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लो अब ‘फ़ज़ाइल-ए-अमाल’ किताब भी बन गई ‘जिहादी लिटरेचर’

कल अनुराग कश्यप साहब ने ट्वीट करके अमेज़न प्राइम पर आई एक नई वेब सिरीज़ के बारे में बताया. सिरीज़ का नाम पाताल-लोक है. मैंने इस सीरीज़ के बारे में गूगल पर सर्च किया, अमेज़न प्राइम पर हर एपिसोड की समरी पढ़ी. शायद चौथे या पांचवे एपिसोड में ‘टेररिस्ट’ लफ़्ज़ का ज़िक्र है. मैंने ये दो एपिसोड देखें.

कहानी ये है कि 4 लोग पकड़े गए हैं. एक नामी प्राइम टाइम जर्नलिस्ट की हत्या का इरादा था. पुलिस ने पहले ही पकड़ लिया और केस दिल्ली पुलिस के एक दरोगा के पास पहुंच गया. कहानी में एक बात ये है कि इसने इस्लामोफोबिया को कैप्चर करने की कोशिश की है. दारोगा के साथ एक और जूनियर अफ़सर है ‘अंसारी’. उसके साथ सिस्टम के अंदर कैसा ट्रीटमेंट होता है वो दिखाया गया है.

दोनों मिलकर तफ़्तीश कर रहे होते हैं कि फिर केस सीबीआई को ट्रांसफ़र कर दिया गया. सीबीआई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के बताया कि एक पाकिस्तान/आईएसआई की साज़िश के तहत एक टेरर अटैक था. चार पकड़े गए लड़कों में से एक मुसलमान था, उसके पास से पाकिस्तानी पासपोर्ट, हथियार के साथ साथ टेररिस्ट लिटरेचर भी मिला है.

इधर प्रेस कॉन्फ्रेंस में बैठे दरोगा और अंसारी को मालूम है कि सीबीआई की थ्योरी झूठी है. सीबीआई टेररिस्ट लिटरेचर के नाम पर एविडेंस के तौर पर जो किताबें दिखाती हैं वे किताबें हैं — फ़ज़ाइल-ए-अमाल, दावत और जन्नती ज़ेवर. अंसारी सामने बैठा सुन रहा है. ये भी मालूम है कि सीबीआई झूठी थ्योरी पेश कर रही है. एक बार को लगा कि उठ कर इन किताबों का ज़िक्र करेगा, कुछ बोलेगा.

मगर अंसारी भी उन किताबों को वही समझते हैं जो सीबीआई समझती है. उनको दिक्कत ये है कि किताबों पर जिस लड़के का नाम उर्दू में लिखा है (यानी जिसे टेररिस्ट) बताया जा रहा है, उस लड़के को उर्दू आती ही नहीं है. मतलब सिरीज़ में इन किताबों को बड़े आराम के साथ इन लोगों ने टेररिस्ट लिटरेचर बताकर पेश कर दिया.

ये सारी किताबें, ख़ासकर फ़ज़ाइल-ए-अमाल एक ऐसी किताब है जो अक्सर मस्जिदों में मिल जाएगी. देवबंद मकातिब-ए-फ़िक़्र से जुड़े सभी लोग अमूमन ये किताब पढ़ते हैं. साउथ-एशिया में मुसलमान घरों में सबसे ज़्यादा पढ़ी जानी वाली किताबों में से एक किताब है. सिरीज़ के डायरेक्टर्स ने क्या सोचकर ये किताबें चुनी होंगी? इस्लामी किताबों की दुकान पर जाकर पूछा होगा कि सबसे ज़्यादा कौन सी किताबें बिकती हैं. या जो सामने दिखी वो उठा लाएं?

इस सिरीज़ को बनाने वालों को अव्वल तो वो सीन हटाना चाहिए और दूसरा तुरंत माफ़ी मांगनी चाहिए. ऐसा न करने पर केस-वेस बुक हो सकता है तो लोग करें. मगर इसको बर्दाश्त या इग्नोर न करें.

(ये पोस्ट शरजील उस्मानी के फेसबुक टाइमलाइन से लिया गया है.)

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1 Comment

1 Comment

  1. Khurram rajpoot

    May 16, 2020 at 7:59 PM

    Sab saazish k tahat ho rha hai..q ki tablighi jamaat ghar waapsi krwa rahe logo k liye sbse badi rukawat hai q ki wo deeni ilm sikha rhe hain logo ko..jin musalmano k baap dada islam to qubool krliye mgr unke bcho ko deeni ilm na milne k wjah kr unkar rahan sahan mushriqo k jaisa tha yani bahot se shara’an hraam krte…to aise logo ko wapis hinduism me convert krana konsi badi bat hoti,magar tablighi jamat ne ilm baant kr isse rokdia..Rss ka dawa tha ki wo 2021 tk sbko convert kra legi or jitne bhi saiyyed pathan malik hain sbko wapis unke title k hisab se us mulk bhej degi ya zulm kr k jabran nikaldegi,magar ye cheez hota hua nazar nhi aa rha to tablighi jamat pr isi wjah se nishana saadha gaya hai…

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