Mango Man

कहीं ऐसा ना हो कि हम भी भारत के अगले रोहिंग्या हों…

By Khurram Malick

बिहार में लालू और यूपी में मायावती के आने से पहले यादवों और दलितों के हालात पर ज़रा ग़ौर कीजिए. पहले इन दोनों समाज के लोगों का सवर्णों ने जमकर प्रताड़ित किया, शोषण किया. हालात तो यह थे कि यह लोग स्वर्ण जाति के साथ बैठना तो दूर, खड़े भी नहीं हो सकते थे. स्वर्ण इनको अछूत समझते थे. लेकिन जैसे ही लालू और मायावती का राजनीति में उदय हुआ, अचानक से हालात ने करवट ली. कल तक जिस यादव और दलित को मारा जाता था, उन्हें सम्मान मिला, अधिकार मिला. स्वर्ण उन्हें साथ लाने पर मजबूर हुए. उनके साथ खाने पर विवश हुए.

इस तरह से यह दोनों समाज सिस्टम की मुख्यधारा में आए. और आज इन दोनों राज्यों में यह दोनों समाज एक शक्ति का रूप ले चुके हैं. इसके पीछे वजह सिर्फ़ यही थी कि इनके बीच से ही एक इंसान उठा और उसने राजनीति में अपनी भागीदारी मांगी, जो सबका अधिकार है. यहां तक कि इन दोनों समाज के मुखिया अपने-अपने राज्य के मुख्यमंत्री तक हुए.

देश की राजनीति में यह दोनों किंग-मेकर साबित हुए. देश की राजनीति में सीधे तौर से तो असर नहीं रखते थे, लेकिन यह किसी भी पार्टी को घुटनों के बल कभी भी गिरा सकते थे. यह क्यों कर मुमकिन हुआ? क्योंकि इन दोनों समाज ने अपने बीच से लीडर चुना और उसे लीडर माना. झोली भर-भर कर वोट दिया, जिसका नतीजा यह हुआ कि एकछत्र राज स्थापित किया.

अब असल मुद्दे की तरफ़ आते हैं. आज मुस्लिम समाज की हालत दलितों से भी बदतर है. सच्चर कमिटी रिपोर्ट देख लीजिए. रंगनाथन मिश्रा कमीटी रिपोर्ट पढ़ लीजिए. 70 सालों तक कांग्रेस ने ख़ूब जमकर हमारा इस्तेमाल किया, लेकिन हमारे लिए बनी रिपोर्ट को कूड़े में फ़ेंक दिया. उन्हें सिर्फ़ हमारे वोटों की ज़रुरत थी, जिसका फ़ायदा उन्होंने बख़ूबी उठाया.

जो भी मुस्लिम लीडर कांग्रेस में हुए वह कभी पार्टी लाइन से बाहर निकल कर मुस्लिमों की बदहाली के लिए बोल ही नहीं पाए. क्योंकि उनके हाथ बंधे थे. कुछ बोलते तो कुर्सी से हाथ धोना पड़ता. इसीलिए चुप्पी की चादर ओढ़े लंबी तानकर सोते रहे और सत्ता की मलाई चाटते रहे.

मिसाल के तौर पर किशनगंज से सांसद मौलाना असरारूल हक़ क़ासमी को ही ले लीजिए. तीन तलाक़ के मुद्दे पर जब इन्हें बेबाकी से बोलना था तब ये जनाब सदन से ही ग़ायब नज़र आएं. जब इनसे सवाल किया गया तो बहाने बनाने लगे. आप ग़ुलाम नबी आज़ाद का दर्द सुन और पढ़ ही चुके हैं.

मैं मिसाल के ज़रिए इसे समझाता हूं. केरल में एक पार्टी है इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग. जब इस पार्टी का गठन हुआ तब इस पर बहुत सारे आरोप लगे. पाकिस्तानी और जिन्ना के वारिस तक कहा गया, लेकिन इससे पार्टी पर असर नहीं पड़ा.

पार्टी ने अपनी मेहनत जारी रखी. नतीजा यह हुआ कि 1982 में पार्टी 14 विधायकों के साथ असेंबली तक पहुंची. मज़े की बात तो यह है कि जब-जब चुनाव के बाद वहां किसी भी पार्टी (कांग्रेस,लेफ़्ट) को बहुमत प्राप्त नहीं हुआ तो ना चाहते हुए भी दोनों पार्टी के नेता इंडियन मुस्लिम लीग के पास आए और भीक मांगने के अंदाज़ में उनसे समर्थन मांगा. जबकि इन्हीं लोगों ने इस पार्टी पर कैसे-कैसे इलज़ाम लगाए थे.

सत्ता में भागीदारी की ताक़त इसे ही कहते हैं. नतीजा यह हुआ कि उनके सारे जीते हुए विधायकों को सम्मानित पद और मंत्रालय दिया गया. आज हालात यह है कि पार्टी केरल में विपक्ष की भूमिका में दूसरी बड़ी पार्टी है. यह इस वजह से मुमकिन हो सका, क्योंकि कुछ लोगों ने अपनी सियासी समझ का विस्तार किया. इसकी ताक़त को समझा. जिसका नतीजा हमारे सामने है.

मैं यही कहना चाहता हूं कि हालात की नब्ज़ को हमें टटोलना होगा. सियासी तौर पर ख़ुद को स्थापित करना होगा. क्योंकि जब हम सियासी तौर पर मज़बूत होंगे तभी अपनी बात इन गूंगे-बहरे लोगों तक पहुंचा पाएंगे. नहीं तो दूसरी पार्टियों का झोला ढ़ोते-ढ़ोते एक दिन कुछ लोग हमें ढ़ोकर दो गज़ ज़मीन के नीचे डाल देंगे. फिर वही पार्टी जिसके लिए हम अपनी जान-माल की बाज़ी लगाने के लिए हमेशा तैयार रहे, वो हमें याद करना भी ज़रूरी नहीं समझेंगी.

इसलिए मौजूदा वक़्त की यही ज़रूरत है कि हमें अपनी आवाज़ खुद बनना होगा. अपनी क़यादत ख़ुद पैदा करनी होगी. तभी हम अपने देश में अपना हक़ मांग सकते हैं. नहीं तो रोहिंग्या मुसलमानों की हालत किसी से ढ़की-छिपी नहीं है. कहीं ऐसा ना हो कि हम भी अपने ही देश में अगले रोहिंग्या बन जाएं…

(लेखक पटना में एक बिजनेसमैन हैं. ये उनके अपने विचार हैं.)

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