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BeyondHeadlines > Exclusive > चीन के जासूस सरकार में !
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चीन के जासूस सरकार में !

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published May 19, 2013 18 Views
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10 Min Read
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सोनिया और मनमोहन की अगुवाई वाली संस्था के साथ भारत में जासूसी कर रही है चीन की संस्था… चीन की इस संस्था में भरे पड़े हैं, चीनी सेना के जनरल और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के आला अधिकारी… पेश है  BeyondHeadlines  के लिए Afroz  Alam Sahil की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट…

 BeyondHeadlines एक ऐसी कहानी से पर्दा उठाने जा रहा है जो इस देश के वर्तमान सरकार को ही सवालों के घेरे में डाल देगी. ये कहानी चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी और देश के सबसे ताक़तवर राजनीतिक घराने के बीच के रिश्तों पर भी कई सवाल खड़े करेगी.

आखिर चीन की एक सरकारी संदेहास्पद संस्था के लोगों से देश के सबसे ताकतवर राजनीतिक घराने का क्या संबंध है? आखिर चीन की यह संस्था भारत की एक ऐसी संस्था के साथ क्यों काम कर रही है जिसके पदाधिकारियों में देश के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार के सदस्यों से लेकर देश की सरकार के मुखिया तक शामिल हैं? आखिर चीन की इस संस्था में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पदाधिकारी क्या कर रहे हैं?

BeyondHeadlines  जिस कहानी से पर्दा उठाने जा रहा है, उसे सुनने के बाद ये सवाल बहुत ही वाजिब तरीके से खड़ा होगा कि क्या चीनी जासूस हमारे देश की सरकार के भीतर तक घुसपैठ कर चुके हैं?

दरअसल ये कहानी चीन की एक ऐसी सरकारी संस्था की है जिसका काम ही दूसरे देशों से खुफिया जानकारियां जुटाना है. यह संस्था भारत की उस संस्था के साथ मिलकर काम कर रही है, जिसकी कार्यकारिणी में पूरी भारत सरकार ही शामिल है.

यह घालमेल उस दौर में भी जारी है जब चीन हमारी सीमा में 19 किलोमीटर भीतर तक घुसने की हिमाकत कर चुका है और संसद से लेकर सड़क तक चीन की इस जबरदस्ती के खिलाफ जमकर आवाजें उठ रही हैं.

CHINA PM IN INDIA… CHINA’S SPY IN INDIAN GOVERNMENT!

कौन है चीन की ये सरकारी जासूसी संस्था…?

चीन की इस बेहद ही ताकतवर संस्था का नाम है, “चाइना एसोसिएशन फार इंटरनेशनल फ्रैंडली कांटैक्ट.” यह संस्था चीन की सत्ताधारी चाइना कम्युनिस्ट पार्टी और चीन की ही पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के लिए काम करती है. इस संस्था के पदाधिकारियों में चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी और साथ ही पीएलए यानि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के ताकतवर अधिकारी शामिल हैं.

भारत में कौन सा संगठन इस संस्था के साथ मिलकर काम करता है…?

चाइना एसोसिएशन फार इंटरनेशनल फ्रैंडली कांटैक्ट भारत के जिस संगठन के साथ मिलकर काम करती है, उसका नाम है राजीव गांधी सेंटर फार कंटेमपररी स्टडीज. ये संगठन अपने आप में बेहद ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इसकी कार्यकारिणी में लगभग पूरी की पूरी भारत सरकार ही शामिल है. राजीव गांधी सेंटर फार कंटेमपररी स्टडीज, राजीव गांधी फाउंडेशन का अहम हिस्सा है.

इस संस्था में हैं कौन कौन…?

राजीव गांधी सेंटर फार कंटेपररी स्टडीज की चेयरपर्सन सोनिया गांधी हैं. इसके ट्रस्टियों में प्रियंका गांधी, राहुल गांधी, मनमोहन सिंह, पी चिंदंबरम, मोंटक सिंह अहलूवालिया, जयराम रमेश, सुमन दूबे समेत कांग्रेस पार्टी व सरकार के कई ताकतवर चेहरे शामिल हैं.

किस तरह से काम करते हैं दोनों संगठन…?

ये दोनो ही संस्थाएं एक दूसरे के साथ एक्सचेंज प्रोग्राम, पीपुल टू पीपुल कांटैक्ट, अकेडमिक सेमिनार समेत कई प्रोग्रामों के जरिए काम करती हैं. इसका पूरा ब्योरा राजीव गांधी फाउंडेशन की वेबसाइट पर मौजूद है.

चाइना की संस्था जासूसी संस्था कैसे…?

इस बात के एक नहीं कई सबूत हैं—

पहला सबूत :  इस संस्था में चाइना कम्युनिस्ट पार्टी और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के अधिकारी भरे पड़े हैं. संस्था की वेबसाइट अपने आप में इस बात की गवाह है जहां पीएलए और चाइना कम्युनिस्ट पार्टी के इन ओहदेदारों के नाम दिए गए हैं.

दूसरा सबूत : यूएस चाइना इकोनामिक एंड सिक्योरिटी रिव्यू कमीशन साल 2011 की अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट में इस बात का जिक्र कर चुका है कि ये संस्था पीएलए व चीनी सरकार की ओर से “इंटेलीजेंस गैदरिंग” या खुफिया सूचनाएं जुटाने का काम करती है. इस कमीशन ने इसे पीएलए यानि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की फ्रंट भी करार दिया था और साथ ही इसमें मौजूद चीनी सेना के मौजूदा व रिटायर्ड जनरलों पर तीखी टिप्पणी की थी.

तीसरा सबूत :  अमेरिका की ही “फेडरेशन आफ अमेरिकन साइंटिस्ट” भी इसे चाइनीज इंटेलीजेंस एजेंसी की श्रेणी में रखती है. इस फेडरेशन के मुताबिक यह संस्था विदेशी सेनाओं, रक्षा विभाग और राजनीतिक तंत्र से सूचनाएं लेने और उनका मोरैल डाउन करने का काम करती है. ध्यान देने वाली बात है कि फेडरेशन आफ अमेरिकन साइंटिस्ट अमेरिका की सबसे पुरानी वैज्ञानिक संस्थाओं में से एक है जिसके वैज्ञानिकों ने ही पहला परमाणु बम बनाया था. यह अनुसंधान के साथ ही सुरक्षा और आतंकवाद पर भी काम करती है.

चौथा सबूत : भारतीय खुफिया विभाग के पूर्व अधिकारी भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह संस्था पीएलए का ही एक फ्रंट है. खुफिया विभाग के अधिकारियों की माने तो ये संस्था कश्मीरी अमेरिका काउंसिल चलाने वाले गुलाम नबी फाई के संगठन की तरह काम करती है जिसे अमेरिका ने इस आरोप में गिरफ्तार किया था कि वह आईएसआई के पैसों पर कश्मीर की आजादी के नाम पर दुनिया भर से एक्सचेंज प्रोग्राम चलाता और सेमीनार कराता था जिसमें भारत के भी कई पत्रकारों ने शिरकत की थी. चाइना एसोसिएशन फार इंटरनेशनल फ्रैंडली कांटैक्ट के बारे में थोड़ा सा अध्ययन किया जाए, तो यह हकीकत एक झटके में आंखों के सामने तैर जाती है.

पांचवा सबूत : जेएनयू के सेंटर फार ईस्ट एशियन स्टडीज के सूत्रों के मुताबिक वे इस संगठन के लोगों से मिले हैं. इन्हें जानते हैं और ये सच है कि यह चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी की ही एक विंग है और इन पर इंटेलीजेंस गैदरिंग का शक नाजायज कतई नहीं है.

राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन की इस संस्था से फाइनैंसिंग भी…

चीन की ये संस्था राजीव गांधी इंस्टीट्यूट को अब तक कुल 3 लाख यूएस डालर दे चुकी है. राजीव गांधी इंस्टीट्यूट इस संस्था से एक मिलियन यूएस डालर प्राप्त करने की आशा रखता है, यह बात उसने डिक्लेयर भी की है. जब जब चीन के राष्ट्रपति भारत आते हैं, चाहे वो हू जिंताओ हों या वेन जियाबाओ, ये संस्था राजीव गांधी इंस्टीट्यूट को फंडिग करती है. फंडिग केवल उसी राजीव गांधी इस्टीट्यूट को क्यूं की जाती है, जिसमें सोनिया से लेकर प्रधानमंत्री तक शामिल हैं, ये अपने आप में एक बहुत बड़ा सवाल है.

 एमएचए का सर्कुलर…

एमएचए का साफ सर्कुलर है कि चीन और पाकिस्तान से जुड़ी कोई भी संस्था अगर भारत में एक सेमीनार तक करना चाहती है तो उसे दोहरी मंजूरी लेनी होगी. यानि मिनिस्ट्री आफ एक्सटर्नल अफेयर के साथ-साथ मिनिस्ट्री आफ होम से भी. और यह एक बेहद ही तकलीफ देह प्रक्रिया होती है. ऐसे में चीन की इस संस्था के साथ इतनी मेहरबानी क्यूं की जा रही है, जिसमें घोषित तौर पर चीनी सेना के जनरल और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के आला अधिकारी शामिल हैं.

इस स्टोरी से जुड़े सवाल—

1—आखिर चीन की एक सरकारी जासूसी संस्था भारत में क्या कर रही है?

2—यह संस्था आखिर भारत में एक ऐसे संगठन से साथ टाइअप क्यों करती है जिसमें पूरी की पूरी सरकार ही शामिल है?

3—इस संस्था में चीनी सरकार और चीनी सेना के अधिकारी क्या कर रहे हैं?

4—क्या भारत सरकार किसी ऐसी संस्था को भारत में काम करने की इजाज़त दे सकती है जिसमें पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के अधिकारी शामिल हों, फिर चीन के साथ ये अप्रत्याशित नरमी क्यूं?

5—एमएचए और मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स क्या कर रही है. पाकिस्तान और चीन की संस्थाओं के लिए यहां विशेष सर्कुलर काम करते हैं?

6—यूएसए के साथ न्यूक्लियर डील करने के लिए उसके आगे बिछ जाने वाली सरकार ने आखिर उससे इस संस्था के बार में इनपुट क्यों नहीं लिया गया?

इन सवालों के जवाब जानने बेहद ही ज़रूरी हैं. ये जवाब जब तक नहीं मिलेंगे, भारत की सबसे ताकतवर संस्था के साथ मिलकर काम कर रही चीन की इस संस्था के इरादों पर सवाल उठते रहेंगे, और ध्यान रहे ये सवाल सीधे तौर पर देश की संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़े हैं, जिनकी अनदेखी करने का खतरा किसी भी सूरत में नहीं उठाया जा सकता है.

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