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ये कोच किस काम का?

Shiv Pujan ‘Shiv’ for BeyondHeadlines

कोई टीम शिकस्त खाती है, तो सबसे पहले मात का तोहमत कप्तान और प्लेयर्स के सर पर लगती है. जहिर है, ग्राउंड में प्रदर्शन यही करते हैं. पर पर्दे के पीछे भी एक शख्स मौजूद रहता है, जो प्लेयर्स और कप्तान को हर वक्त अपनी नसीहत देता है कि उसे किस रणनीति के तहत खेल खेलना है. टीम के हर फैसले पर उसकी भागदारी और सहमती होती है. वो टीम का अहम किरदार होता है. पर जब टीम को मात मिलती है तब उसके सर बहुत कम हार का ठीकरा फोड़ा जाता है.

टीम इंडिया का हालिया प्रदर्शन बेहद की शर्मनाक रहा है. कप्तान धौनी को काफी फजीहत झेलनी पड़ी है. क्रिकेटरों को आलोचनाओं की आग में कूदना पड़ा, पर टीम के कोच डंकन फ्लैचर को कुछ नहीं हुआ. न हाय तौबा मची और न ही उतना जिक्र हुआ. गुमनामी में पहले भी थे और आज भी हैं.

वैस, फ्लैचर भी कम तीकड़मबाज़ नहीं हैं. वो भी अपनी कुर्सी बचाने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते रहे हैं. पूर्व कप्तान सुनील गवास्कर समेत कई कई वरिष्ठ क्रिकेटर्स भी हटाने की राय जाहिर की, मगर बीसीसीआई के कानों पर जू तक नहीं रेंगी.

बोर्ड ने टी-ट्वेंटी के लिए बांग्लादेश रवाना होने से पहले कोच फ्लैचर को बुलाया भी था, पर दरियादिली दिखाकर छोड़ दिया, या यू कहे जीवनदान दे दिया. आखिर इसका राज़ क्या है? और अंदर क्या खिचड़ी पक रही है? वो तो बीसीसीआई और फ्लैचर खुद जानते होंगे.

पिछले दिसंबर माह से ही भारतीय टीम के हार की कथा जारी है, हैरत की बात तो ये है कि फ्लैचर की कोचिंग में भारतीय टीम एक भी टेस्ट विदेशी ज़मीन पर नहीं जीत सकी है. उसे हार पर हार ही झेलनी पड़ी है. दो साल से ज्यादा वक्त हो गया, टीम इंडिया ने इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, साउथ अफ्रीका और न्यूजीलैंड में एक टेस्ट जीत के लिए तरसती रही.

घर की शेर मानी जानी वाली भारतीय टीम घर की शेर ही रह गई. इस दौरान, राहुल द्रविड़, लक्ष्मण और सचिन जैसे दिग्गज प्लेयर्स भी क्रिकेट को अलविदा कह दिया. पर कोच फ्लैचर साहब टीम से टस से मस नहीं हुए. डंकन फ्लैचर साउथ अफ्रीका के कोच गैरी कस्टर्न के जाने के बाद टीम इंडिया की कमान संभाली थी, वे गैरी की मेहरबानी से ही टीम के कोच बने थे, हालांकि डंकन का कोचिंग रिकार्ड बेहतर रहा, उन्होंने अपनी आठ साल की कोचिंग में  इंग्लैडं को काफी कामयाबी दिलायी, इंग्लैंड ने उन्ही की कोचिंग में ऑस्ट्रेलिया से अरसे बाद एशेज जीता था.

मगर सवाल है कि आखिर हम कब तक अतीत के सहारे अपना भविष्य देखेंगे? हम कब तक बुरे प्रदर्शऩ की अनदेखी करते रहेंगे? और हम कब तक फ्लैचर के खिलाफ उठती आवाजों को अनसुनी करते रहेंगे?

दरअसल, सच्चाई ये भी है कि क्रिकेट वर्ल्ड में भारतीय टीम को कोचिंग देना, सोने के अंडे देने वाली मुर्गी के हाथ लगने जैसा है, यहां बेशुमार पैसा है, जो एक सीजन भी टीम इंडिया को कोचिंग दे दे तो वो मालामाल हो जाता है. क्योंकि, यहां क्रिकेट में पैसा बहुत है.

भारतीय टीम में एक दशक पहले विदेशी कोच रखने की परंपरा नहीं थी. न्यूजीलैंड के जॉन राइट भारत के पहले विदेशी कोच थे. उनकी अगुवाई में टीम वर्ल्ड कप के फाइनल में पहुंची  थी. इस सफलता ने ही विदेशी कोच के आगमन का दरवाज़ा खोला था, इसके बाद ऑस्ट्रेलिया के ग्रेग चपैल ने भारतीय टीम को कोचिंग दी, मगर उनके हाथ नाकामयाबी लगी.

फिर साउथ अफ्रीका के गैरी कर्स्टरन टीम के कोच बने, जिसके नेतृत्व में भारत ने वर्ल्ड कप जीता, लेकिन फ्लैचर सबसे घटिया कोच अभी तक टीम इंडिया के लिए साबित हो रहे है. सबसे अहम सवाल है कि बीसीसीआई विदेशी कोच पर ही इतनी एतबार क्यों करती है?

जबकि भारत में ही वर्ल्ड क्लास के प्लेयर मौजूद हैं, भारतीय टीम के प्लेयर भी विदेशी टीम को कोचिंग देते रहे है. प्रश्न ये भी है कि विदेशी कोच ही यदि कामयाबी का पैमाना होती तो 1983 का वर्ल्ड कप भारत ने कैसे जीत लिया? उस वक्त तो न विदेशी कोच थे और न ही वर्ल्ड लेवल के प्लेयर?

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को इस पर गंभीर चिंतन करने की ज़रूरत है, क्योंकि एक कोच गुरू के समान होता है, जिसके गुरू मंत्र से किसी भी टीम की तकदीर और तस्वीर दोनों बदल सकती है.

(लेखक इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में दस सालों से कार्यरत हैं.) 

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