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बात-चीत शुरू करें, लोगों को मिलने दें

Ashish Shukla for BeyondHeadlines

पाकिस्तान अध्ययन का छात्र होने के नाते, जब ट्रस्ट फॉर हिस्ट्री आर्ट एंड आर्किटेक्चर ऑफ़ पाकिस्तान (थाप) ने मुझे लाहौर में होने वाले एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में शोध-पत्र पढ़ने का न्योता दिया तो मैं अपने आपको दूसरी पाकिस्तान यात्रा के लिए तैयार होने से न रोक सका.

जुलाई में न्योता मिलने के कुछ समय बाद ही भारत सरकार ने दोनों देशों (भारत और पाकिस्तान) के बीच होने वाली विदेश सचिव स्तर की बात-चीत रद्द कर दी, जिसके कारण द्विपक्षीय वातावरण दूषित हो गया. स्थिति तब और भी गंभीर हो गयी जब दोनों देशों की सेनाओं ने लाइन ऑफ कंट्रोल और अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर 2003 सीजफायर लाइन का उल्लंघन किया. भारत-पाकिस्तान के बीच दुर्घटना-संभावित सम्बन्ध को देखते हुए यह प्रश्न कि किसने पहली गोली चलाई कम महत्वपूर्ण हो जाता है.

इस तरह के वातावरण में पाकिस्तानी वीज़ा मिलने की सभी उम्मीदें तब ख़त्म हो गयीं जब संगोष्ठी आयोजकों ने अक्टूबर में हमें यह सूचना दी कि पाकिस्तान की इंटीरियर मिनिस्ट्री संगोष्ठी में भाग लेने के लिए भारतीय अध्येताओं के नाम को अनुमोदित करने के सम्बन्ध में उनकी मांग का कोई जवाब नहीं दे रही है.

मैंने भी इस बात पर मन बना लिया था कि 9 नवंबर 2014 को मेरा शोधपत्र कोई और पढ़ देगा. लेकिन 6 नवम्बर की दोपहर में आयोजकों ने हमें सूचित किया कि इंटीरियर मिनिस्ट्री ने सभी भारतीय अध्येताओं के नाम का अनुमोदन कर दिया है और हमें वीजा के लिए आवेदन करना चाहिए.

अगले दिन शुक्रवार था. सप्ताहांत नज़दीक होने के कारण हमारे पास वीजा के लिए आवेदन और उसे प्राप्त करने के लिए एक ही दिन शेष था. मैंने शुक्रवार को सभी ज़रूरी कागजात के साथ अपना आवेदन नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग को सौंप दिया और उच्चायोग के अधिकारियों से अनुरोध किया कि मुझे उसी दिन वीज़ा दे दें ताकि मैं संगोष्ठी में भाग ले सकूं. पाकिस्तानी उच्चायोग के अधिकारियों ने वैसा ही किया और मैं एक युवा भारतीय शोधकर्ता को इतने कम समय में वीज़ा देने के लिए उनकी सराहना करता हूँ.

अगले दिन 7 नवंम्बर को जैसे ही मैंने अटारी-वाघा सीमा पार की मुझे पता चला कि मैं अकेला भारतीय डेलिगेट था जो यह कर सका.

पाकिस्तान जाने का निर्णय आसान नहीं था. ठीक कुछ दिनों पहले 2 नवम्बर को पाकिस्तानी सीमा में हुए एक आत्मघाती हमले में कम से कम 55 लोग मारे गए थे और एक सौ पचास से अधिक घायल हुए थे. फिर भी मेरे परिवार ने मेरे निर्णय का विरोध नहीं किया जैसा कि उन्होंने मेरी दिसंबर 2013 में एल.यू.एम.एस. के न्योते पर पहली पाकिस्तान यात्रा के समय किया था. पाकिस्तान अब उनके लिए कोई एलियन और प्रतिपक्षी जगह नहीं थी क्योंकि उन्हें पता था कि किस तरह की गर्मजोशी, सम्मान और आतिथ्य मुझे मिला था.

इस बार भी मुझे बहुत बढ़िया अनुभव हुआ, सिवाय एक पुलिस वाले द्वारा मुझे परेशान करने की कोशिश की. यह लिबर्टी पुलिस थाना था, जहाँ मुझे अपने आगमन और प्रस्थान की सूचना देनी थी. उस पुलिस वाले ने मुझे रोज़ एक बार वहां रिपोर्ट करने को कहा और मुझसे भारतीय रुपया लेने का प्रयास भी किया. लेकिन यह हमारे क्षेत्र की पुलिस की प्रकृति में है. मुझे विश्वास है कि भारत आने वाले पाकिस्तानियों के साथ भी यह होता है.

कुल मिलकर केवल संगोष्ठी में ही नहीं, बल्कि बाज़ारों —लिबर्टी मार्केट, अनारकली बाज़ार, बनो बाज़ार— में जहाँ मैं खरीददारी के लिए गया. पाकिस्तानी लोग बाहें फैलाकर मुझसे मिले. अनारकली बाज़ार में मैंने 6 हस्तशिल्प ख़रीदे. विनम्र और मृदुभाषी दुकानदार ने न केवल मुझे छूट दी बल्कि एक छोटा उपहार भी दिया. दोनों चालक जो मुझे लाते और ले जाते थे. बहुत अच्छे थे. टूर गाइड, जो हमारे साथ दिल्ली गेट से लाहौर किले तक साथ थे, यह जानकार बहुत खुश हुए कि उनके समूह में एक भारतीय भी था और उन्होंने वर्णन करते समय लाहौर के बारे में मुझे विशेष रूप से बताया.

कई युवा पाकिस्तानियों और बांग्लादेश और श्रीलंका से आये हुए अध्येताओं से अपनी बात-चीत से मुझे महसूस हुआ कि हम दक्षिण एशियाई युवा समान आकांक्षाएं, अपेक्षाएं, सपने, अन्तर्निहित शक्ति, उर्जा और सबसे महत्वपूर्ण सीमा पार दोस्त बनाने और साथ-साथ शांतिपूर्वक रहने की इच्छा रखते हैं.

मैं और भी अधिक दृढ़-विश्वासी हो गया हूं कि लोगों के स्तर पर भारत और पाकिस्तान के बीच एक उत्कृष्ट सम्बन्ध है. हालांकि आधिकारिक स्तर पर स्थिति प्रोत्साहक नहीं है. सीमाओं के दोनों तरफ कुछ समूह हैं जिनका निहित स्वार्थ दोनों परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी देशों के बीच शत्रुता बनाये रखने में है. ये समूह लोगों को एक दूसरे से नहीं मिलने देना चाहते हैं, क्योंकि इस तरह मिलने से दोनों तरफ के लोगों के बीच एक दूसरे के प्रति जो गलत फहमियां हैं वह ख़त्म हो जाएंगी. दूसरी तरफ, इस तरह से मिलने से लोग दोनों देशों द्वारा प्रचारित आधिकारिक बयानों और इतिहास पर प्रश्न चिन्ह लगाना शुरू कर सकते हैं.

भारत में यह समझा जाता है कि पाकिस्तानी रक्षा अधिष्ठान को इस शत्रुता से फायदा होता है इसलिए वह लोगों के एक-दूसरे से मिलने और बात-चीत करने के मार्ग में कई तरीकों से रूकावट डालता है. लेकिन तब भारत, जो कि अपेक्षाकृत बड़ा देश है “बड़ा भाई है” को कौन सी बातें पाकिस्तानी छात्रों, अकादमिक, और थिंक-टैंक शोधकर्ताओं को वीज़ा देने से रोकती हैं?

एक मात्र आधिकारिक जस्टिफिकेशन यह दिया जाता है कि आतंकवादी इस तरह माध्यम का उपयोग करके भारत के लिए समस्या उत्पन्न कर सकते हैं. कितना मूर्खतापूर्ण तर्क है यह; आतंकवादी वीज़ा के लिए आवेदन नहीं करते. वे अपनी योजनाओं और सुविधा के अनुरूप सीमा पार करते हैं. भारत के लिए यह उपयुक्त समय है कि वह इस सन्दर्भ में कुछ सकारात्मक क़दम उठाए और पहले की गयी गलतियों को ठीक करे.

सबसे पहले तो भारत को आधिकारिक वार्ता प्रक्रिया फिर से प्रारंभ करनी चाहिए. दोनों देशों के मध्य सभी तरह के झगड़ों को निपटाने के लिए बात-चीत एक मात्र और सबसे अधिक प्रभावी तथा कार्य साधक रास्ता है. अन्य सारे तरीके इतने मंहगे हैं कि उनका विचार करना भी व्यर्थ है.

दूसरे, भारत को वीज़ा रिजीम को व्यवस्था को उदार बनाना चाहिए तब भी जब पाकिस्तान ऐसा न करे. ये क़दम दोनों देशों के संबंधों पर सकारात्मक प्रभाव डालेंगे और पाकिस्तान के उदार वर्ग, जो भारत से शांति और मित्रता की वकालत करता है, को मज़बूत करेंगे.

पाकिस्तान को भी भारतीय छात्रों और अध्येताओं, जो अकादमिक कार्यों के लिए पाकिस्तान जाना चाहते हैं, को बिना पुलिस रिपोर्टिंग वाला वीज़ा देने को प्रथम वरियता देनी चाहिए. इनकी पाकिस्तान के प्रति सकारात्मक धारणा भारत सहित विश्व समुदाय को पाकिस्तान के बहुआयामी और सकारात्मक पक्षों के बारे में विश्वास दिलाएगी. अध्येताओं, शोधकर्ताओं और अकादमिक समुदाय को अभिगमन न करने देना या इसे कठिन बनाने से इस्लामाबाद केवल देश की नकारात्मक छवि को आगे बढ़ाने का काम करता है. इसके अतिरिक्त पाकिस्तान को भारतीय चिन्ताओं के समाधान के लिए भी आवश्यक क़दम उठाने चाहिए.

(Author is Ph.D. Candidate, South Asian Studies, School of International Studies in JNU, New Delhi.)

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