटना नहीं थी जो सालों या या सदियों में एक बार घटती हो. यह तो ऐसी सामान्य घटना थी जिसे में रोजाना कम से कम एक या दो बार तो देख ही लेता हूं (और शायद आप भी देख लेते होंगे). इसलिए उसमें भले ही दो पुलिसवालों की वर्दी उतरवाने जितना सच था, लेकिन ऐसा नहीं था जो विलक्षण या विरला हो बल्कि ये तो वो सच था जिसे हमारा भद्र समाज मूक मान्यता दे चुका है.

और तीसरा और सबसे बड़ा कारण यह था कि वीडियो प्रसारित करने के बाद अधिक से अधिक कार्रवाई उन दो पुलिसवालों और ड्राइवर पर होती जो वीडियो में दिख रहे हैं. हो सकता है उनका ट्रांस्फर हो जाता या फिर निलंबित ही कर दिये जाते लेकिन इससे वसूली नहीं रुकती और न ही इससे फायदा लेने वाले असली लोगों का कुछ होता. वसूली के खेल में ये पुलिसवाले छोटे से प्यादे भर हैं जो मैदान में जाकर सारे काम को अंजाम भी देते हैं और वक्त आने पर बलि भी उनकी ही चढ़ाई जाती है. खेल के असली खिलाड़ी, एसी दफ्तरों में बैठने वाले अधिकारी पूरी मामले से ऐसे पत्ता झाड़ लेते जैसे उन्हें कुछ पता ही नहीं.

खैर, वीडियो मैंने डिलीट कर दिया है, पुलिसवाले अब चैन से सो रहे होंगे और हो सकता है कल फिर शाम को वो मुझे वसूली करते हुए मिल जाएं. बस आपसे एक सवाल है कि क्या मैंने वीडियो डिलीट करके गलत किया? या क्या मैं कुछ और बेहतर कर सकता था? आप अपने सवाल नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर दें, मैं आपके सवालों के जवाब देने की कोशिश करूंगा.

और अंत में बस इतना कहना चाहूंगा कि अगर सिर्फ मैं नहीं बल्कि आप और हम चाहें तो वसूली भी रुक सकती है और हालात भी बेहतर हो सकते हैं. इसके लिए हम सबको आगे आना होगा और खुद को सशक्त करना होगा. तो क्या आप आगे आने के लिए तैयार हैं?

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