#MeToo

क्या #MeToo भी ‘Not in My Name’ वाले हैशटैग की तरह कपूर बनकर उड़ जाएगा?

Abhishek Upadhyay

इस #MeToo में एक बड़ी ग़ौर करने वाली बात है. ये सारी महिलाएं पढ़ी-लिखी हैं. अपने पैरों पर खड़ी हैं. अपनी मर्ज़ी का जीवन जी रही हैं. कुछ तो अपने अपने क्षेत्रों की सेलिब्रिटी भी हैं.

पर इन सभी को अपना अपना #MeToo शेयर करने के लिए एक विशेष सीज़न का इंतज़ार था. शायद इससे पहले अगर बयां करतीं तो कोई सुनता नहीं! शायद इससे पहले किसी महिला ने अपने शोषण के ख़िलाफ़ कोई लड़ाई लड़ी नहीं होगी! शायद तरुण तेजपाल को सलाखों के पीछे पहुंचाने वाली महिला पत्रकार की आवाज़ भी इन्होंने नहीं सुनी होगी.

मैं ये भी दावे से लिख रहा हूँ कि इनमें से एक फ़ीसदी महिलाएं या शायद एक महिला भी फ़ेसबुक और ट्विटर पर चीखते अपने अपने इन “#MeToo” को कोर्ट में फॉलो नहीं करेगी. जबकि ये सारी घटनाएं आईपीसी के तहत संज्ञेय अपराध हैं. ये सारे के सारे “#MeToo” के हैशटैग बहादुरी के तमग़े की तरह कुछ दिनों तक गले मे लटकाए जाएंगे और फिर “Not in my name” वाले हैशटैग की तरह कपूर बनकर उड़ जाएंगे.

मैंने “इज़्ज़त के नाम पर” किताब पढ़ी है. पाकिस्तान की मुख्तार माई की कहानी जिसके साथ साल 2002 में छह दरिंदों ने सामूहिक बलात्कार किया. मुख्तार माई के 12 साल के भाई पर ऊंची जाति से ताल्लुक़ रखने वाले मस्तोई बलोच तबक़े की एक महिला से शारीरिक संबंध के आरोप लगाए गए और पंचायत ने बदले में मुख्तार माई को सामूहिक बलात्कार की घिनौनी सज़ा दी. उन्हें निर्वस्त्र कर घुमाया गया.

मुख्तार माई ने देश की सर्वोच्च अदालत तक अपनी लड़ाई लड़ी. दोषियों को सज़ा दिलवाई. वे आज भी देश-विदेश की दमित महिलाओं की ख़ातिर रोशनी की किरण हैं. पर यक़ीन मानिए फ़ेसबुक पर अटेंशन खींचते इन #MeToo के साथ ऐसी कोई लड़ाई नहीं लड़ी जा रही है.

ये सारे मौसमी #MeToo जब ख़त्म हो जाएं तो इस देश के खेत खलिहानों, छोटे शहरों और धुंध में खोए गांवों के बारे में भी ज़रा बात हो जाए, जहां डंके की चोट पर औरत के शोषण का इतिहास लिखा जा रहा है और उन गुमनाम पीड़िताओं की तकलीफ़ को फॉलो करने की क़ूवत न किसी अख़बार में है, न चैनल में, न सरकारी मशीनरी में, न समाज में, न किसी महान संपादक में, न किसी स्वनामधन्य एक्टिविस्ट में!

सच्चाई तो ये भी है कि उन महिलाओं को तो न “Me” का अर्थ मालूम है और न ही “Too” का! उन्हें बस अपनी नियति के अर्थ मालूम हैं!

(ये लेखक के अपने विचार हैं.)

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