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BeyondHeadlines > Exclusive > शीला के उर्दू-प्रेम का सच…
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शीला के उर्दू-प्रेम का सच…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published November 10, 2013 14 Views
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8 Min Read
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Afroz Alam Sahil for BeyondHeadlines

नई दिल्ली : जैसे-जैसे दिल्ली विधान सभा चुनाव करीब आ रहा है, शीला दीक्षित पर उर्दू-प्रेम सर चढ़कर बोल रहा है. उन्हें जब भी मौका मिलता है अपना उर्दू प्रेम जगजाहिर कर दे रही हैं. कई मौकों पर तो उन्होंने घड़याली आंसू भी बहाए हैं. उर्दू के विकास के लिए उन्होंने तमाम बड़े वादे भी किए हैं. लेकिन ज़मीनी हकीक़त पर उनके वादे मात्र चुनावी स्टंट और आंसू दिखावा ही साबित होते हैं. उर्दू के साथ दिल्ली सरकार का सौतेला व्यवहार साफ नज़र आता है. शायद यही वजह है कि शीला दीक्षित के दफ्तर में एक भी उर्दू अखबार या मैग्ज़ीन नहीं आता है.

वेल्फेयर पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय सचिव डॉ. क़ासिम रसूल इलियास को मुख्यमंत्री कार्यालय से आरटीआई के ज़रिए मिली जानकारी के मुताबिक शीला दीक्षित के दफ्तर में कुल 19 अख़बार व 21 मैग़्ज़ीन आते हैं. और इनमें से एक भी दिल्ली की द्वितीय भाषा कही जाने वाली उर्दू या पंजाबी का नहीं है. हालांकि हिन्दी भाषा के साथ भी सलूक भी कोई ज़्यादा बेहतर नहीं है. शायद यही वजह है कि 19 अखबारों में सिर्फ 7 ही हिन्दी भाषा के अखबार हैं. वहीं 21 मैग़्ज़ीनों में एक भी हिन्दी या किसी दूसरे भाषा का नहीं है, सारे के सारे अंग्रेज़ी भाषा के ही मैग़्ज़ीन्स हैं. और इन 21 मैग़्ज़ीनों की लिस्ट को देखने से अंदाज़ा होता है कि मुख्यमंत्री  दफ्तर के अधिकारियों को करेन्ट अफेयर्स या राजनीति से कोई खास दिलचस्पी नहीं है. शायद यही वजह है कि यहां फेमिना, गुड हाउस कीपिंग, स्मार्ट लाईफ, इन्साइड-आउटसाईड, गुड होम, एम्पलाएमेंट न्यूज़, वूमेन्स एरा, गृहशोभा, नेशनल ज़्योग्राफी, पॉपुलर साइंस, पीसी क्वेस्ट, पीसी वर्ल्ड, डीजिट व चीप जैसे मैंग़्ज़ीन्स ही आते हैं.

मीठी उर्दू की कड़वी सच्चाई यह है कि अब इसे दिल्ली के स्कूलों से समाप्त करने की पूरी तैयारी चल रही है. नई दिल्ली म्यूनिसिपल काउंसिल (एनडीएमसी) से आरटीआई के ज़रिए मिली जानकारी के मुताबिक एनडीएमसी के नवयुग स्कूल एजुकेशनल सोसायटी के तहत दिल्ली में चल रहे स्कूलों में उर्दू शिक्षक का एक भी पद नहीं रखा गया है. यह हाल सिर्फ उर्दू का ही नहीं, बल्कि पंजाबी भाषा का भी है. जबकि यह दोनों भाषाएं दिल्ली की दूसरी सरकारी भाषा है. नवयुग एजुकेशनल सोसायटी के तहत दिल्ली में कुल 11 सरकारी स्कूल चल रहे हैं, जिनमें तीन प्राईमरी, एक मिडिल और 7 सीनियर सेकेंड्री स्कूल शामिल हैं.

नवयुग स्कूल एजुकेशनल सोसायटी के स्कूलों के अलावा एनडीएमसी के 8 सीनियर सेकेंड्री स्कूल, 6 सेकेंड्री स्कूल, 6 मिडिल स्कूल, 21 प्राईमरी स्कूल और 18 नर्सरी स्कूल हैं. इन 59 स्कूलों में उर्दू भाषा के लिए 64 शिक्षकों (पीजीटी व टीजीटी दोनों मिलाकर) के पद रखे गए हैं. लेकिन 64 शिक्षकों में से भी 11 उर्दू शिक्षकों के पद रिक्त हैं. दिलचस्प बात तो यह है कि पंजाबी भाषा के लिए इन 59 स्कूलों में सिर्फ 2 शिक्षकों को ही पंजाबी भाषा पढ़ाने के लिए रखा गया है.

उत्तरी दिल्ली नगर निगम से मिली जानकारी भी यही बताती है कि उत्तरी दिल्ली नगर निगम में उर्दू व पंजाबी शिक्षकों के लिए कोई भी पद नहीं रखा गया है. यानी उर्दू यहां से भी नदारद है.

शिक्षा निदेशालय के ज़ोन-19, ज़िला साउथ-वेस्ट-ए, वसंत विहार से आरटीआई से मिले जानकारी के मुताबिक इस ज़ोन में भी उर्दू भाषा के लिए एक भी शिक्षक का पद नहीं रखा गया है. यानी इस ज़ोन के किसी भी स्कूल में उर्दू भाषा को बतौर विषय नहीं पढ़ाया जाता है. जबकि इस ज़ोन में कुल 21 सरकारी स्कूल हैं और सारे स्कूलों में संस्क़त,म्यूज़िक और योग के टीचर्स बहाल हैं. शिक्षा निदेशालय का ज़ोन-20 भी यही कहानी बयान कर रहा है. यहां भी उर्दू सियासी ज़ुल्म का शिकार बन रही है. किसी भी स्कूल में उर्दू के लिए एक भी टीचर बहाल नहीं है.

इस संबंध में डॉ. क़ासिम रसूल इलियास का कहना है कि जब प्राइमरी और मिडिल स्कूल में ही उर्दू बाकी नहीं रहेगी तो आला तालीम के लिए उर्दू के छात्र कहां से आएंगे?अगर सरकार वाकई उर्दू के प्रति संजीदा है तो सबसे पहले प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती की जानी चाहिए.  इससे एक ओर हज़ारों उर्दू जानने वालों को रोज़गार मिलेगा. वहीं दूसरी ओर छात्र-छात्राओं के लिए उर्दू पढऩा आसान हो जाएगा. जो लोग शिक्षक की कमी की वजह से चाहकर भी उर्दू नहीं पढ़ पाते हैं. उनके अधिकारों की रक्षा भी होगी.

दिल्ली के शिक्षा निदेशाल से आरटीआई द्वारा मिले अहम दस्तावेज़ यह बताते हैं कि दिल्ली में कुल 29444 शिक्षकों के पद रखे गए हैं, जिनमें 19675 पदों पर ही शिक्षक कार्यरत हैं. यानी 9769 शिक्षकों के पद फिलहाल रिक्त हैं.

आरटीआई से मिले जानकारी के मुताबिक अंग्रेज़ी भाषा के लिए कुल 5096 शिक्षकों के पद रखे गए हैं, जिनमें 3438 पदों पर ही शिक्षक कार्यरत हैं. यानी 1658 (32%)शिक्षकों के पद फिलहाल रिक्त हैं.  वहीं, हिन्दी भाषा के लिए कुल 4606 शिक्षकों के पद रखे गए हैं, जिनमें 3376 पदों पर ही शिक्षक कार्यरत हैं. यानी 1230 (26%)शिक्षकों के पद फिलहाल रिक्त हैं. यही नहीं, संस्कृत भाषा के लिए भी कुल 4179 शिक्षकों के पद रखे गए हैं, जिनमें 2463 पदों पर ही शिक्षक कार्यरत हैं. यानी 1716 (41%) शिक्षकों के पद फिलहाल रिक्त हैं. वहीं दूसरी तरफ दिल्ली में दूसरी सरकारी भाषा मानी जाने वाली उर्दू भाषा के लिए सिर्फ 262 शिक्षकों के पद ही रखे गए हैं,जिनमें 70 पदों पर ही शिक्षक कार्यरत हैं. 192 यानी 73% शिक्षकों के पद फिलहाल रिक्त हैं. यही हाल दिल्ली में पंजाबी का भी है. पंजाबी भाषा के लिए कुल 254 शिक्षकों के पद रखे गए हैं, जिनमें 150 पदों पर ही शिक्षक कार्यरत हैं. यानी 104 (40%) शिक्षकों के पद फिलहाल रिक्त हैं. पंजाबी भी दिल्ली की दूसरी सरकारी भाषा है. यह अलग बात है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों को ड्राईंग सिखाने के लिए 1054 व म्यूज़िक सिखाने के लिए 334 शिक्षको के पद रखे गए हैं.

उर्दू से बेरूखी का आलम यह है कि साल 2009 में उर्दू शिक्षकों की बहाली हेतु दिल्ली सरकार के ‘Delhi Subordinate Service Services Selection Board’ द्वारा वैकेंसी निकाली गई. हज़ारों उर्दू जानने वालों ने इसके लिए आवेदन दिया. लेकिन आवेदकों को परीक्षा के लिए 4 साल का लंबा इंतज़ार करना पड़ा. पूरे 4 सालों के इंतज़ार के बाद 28 अप्रैल, 2013 को यह परीक्षा आयोजित की गई, और 4 जुलाई, 2013 को रिजल्ट भी जारी कर दिया गया, लेकिन अभी तक किसी की बहाली नहीं की गई है. BeyondHeadlines से बात करते हुए आवेदक दिलशाद, सलीम, मंजूर व नाज़नीन का कहना है कि यह उर्दू के साथ मज़ाक नहीं तो और क्या है?

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